द पावर ऑफ़ हेबिट The Power of Habit Book Summary in Hindi
The Power Of Habit
By Charles duhigg
About Book
शराब और सिगरेट पीना, ओवरईटिंग की हैबिट, बिंज watching, इंटरनेट की एडिक्शन, नींद पूरी ना होना - क्या आप भी इनमे से किसी बुरी आदत के शिकार है ? अगर है तो ये समरी एक बार जरूर पढ़िये. इस समरी में आपको अपनी बेड हैबिट छोड़कर उन्हें गुड हैबिट में बदलने का इफेक्टिव तरीका बताया जाएगा और आपको उन लोगों की रियल लाइफ कहानियाँ पढने को मिलेंगी जिन्होंने अपनी बेड हैबिट को गुड हैबिट में बदला है.
ये समरी किस-किसको पढनी चाहिए ?
वो लोग जो किसी बुरी आदत का शिकार है और उसे छोड़ना चाहता है. दोस्त या रिश्तेदारों को जो अपने करीबी लोगों की लाइफ सुधारना चाहते हैं और उनकी बुरी आदत छुड़वाना चाहते हैं.
ऑथर के बारे में
चार्ल्स डुहिग एक बेस्ट सेलिंग ऑथर और एक अवार्ड विनिंग जर्नलिस्ट हैं. 2013 में उन्हें Explanatory रिपोर्टिंग के लिए पुलित्ज़र प्राइज भी मिल चुका है. उन्होंने न्यू यॉर्क टाइम्स, लॉस्ट एंजेल्स टाइम्स और न्यू यॉर्क मैगज़ीन के लिए काम किया है.
अगर आप सोचते है कि आप अपनी बुरी आदते कभी नहीं बदल सकते, आप निराश होकर सारी उम्मीद खो चुके है तो एक बार एक समरी पढ़कर देखिए, ये आपकी आँखे खोल देगी. इस समरी से आप सीखोगे कि हैबिट कैसे काम करती है और कैसे हम अपनी लाइफ में हैबिट लूप को अप्लाई कर सकते है. इस समरी में आपको ऐसे लोगों की कहानियाँ पढने को मिलेंगी जिनकी कुछ बुरी आदते थी जो वो चाह कर भी नहीं छोड़ पा रहे थे, पर अपनी विलपॉवर से उन्होंने अपनी लाइफ ही बदल कर रख दी. ना सिर्फ उन्होंने बुरी आदते छोड़ी बल्कि अच्छी आदते अपना कर आज एक बेहतर जिंदगी जी रहे है. तो अभी बहुत देर नहीं हुई है, आप भी अपनी बुरी आदतों से छुटकारा पा सकते है. It तो आइये शुरुवात करते है एक नई जर्नी की जहाँ आप अपने ही नए अवतार से मिलेंगे..
The Habit Cure लिसा एलन 34 साल की है. उसे 16 साल की उम्र से ही शराब और सिगरेट की लत लग गई थी. इसके साथ ही लिसा को एक और प्रोब्लम भी थी, वो जिंदगी भर अपने मोटापे से परेशान रही. ऊपर से उस के सिर पर $10000 से भी ज्यादा का उधार था जो उसे चुकाना था. और मुसीबत ये है कि उसकी कोई नौकरी साल भर से ज्यादा नहीं टिकती थी. लेकिन आज जो औरत researchers के सामने बैठी है, एकदम अलग है. ये लिसा एकदम स्लिम-फिट और ख़ुशी से चहकती नजर आ रही है. उसकी टाँगे किसी रनर की तरह एकदम टोंड है. अगर उसकी पुरानी फोटो से तुलना करे तो वो अपनी उम्र से दस साल छोटी लगती है. आज लिसा के सिर पर कोई उधारी नहीं है, उसने शराब और सिगरेट पीना छोड़ दिया है और वो तीन सालो से एक ग्राफिक डिजाईन फ़र्म में जॉब कर रही है.
"आखिरी बार तुमने कब सिगरेट पी थी?' एक researcher ने लिसा से पूछा तो उसने जवाब दिया" कोई चार साल हो गए होंगे, मैंने 60 पाउंड वेट लूज़ किया है और उसके बाद एक मैराथन भी पूरी की है. इतना ही नहीं वो मास्टर की डिग्री के लिए पढाई भी कर रही है और उसने खुद का एक घर भी खरीदा है. कुल मिलाकर लिसा की जिंदगी में बहुत सारी पॉजिटिव चीज़े हुई है और हो रही है. पिछले तीन सालो से साईकोलोजिस्ट, न्यूरोलोजिस्ट और बाकि एक्सपर्ट्स ने लिसा के साथ 23 और लोगों को भी स्टडी किया. इन लोगों में कोई शराबी था तो कोई चेन स्मोकर तो कोई अपने मोटापे से परेशान था और किसी को शॉपिंग की लत लगी हुई थी. नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ हेल्थ ने इस रिसर्च को फंड किया था. लिसा और बाकि लोगों में एक चीज़ कॉमन थी, वो ये कि उन सबने बहुत कम वक्त में अपनी बुरी आदत से छुटकारा पाया था और एक्सपर्ट्स यही जानना चाहते थे कि आखिर इसके पीछे राज क्या है. researchers ने उन सबके डेली रूटीन को मोनिटर करने के लिए सबके घर में कैमरे लगवा दिए. सबको एमआरआई ब्रेन स्कैन से भी गुजरना पड़ा क्योंकि सबको सिगरेट, शराब और खाने की लत लगी थी. "मुझे पता है, तुम ये कहानी कई बार पहले भी सुना चुके हो पर प्लीज़ क्या फिर से बताओगे कि तुमने सिगरेट की लत कैसे छोड़ी? researcher ने पूछा और लिसा फिर से एक बार अपनी कहानी सुनाने लगी. लिसा छुट्टियों में घूमने कायरो, ईजिप्ट गई हुई थी. इसके कुछ महीने पहले की बात है, लिसा का हजबैंड एक दिन काम से घर लौटा और आते ही लिसा से बोला कि उसे डिवोर्स चाहिए, क्योंकि उसे किसी और लडकी से प्यार हो गया था. सुनकर लिसा के पैरो तले जमीन खिसक गई. उसे यकीन नहीं हुआ पर सच्चाई उसके सामने थी, उसका पति जो किसी दूसरी औरत को चाहता था अब लिसा के साथ एक पल भी नहीं रहना चाहता था. लिसा बुरी तरह से टूट गई, अपने गम को भुलाने के लिए उसने शराब और सिगरेट का सहारा लिया पर फिर भी उसके दिल को चैन नहीं पड़ा. लिसा ने अपने पति और उसकी गर्लफ्रेंड का पीछा नहीं छोड़ा, वो जहाँ-जहाँ जाते लिसा उन्हें फोलो करती. वो अपने पति की गर्लफंड को आधी रात को फोन करती और फोन रख देती. फिर एक रात लिसा नशे की हालत अपने पति की गर्लफ्रेंड के घर पहुँच गई, उसने वहां खूब तमाशा किया. वो उस लडकी को उल्टा सीधा बोल रही थी और जोर-जोर से दरवाजा पीट रही थी, लिसा ने गुस्से में उसका घर तक जलाने की धमकी दे डाली थी. ये उसकी ज़िंदगी का सबसे बुरा दिन था. उसने खुद को पहले कभी इतना मायूस और अकेला महसूस नहीं किया था. फिर अचानक उसे याद आया कि वो हमेशा से ही पिरामिड्स देखने ईजिप्ट जाना चाहती थी. अभी उसके क्रेडिट कार्ड की लिमिट बची थी तो लिसा ने ट्रिप पर जाने का फैसला कर लिया. कैरो पहुँचने के बाद पहली सुबह की बात है, पास ही में एक मस्जिद से आती अज़ान की आवाज़ से लिसा की नींद टूट गई थी. उसके होटल का कमरा अँधेरे में डूब था. जेट लेग की वजह से उसका सिर दुःख रहा था. लिसा को सिगरेट की तलब महूसस हुई, उसने अँधेरे में लेटे-लेटे ही एक सिगरेट जलाई पर ये क्या? उसे प्लास्टिक के जलने की बदबू आ रही थी.
असल में जिसे वो मार्लबरो का सिगरेट समझ कर जला रही थी वो एक पेन था. वो बुरी तरह चिढ़ गई थी. पिछले कुछ महीनों से वो बेहद परेशान, नाराज़ और गुस्से में थी. उसे कभी खुद पर शर्म आती तो कभी नाउम्मीदगी की फीलिंग होती. वो रातो को उठकर घंटो रोती और बेहिसाब उल्टा-सीधा खाती थी. एक तो उसके पास कोई नौकरी नहीं थी ऊपर से दिन ब दिन उसका वजन बढ़ रहा था. एक तरह से उसकी ज़िंदगी बर्बादी के कगार पर खड़ी थी. यहाँ तक कि उससे एक सिगरेट तक नहीं जल पाती थी. कुछ महीने यूं ही गुजर गये फिर एक दिन लिसा ने एक फैसला किया. वो बिस्तर से उठी, शावर लिया और होटल से बाहर निकली. उसने स्फिंक्स जाने के लिए एक टैक्सी ली जहाँ गिज़ा का पिरामिड है और दूर-दूर तक रेगिस्तान फैला हुआ है. लिसा ने सोच लिया था कि वो अपनी ज़िंदगी इस तरह बर्बाद नहीं होंगे देगी, उसे जीने का कोई मकसद ढूंढना ही होगा. कोई ऐसा मकसद जो उसकी लाइफ को
डायरेक्शन दे. उसने खुद से वादा किया कि अगले साल
वो फिर ईजिप्ट आएगी और डेजर्ट में ट्रेकिंग पर जायेगी.
चाहे कुछ भी हो जाए, वो अपना गोल पूरा करके रहेगी.
उसे अपना ये आईडिया काफी क्रेज़ी लगा. एक तो वो
ओवरवेट थी और ऊपर से उसके पास पैसे नहीं थे.
पर उसने खुद को चैलेंज कर लिया था और अब वो
इस चैलेंज को पूरा करने के लिए कुछ भी कर सकती
थी, लिसा ने सोचा सबसे पहले तो उसे सिगरेट छोडनी
होगी. ठीक इसके एक साल बाद ही, लिसा और छह लोगों
का एक कारवां ईजिप्ट के डेजर्ट में ट्रेकिंग पर रवाना
था. लिसा ने जो वादा खुद से किया था, उसे पूरा कर
दिखाया.
जिस पल लिसा ने स्मोकिंग छोड़ने का फैसला किया
था, उसी पल से उसकी ज़िंदगी बदल गई. फिर अगले
छह महीनों में लिसा ने सिगरेट की लत छोड़ने के लिए
जॉगिंग करनी शुरू की. उसने अपनी बिंज ईटिंग पर
काबू पाने के लिए हेल्दी डाइट का सहारा लिया. वो
टाइम से सोती और टाइम से उठती थी. नींद पूरी होने
की वजह से उसकी प्रोडक्टीविटी में भी ईज़ाफा हुआ.
वो एक भी पैसा फालतू खर्च करने के बजाए फ्यूचर के
लिए सेविंग कर रही थी. लिसा ने मैराथन ज्वाइन किया,
वापस स्कूल गई और एक नया घर भी खरीदा.
Researchers ने लिसा के ब्रेन में ओल्ड पैटर्न्स
देखे, ओल्ड हैबिट अभी तक थी पर पहले से कमजोर
थी. उसके ब्रेन में न्यू न्यूरल पैटर्न्स बन गए थे जो काफी
स्ट्रोंग थे और उसकी नई अच्छी आदतों से उसे कनेक्ट करते थे. लिसा रिसर्च एक्सपर्ट्स की फेवरेट सब्जेक्ट
थी क्योंकि उसके ब्रेन स्कैन्स बड़े क्लियर थे यानी एक
तरह से लिसा ने अपने ब्रेन को रीवायर ही कर लिया
था.
How Habits Work
1933 में यूजीन पौली नाम का एक आदमी सैन डिएगो
की एक लेबोरेट्री में आया. वो छह फुट से भी लंबा और
उम्रदराज़ आदमी था और एक ब्ल्यू बटन डाउन शर्ट
पहने हुए था. उसके बाल रुई जैसे सफेद थे और शायद
आर्थराईटिस की वजह से धीरे-धीरे चल रहा था.
मेडिकल लिटरेचर में ऐसे लोगों को ई. पी. बोला जाता
है.
एक साल पहले की बात है, एक दिन यूजीन की तबियत
अचानक खराब हो गई. उसे उल्टीयाँ आ रही थी और
पेट में भयंकर दर्द महूसस हो रहा था. बार-बार उल्टीयाँ
करने से उसे डीहाईड्रेशन हो गया था. उसकी वाइफ उसे
हॉस्पिटल लेकर आई. उस वक्त यूजीन को तेज़ बुखार
था. तेज़ बुखार की वजह से उसकी दिमागी हालत
भी ठीक नहीं थी. नर्स ने जब उसकी बाजू में आईवी
लगाने की कोशिश की तो वो एकदम एग्रेसिव होकर
लाते मारने लगा.
उसकी हालत देखते हुए डॉक्टर ने उसे बेहोश कर दिया
था. बेहोशी की हालत में डॉक्टर ने उसकी पीठ पर दो
vertebrae (रीढ़ का जोड़) के बीच में सूई चुभी कर कुछ फ्लूइड जैसा निकाला और देखते ही समझ गया कि यूजीन को क्या प्रोब्लम है. आमतौर पर इंसान के ब्रेन और स्पाइनल के बीच पाया जाने वाला फ्लूइड एकदम क्लियर होता है और तेज़ी से फ्लो करता है जैसे कोई सिल्क का धागा सुई से निकलता है पर यूजीन की बॉडी से जो फ्लूइड निकला था एकदम अलग था, जो देखने में गंदा और चिपचिपा सा था. जांच करने पर पाया गया कि यूजीन को viral encephalitis हुआ है. ये एक तरह का वायरस होता है जिससे बॉडी में कोल्ड सोर्स, माइल्ड इन्फेक्शन, फीवर और ब्लिस्टर्स हो जाते है. वैसे तो ये हार्मलेस माना जाता है पर अगर ब्रेन तक पहुँच जाए तो वायरस जानलेवा साबित होता है. वायरल एन्केफ्लाइटस ब्रेन में जाने के बाद ब्रेन के डेलिकेट टिश्यू को खाने लगता है, एक तरह से बोले तो ये हमारे विचार और सपनों को खाने लगता है. अब क्यूंकि यूजीन के ब्रेन का कुछ हिस्सा वायरस पहले से खा चुका था जिसे डॉक्टर्स दोबारा रीपेयर नहीं कर सकते थे पर उन्होंने वायरस को पूरे ब्रेन में फैलने से रोकने के लिए यूजीन को काफी बड़ी मात्रा में एंटीवायरल ड्रग दे दी थी. यूजीन दस दिनों तक कोमा में ज़िंदगी और मौत के बीच झूलता रहा, फिर धीरे-धीरे दवाईयों ने असर दिखाया और उसका फीवर उतर गया. वायरस भी बॉडी में जैसे गायब हो गया था. यूजीन जब कोमा से निकला तो उसकी दिमागी हालत काफी कमजोर लग रही थी पर वो जिंदा और सही-सलामत था यही सबसे बड़ी हैरानी की बात थी. डॉक्टर्स ने उस पर कुछ और टेस्ट भी किये, वैसे फिजिकल यूजीन एकदम फिट था, अपने हाथ-पैर हिला सकता था, लाईट और साउंड पर रीस्पोंड भी कर रहा था. पर उसके ब्रेन स्कैन से पता चला कि वायरस उसके ब्रेन सेंटर का एक ओवल टिश्यू खा चुका है और जहाँ पहले क्रेनियम और स्पाइनल कॉलम मिलते थे, अब वहां सिर्फ एक खाली जगह नज़र आ रही थी. डॉक्टर ने यूजीन को वाइफ को बोला कि उन्हें इस बात के लिए तैयार रहना होगा कि यूजीन अब पहले वाला इन्सान नहीं रहा. डॉक्टर ने यूजीन की वाइफ को बोला "मुझे नहीं लगता, मैंने किसी को भी इस तरह मौत के मुंह से वापस आते देखा हो. मै आपको झूठी उम्मीद नहीं देना चाहता, पर ये केस हमारे लिए भी एकदम अनोखा है" फिर कुछ हफ्तों बाद ही यूजीन को हॉस्पिटल से छुट्टी मिल गई और उसे रीहेबीलेशन ट्रीटमेंट दी जाने लगी. उसे हफ्ता दिन, महीना कुछ भी याद नहीं रहता था. डॉक्टर्स चाहे जितनी बार उसे अपना परिचय दे दे, यूजीन को उनके नाम याद नहीं रहते थे. घर वापस आकर यूजीन अपने ही दोस्तों को नहीं पहचान पाया. कई बार तो वो सुबह उठता, किचन में जाता और बेकन और अंडे पकाने लगता और फिर बेडरूम में आकर रेडियो चला देता. फिर चालीस मिनट बाद वो फिर से सेम रुटीन रिपीट करने लगता. उठता, बेकन पकाता, वापस कमरे में आकर रेडियो चला देता. यूजीन मेमोरी loss स्पेशलिस्ट का फेवरेट सब्जेक्ट बन गया था. इन एक्सपर्ट्स में से एक थे यूनीवरसिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया, सैन डिएगो के लैरी स्कवायर स्क्वॉयर 30 सालों से न्यूरो ऐनाटॉमी ऑफ़ मेमोरी की स्टडी कर रहे थे. स्क्वॉयर ने observe किया कि यूजीन को नई बाते याद नहीं रहती है. जब उसे उसके ग्रैंडचिल्ड्रन की फ़ोटोज़ दिखाई गई तो वो उन्हें पहचान नहीं पाया. यहाँ तक कि उसे ये भी याद नहीं था कि उसे कोई बिमारी हुई है जिसके चलते वो हॉस्पिटल में रहा था. स्क्वॉयर ने ये भी गौर किया कि यूजीन अपने घर में एक कमरे से दुसरे में आसानी से आ-जा रहा था पर जब उससे पूछा गया कि उसे घर की जानकारी कैसे याद रही तो वो कुछ भी जवाब नहीं दे पाया. जैसे कि उसे याद था कि किचेन कहाँ और और बाथरूम कहाँ पर पर लेकिन उसे याद कैसे रहा, ये एक पहेली थी. पर स्क्वॉयर ने यूजीन से जब अपने घर का नक्शा बनाने को बोला तो वो बना नहीं पाया. यूजीन अपनी याददाश्त भूल चुका था पर उसकी
हैबिट्स नहीं भूली थी, वो अपनी आदतों की वजह से ही किचेन और बाथरूम तक चला जाता था. उसे ये भी पता था कि पड़ोस में कहाँ घूमना है और जब वो बाहर घूमने जाता तो वापस भी खुद आ जाता था. उससे जब पुछा गया कि उसे ये कैसे किया तो यूजीन एक्सप्लेन नहीं कर पाया कि वो ये कैसे कर लेता है. यूजीन का डेली रूटीन कुछ इस तरह था वो सुबह उठता, फ्रंट गेट से बाहर जाता, पास-पड़ोस में घूमने जाता और घर लौटते हुए रास्ते से कोई पत्थर का टुकड़ा लेकर आता. घर आकर वो टीवी के सामने सोफे पर बैठ जाता और हिस्ट्री चैनल देखता. ये यूजीन की डेली रूटीन लाइफ थी.
उसकी याददाश्त चली गई पर उसकी आदते नहीं गई थी. अपनी इसी आदत के चलते यूजीन पास-पड़ोस में धूम-धामकर बड़े आराम से घर लौट आता था. ह्यूमन ब्रेन किसी प्याज़ की तरह है, कई परतों से बना हुआ. इसकी आउटसाइड लेयर में कॉम्प्लेक्स थिंकिंग प्रोसेस होता है. लेकिन ब्रेन के अंदर गहराई में ब्रेन स्टेम के पास जो जगह होती है, वहां हमारे प्रिमिटिव स्ट्रक्चर स्टोर होते है जो हमारे ऑटोमेटिक बिहेवियर जैसे सांस लेना या भोजन निगलना जैसे एक्शन को कण्ट्रोल करते है. हम चाहे याद रखे ना रखे पर ये हैबिट्स कभी नहीं छूटती चाहे हमारी याददाश्त क्यों ना चली जाये. ह्यूमन स्कल यानी खोपड़ी के बीचो-बीच करीब गोल्फ बाल के साइज का एक टिश्यू होता है जो मैमल्स, फिश या रेपटाइल के दिमाग में भी पाया जाता है, इसे basal ganglia बोलते है, यही वो जगह है जहाँ हमारी हैबिट स्टोर होती है. साइंटिस्ट्स ने ये पाया कि हमारे अंदर हैबिट इसलिए डेवलप होती है क्योंकि ब्रेन हमेशा एनर्जी बचाने के तरीके ढूंढता है. ये किसी भी रूटीन को हैबिट में बदल देता है ताकि हमारा ब्रेन बाकि कॉम्प्लेक्स टास्क पर फोकस कर सके.
अब जैसे एक्जाम्पल के लिए चलना, जूतों के फीते
बाँधना, कपड़े पहनना या दांत ब्रश करना जैसे कामो
में हमे ज्यादा सोचना नहीं पड़ता. ऐसे कामो को
करते वक्त हमारे हाथ-पैर ऑटोमेटिकली काम करते
है. क्योंकि ये काम हमारी हैबिट में शामिल है. हम इन्हें
ऑटो पायलट मोड में करते है, एक तरह से कहे तो
हमारा ब्रेन सारी हैबिट्स की chunking करता है
यानी उसे जरूरी और गैर जरूरी कामो में बाँट लेता है,
ताकि जो काम हमारी हैबिट में शामिल है, उसमे ब्रेन को
ज्यादा मेहनत करने की जरूरत ना पड़े और ब्रेन अपनी
एनर्जी मुश्किल काम जैसे सॉफ्टवेयर प्रोग्रामिंग या मैथ
प्रोब्लम्स सोल्व करने के लिए बचा कर रखता है.
हमारा बेसल गैन्ग्लिया (basal ganglia) तब फुल
एक्टिव होता है जब हम अपने दांत ब्रश कर रहे होते
है या शू लेस बाँध रहे होते है. अपनी इन ऑटोमेटिक
हैबिट्स की वजह से ही हम डिसीजन मेकिंग या हायर
लेवल थिंकिंग कर पाते हैं.
The Habit Loop
तो आप कोई हैबिट क्रिएट कैसे करोगे? हैबिट लूप कुछ इस तरह काम करता है. Cue, routine, reward. Cue, routine, reward. जब आप इस हैबिट लूप को रिपीट करते हो तो बिहेवियर नैचुरल बन जाता है. क्यू, रुटीन, रिवॉर्ड, क्यू, रुटीन, रिवॉर्ड. लेकिन क्यू (cue) क्या है ? ये बिहेवियर को एक्शन में लाने का ट्रिगर है. और रुटीन यानी खुद बिहेवियर और फाईनली रिवॉर्ड वो पॉजिटिव अफिर्मेशन है जो ये इंश्योर करता है कि बिहेवियर रिपीट किया जाए. 1990 में एमआईटी के कुछ साइंटिस्ट्स ने चूहों पर एक मेमोरी टेस्ट किया. साइंटिस्ट्स ने देखा कि जिन चूहों का basal ganglia इंजर्ड था, उन्हें घुमावदार रास्तो से होकर दौड़ने और फ़ूड कंटेनर खोलने जैसे टास्क करने में प्रोब्लम आ रही थी. ऐसा लग रहा था कि जैसे कि चूहों की याददाश्त चली गई है.
साइंटिस्ट्स ने एक एक्सपेरिमेंट किया, उन्होंने तय किया कि वो चूहों को बेसिक रूटीन करते हुए observe करेंगे. उन लोगों ने चूहों के ब्रेन में छोटी-छोटी वायर इन्सर्ट कर दी थी ताकि उनके ब्रेन में हो रही एक्टिविटी को मोनिटर किया जा सके. उन्होंने जो वायर चूहों की खोपड़ी में इन्सर्ट किये थे, एक तरह के सेंसर थे जिनकी सारी इन्फोर्मेशन उनके कंप्यूटर में फीड हो रही थी. चूहों को एक टी शेप वाले ट्रेक में छोड़ दिया गया जिसके एंड में चॉकलेट रखी थी. टास्क ये था कि हर चूहे को चॉकलेट ढूंढनी थी. पहले एक पार्टीशन रखी गई जो चूहों को बाकि ट्रैक से अलग रखती थी फिर एक जोर की क्लिक साउंड के साथ पार्टीशन हटा दी जाती थी, जो चूहों के लिए चॉकलेट ढूँढने के लिए एक ट्रिगर था. खैर एक्सपेरिमेंट शुरू हुआ. पहले तो चूहे ट्रेक के अंदर ही कोने सूंघते हुए, दीवारों पर नाखून मारते हुए घूमने लगे. उन्हें चॉकलेट की स्मेल तो आ रही थी पर कहाँ रखी है ये उन्हें पता नहीं चल पा रहा था. चूहे कभी दायें घुमते तो कभी बाएं लेकिन लास्ट में उन्होंने चॉकलेट ढूंढ ही ली. उनके ब्रेन में जो सेंसर लगा था वो कंप्यूटर से जुड़ा हुआ था तो उनके ब्रेन में हो रही एक्टिविटी नज़र आ रही थी, कंप्यूटर पर जो इमेज दिख रही थी उससे साफ़ पता चल रहा था कि चॉकलेट ढूंढते वक्त चूहों का basal ganglia फुल पॉवर से काम कर रहा है. जितनी बार भी चूहे दीवार पर स्क्रेच मार रहे थे या हवा में नाक उठाकर सूंघने की कोशिश कर रहे थे, उनका basal ganglia एक्टिविटी से भरा हुआ था । साइंटिस्ट की टीम ने इस एक्सपेरिमेंट को कई बार रिपीट किया. वो चूहों को सेम ट्रेक पर सेम रुटीन से भेज रहे थे. फिर आखिरकार कुछ चेंज हुआ. चूहों ने बेकार में इधर-उधर घूमना बंद कर दिया. अब ना तो वो हवा में सूंघ रहे थे और ना ही दीवारों पर स्क्रैच मार रहे थे. बल्कि इस बार वो सीधा चॉकलेट तक पहुँच गए. उन्हें पता चल गया था कि चॉकलेट कहाँ रखी है.
मोनिटर में सेंसर शो कर रहा था कि basal ganglia में एक्टिविटी कम होती जा रही है. यानी अब वो पहले से कम एक्टिव था. चॉकलेट तक पहुंचना चूहों के लिए ऑटोमेटिक रुटीन बन गया था जिसके लिए उन्हें अब ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं पड़ रही थी. उनका क्यू था क्लिक का साउंड और रुटीन था वो ट्रेक और रिवॉर्ड थी चॉकलेट और जैसे-जैसे चूहे इस हैबिट लूप से गुजरते गए, उनके basal ganglia में ये हैबिट स्टोर होती चली गई. शुरू में ये एक फुल एक्टिविटी थी पर जैसे-जैसे हैबिट रिपीट हुई basal ganglia का एफर्ट कम होता गया. तो इस एक्सपेरीमेंट से ये प्रूव हो गया था कि हमारा ब्रेन हैबिट्स स्टोर करता है ताकि वो ज्यादा इम्पोटेंट कामो को करने के लिए एनर्जी सेव कर सके.
The Habit of Success
हमारी बेड हैबिट फिर भी रहती है, क्योंकि ये राईट क्यू का वेट कर रही होती है. ये रिपीट होंगी तो इन्सान फिर से वही रूटीन अपना लेगा इसलिए इसका एक ही ईलाज है कि इसे किसी गुड हैबिट से रीप्लेस कर दिया जाये और ऐसा करने के लिए क्यू और रिवॉर्ड भी सेम होने चाहिए लेकिन रुटीन डिफरेंट हो. जैसे कि मान लो आपको नेट ब्राउजिंग की बड़ी हैबिट है, आप सारा दिन इंटरनेट और सोशल मिडिया पर रहते हो तो होता क्या है कि आपकी इस बेड हैबिट से आपकी प्रोडक्टिविटी कम होने लगती है और आपको गुड हैबिट जैसे जॉगिंग और एक्सरसाईज का टाइम नहीं मिल पाता. आप देर रात तक फोन ब्राउज़ करते रहोगे तो ज़ाहिर है सुबह देर से उठोगे. पर आप इस रुटीन को चेंज कर सकते हो. सबसे पहले, क्यू है घर आना. फिर अपने सोफे पर लेटकर फोन देखने के बजाए अपने रनिंग शूज़ पहनो और बाहर जॉगिंग के लिए जाओ. ये आपका न्यू रुटीन है. फिर एक घंटे बाद वापस आकर अपने लिए एक स्ट्रॉबेरी स्मूदी बनाओ, ये रहा आपका रिवॉर्ड. जब आप इस क्यू, रूटीन और रिवॉर्ड को रिपीट करते हो तो आपकी एक नई हैबिट बनती है. दोबारा आपका क्यू है ऑफिस से घर आना, लेकिन नया रुटीन है जॉगिंग करना, और रिवॉर्ड है स्ट्रॉबेरी स्मूदी. आप इस हैबिट लूप को किसी भी बुरी आदत से छुटकारा पाने के लिए अप्लाई कर सकते हो जो आप छोड़ना चाहते हो. क्यू, रुटीन और रिवॉर्ड याद रखो. बेड हैबिट छोड़ने के लिए सेम क्यू और रिवॉर्ड यूज़ करो पर रुटीन बदल दो. तो चलो अगली स्टोरी पढ़के उससे कुछ सिखने की कोशिश करते है. ट्रेविस लीच के दोनों पेरेंट्स ड्रग एडिक्ट थे. हर रोज़ ट्रेविस जब घर लौटता, अपने माँ-बाप को टीवी के सामने बैठा पाता, दोनों ड्रग के नशे में एकदम हाई रहते, उनकी आँखे ऊपर चढ़ी होती थी. ट्रेविस जब 9 साल का था तो एक दिन उसकी माँ को ड्रग लेने और देहव्यापार करने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया, और 9 साल की उम्र में ही उसने अपने पिता को हेरोइन की ओवरडोज़ का शिकार होते भी देखा. ट्रेविस ने देखा उसके पिता फर्श पर पड़े है और उनका चेहरा नीला पड़ गया है. ट्रेविस के भाई-बहन जानते थे कि ऐसी हालत में क्या करना चाहिए. उसके भाई ने उसके पिता की बॉडी को सीधा किया और उसकी बहन उनका मुंह खुला रखने की कोशिश कर रही थी ताकि उसके पिता की जीभ गले में फंस कर गला चोक ना कर दे, तब तक ट्रेविस ने अपने पड़ोसी के यहाँ जाकर मदद के लिए 911 में कॉल कर दिया था. 16 की उम्र में ट्रेविस एक हाई स्कूल ड्राप आउट था, उसने कहा कि वो स्कूल में और बुली नहीं होना चाहता था. उसके क्लासमेट उसे चिढ़ाते थे, उसका पीछा करते थे और उस पर चीज़े मार कर फेंका करते थे. ट्रेविस ने बताया कि उसे स्कूल और होमटाउन छोड़ना इस सबसे ज्यादा आसान लगा.
ट्रेविस फ्रेंसो चला गया जहाँ उसने McDonald's और Hollywood वीडियो में काम किया. कई बार उसे कस्टमर्स की बदतमीज़ी भी झेलनी पड़ती थी. एक बार जब एक कस्टमर उस पर चिल्लाते हुए बोला" आई वांट रेंच ड्रेसिंग यू मोरोन!" ट्रेविस को गुस्सा आ गया, उसने सभी चिल्लाते हुए उस औरत को जवाब दिया "गेट आउट ऑफ़ माई ड्राइव थ्रू!". इतना ही नहीं उसने कस्टमर की कार पर चिकेन नगेट फेंक दिए. कई बार तो ट्रेविस को इतना गुस्सा आता था कि वो शिफ्ट में काम के बीच ही रो पड़ता था. काम पर अक्सर वो लेट आता या कई बार एक्सेंट रहता. घर आकर वो शीशे के आगे खड़े होकर खुद से बाते करता. वो खुद को ही आर्डर देता कि उसे अच्छा बनना होगा, औरो की तरह नॉर्मल रहना होगा. लेकिन सच तो ये था कि ट्रेविस को सोशल होने में दिक्कत आ रही थी. अक्सर ही उसके केश रजिस्टर की लाइन लंबी होती चली जाती और तब मैनेजर आकर उसे डांटने लगता. ऐसे मौको पर ट्रेविस के हाथ कांपने लगते और साँस फूलने लग जाती. फिर एक दिन होलीवुड वीडियो में एक रेगुलर कस्टमर ने ट्रेविस से बात की. उसने ट्रेविस को सलाह दी कि उसे स्टारबक्स में जॉब ट्राई करना चाहिए. वो कस्टमर फोर्ट वाशिंगटन की नई ब्रांच का असिस्टेंट मैनेजर था. उसने ट्रेविस को वहां अप्लाई करने का ऑफर दिया और एक महीने बाद ही ट्रेविस बरिस्ता में मोर्निंग शिफ्ट कर रहा था. तब से छह साल हो गए है, ट्रेविस आज 25 साल का है और दो स्टारबक्स ब्रांच का मैनेजर है. उसके अंडर में 40 लोग काम करते है और वो अपनी कंपनी के लिए सालाना $2 मिलियन का रेवेन्यू जेनरेट करता है. और उसकी सेलरी है $44,000. ट्रेविस ना तो अब कभी काम पर लेट होता है और ना ही बेवजह छुट्टी लेता है. उसका अपने इमोशंस पर पूरा कण्ट्रोल है इसलिए उसे कभी काम के दौरान गुस्सा नहीं आता. एक बार एक कस्टमर उसके एक एम्प्लोई पर चिल्ला रहा था तो ट्रेविस उस एम्प्लोई को साइड में लेकर गया और समझाया" तुम्हारा एप्रन तुम्हारे लिए एक शील्ड की तरह है, इसलिए जब तक तुम इसके पीछे हो, स्ट्रोंग हो" पर ट्रेविस की लाइफ में इतना बड़ा बदलाव आया कैसे? उसने स्टारबक्स ट्रेनिंग कोर्स अटेंड किया. बरिस्ता में अपने पहले ही दिन उसने लेक्चर ज्वाइन किया था. ये प्रोग्राम ख़ास एम्प्लोईज़ के लिए रखा गया था और इसे कुछ इस तरह से स्ट्रक्चर किया गया था कि एम्प्लोईज़ जब मोड्यूल कम्प्लीट करे तो उन्हें कॉलेज क्रेडिट कमाने का मौका मिल सके. स्टारबक्स के इस ट्रेनिंग प्रोग्राम ने ट्रेविस की पूरी ज़िंदगी ही बदल कर रख दी थी. स्टारबक्स ने ट्रेविस को सिखाया कि अपनी जॉब पर फोकस कैसे करना है, कैसे अपनी लाइफ जीनी है और कैसे अपने ईमोशन्स को कण्ट्रोल में करना चाहिए. ट्रेविस कहता है" स्टारबक्स मेरी ज़िंदगी का टर्निंग पॉइंट था, मै जिदंगी भर इस कंपनी का एहसानमंद रहूँगा" स्टारबक्स ने देखा कि अच्छी सर्विस प्रोवाइड करने के लिए हर एम्प्लोई को विल पॉवर और सेल्फ डिसप्लीन की जरूरत है. यही वजह थी कि कंपनी मिलियन डॉलर खर्च करके अपने एम्प्लोईज़ को ट्रेनिंग देती है और उन्हें नई अच्छी आदतें अपनाने में हेल्प करती है.
स्टारबक्स के अपने मैनुअल और वर्कबुक है जिनमे इंस्ट्रक्शन दिए गए है कि एम्प्लोईज़ को मुश्किल सिचुएशन कैसे निपटना है या रूड कस्टमर्स के साथ कैसे डील करनी चाहिए. जैसे एक्जाम्पल के लिए, अगर कोई कस्टमर इस बात पर गुस्सा है कि उसे गलत ड्रिंक सर्व कर दी गई है तो ऐसे में LATTE method अपनाना चाहिए जहाँ Listen to the customer, Acknowledge the complaint, Take Action by giving the right drink, Thank the customer, and Explain why the problem occurred यानी कस्टमर की बात सुनें, शिकायत को स्वीकार करें, सही ड्रिंक देकर एक्शन लें, कस्टमर को थैंक यू कहें और बताएं कि प्रॉब्लम क्यों हुई थी. अपने एम्प्लोईज़ को ट्रेनिंग देना और उन्हें विलपॉवर, सेल्फ डिसप्लीन और गुड हैबिट्स के बारे में सिखाना स्टारबक्स की सक्सेस का सबसे बड़ा सीक्रेट है. उनके एम्प्लोईज़ की गुड हैबिट्स की वजह से उनके कस्टमर्स को अच्छी सर्विस मिलती है और यही एक वजह है कि स्टारबक्स सिर्फ एक कॉफ़ी नहीं बल्कि उससे कहीं बढ़कर एक गुड एक्सपिरिएंस है.
Conclusion
आपने लिसा एलन की रियल लाइफ स्टोरी पढ़ी कि कैसे उसने शराब और सिगरेट जैसी बुरी लत छोड़कर ज़िंदगी को एक और मौका दिया. आपने इस समरी में यूजीन पॉल के बारे में भी पढ़ा, वो आदमी जिसे viral encephalitis नाम की बीमारी हो गई थी जिसमे कि उसकी याददाश्त भी चली गई थी और उसे अपनी लाइफ जीने के लिए अपनी हैबिट्स पर डिपेंड रहना पड़ा. क्योंकि उसकी हैबिट्स बनी हुई थी इसीलिए वो अपने डेली रूटीन के काम करने में प्रोब्लम नहीं हुई. ये स्टोरी एक तरह से हमे हैबिट्स की पॉवर के बारे में बताती है. साथ ही आपने इस समरी में ब्रेन के बीसल गैंगलीआ के बारे में भी पढ़ा. आपने हैबिट लूप भी पढ़ा. जो क्यू रूटीन और रिवॉर्ड है. आप किसी भी बुरी आदत से छुटकारा पाकर नई और अच्छी आदत डाल सकते हो. बस आपको क्यू, रूटीन और रिवॉर्ड याद रखने है. आपने इस समरी में ट्रेविस लीच के बारे में पढ़ा और ये भी पढ़ा कि किस तरह स्टारबक्स ने उसकी ज़िंदगी बदल दी. जो ऑर्गेनाईजेशन अपने एम्प्लोईज़ में गुड हैबिट्स डालने की कोशिश करती है, उसके लॉन्ग टर्म सक्सेस मिलने के ज्यादा चांसेस होते है. तो अगर आपकी भी कुछ बुरी आदते है जो आपसे छूट नहीं रही तो टेंशन की कोई बात नहीं ये समरी आपको ऐसी टेक्नीक्स और ट्रिक्स बताएगी कि आप अपनी हर बुरी आदत से छुटकारा पा लोगे और साथ ही नई और अच्छी आदते भी डाल लोगे, इस समरी में कई ऐसी रियल लाइफ कहानियाँ है जो रीडर्स को इंस्पायर और मोटिवेट करती है. लिसा और ट्रेविस के जैसे ही आप भी अपनी लाइफ चेंज कर सकते है. बेशक शुरुआत में छोटे स्टेप्स ले. एक टाइम में एक हैबिट चेंज करने की कोशिश करे. हैबिट लूप याद रखना और कभी हार मत मानना, हमारी ज़िंदगी का हर दिन एक नया मौका लेकर आता है ताकि हम अपनी जिंदगी बेहतर बना सके.
Please
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