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The Psychology Of Money Book Summary In Hindi Introduction


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The Psychology of Money
By Morgan Housel



विषय - सूची

प्रस्तावना: पृथ्वी पर सबसे बड़ा प्रदर्शन
1. कोई भी मूर्ख नहीं है 
2. भाग्य और जोखिम
3. कभी भी पर्याप्त नहीं 
4. विस्मयकारी कंपाउंडिंग
5. धनवान बनना बनाम धनवान बने रहना
6. पट, आप जीते
7 स्वतंत्रता
8. कार में बैठे आदमी का विरोधाभास
9. संपत्ति वह है जो आपको दिखाई नहीं देती
10 धन-संपत्ति की बचत करें
11. यथोचित तर्कशील 
12. अप्रत्याशित!
13. त्रुटि के लिये जगह
14. आप बदलेंगे
15. कुछ भी मुफ्त नहीं होता
16. आप और मैं
17. निराशावाद का बहकावा 
18. जब आप कुछ भी मान लेंगे
19. अब सब साथ में 
20. स्वीकारोक्तियाँ


                            प्रस्तावना

                     पृथ्वी पर सबसे बड़ा प्रदर्शन


मैंने अपने कॉलेज के वर्ष लॉस एन्जेलस के एक बढ़िया होटल में सेवक के रूप में बिताये। वहाँ एक तकनीकी कार्यकारी अतिथि के रूप में अक्सर आया करता था। वह काफ़ी प्रतिभावान था, उसने लगभग 20 वर्ष से कुछ ही अधिक की आयु में वाई-फ़ाई का एक मुख्य घटक डिज़ाइन कर पेटेंट किया था। वह कई कंपनियां शुरू करके बेच चुका था और बेतहाशा कामयाब था ।


धन संपत्ति के साथ उसका जो संबंध था, उसे मैं असुरक्षा और बचकानी मूर्खता का मेल कहूँगा ।

वह सौ डॉलर के नोटों की कई इंच मोटी गड्डी साथ लेकर घूमता था, जिसे वह हर किसी को दिखाता था, फिर चाहे वे देखना चाहते हों या नहीं। वह बिना किसी संदर्भ के अपनी धन सम्पदा की खुलकर डींग मारता, खासकर जब वह नशे में धुत होता ।


एक दिन उसने मेरे एक सहकर्मी को कई हज़ार डॉलर की रकम दी और कहा, “गली में जो जवाहरात की दुकान है, वहाँ जाओ और $1000 के कुछ सोने के सिक्के लेकर आओ।"


एक घंटे बाद, हाथ में सोने के सिक्के लिये, वह कार्यकारी और उसके दोस्त एक डॉक के चारों तरफ़ इकट्ठा हो गये जो प्रशांत महासागर के सामने था। फिर उन्होंने उन सिक्कों को पानी में फेंकना शुरू कर दिया। वे उन सिक्कों को कंकरों की तरह उछालते, और फिर किसका सिक्का सबसे दूर गया, इस बात पर बहस करते और ठहाके मार कर हँसते। सिर्फ़ मनोरंजन के लिये। कुछ दिनों बाद उसने होटल के रेस्त्रां में एक लैंप तोड़ दिया।


एक मैनेजर ने उससे कहा कि वह $500 का लैंप था और उसे उसकी भरपाई करनी होगी। "तुम्हें $500 चाहिये?” कार्यकारी ने अविश्वासपूर्वक पूछा और जेब से नोटों की एक गड्डी निकाल कर मैनेजर को देते हुए कहा, "ये रहे पाँच हज़ार डॉलर। अब मेरे सामने से दफ़ा हो जाओ। और फिर कभी भी दोबारा इस तरह मेरी बेइज़्ज़ती मत करना। "


आप सोच रहे होंगे कि आख़िर इस तरह का व्यवहार कब तक चल सकता था, और इसका जवाब है "ज़्यादा दिन नहीं। कई वर्षों बाद मुझे पता चला कि वह दिवालिया हो गया।


इस किताब का आधार यह है कि धन-संपत्ति के मामले में आप कितना अच्छा प्रबंधन करते हैं, यह इस पर कम निर्भर करता है कि आप कितने होशियार हैं और इस पर ज़्यादा कि आपका व्यवहार कैसा है और व्यवहार सिखाना कठिन कार्य है, उन्हें भी जो वास्तव में होशियार हैं।


एक प्रतिभाशाली व्यक्ति, जो अपनी भावनाओं का नियंत्रण खो दे, एक वित्तीय आपदा हो सकता है। इसका विपरीत भी उतना ही सत्य है सामन्य व्यक्ति जिन्हें वित्तीय ज्ञान नहीं हैं, धनी हो सकते हैं अगर उनके पास कुछ ऐसे व्यावहारिक कौशल हों जिनके लिये बुद्धिमत्ता की औपचारिक युक्तियों की आवश्यकता नहीं होती।


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The Psychology Of Money Book In Hindi


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The Psychology of Money
By Morgan Housel



1. कोई भी मूर्ख नहीं है


धन के साथ आपके व्यक्तिगत अनुभव, संसार में क्या हुआ, शायद उसका 0.00000001% मात्र हैं, लेकिन आपके विचारानुसार संसार कैसे चलता है, उसका 80% हैं।


मैं आपको एक समस्या के बारे में बताना चाहूँगा। इसे जानकर आप अपने पैसों के साथ क्या करते हैं इस बारे में बेहतर महसूस करेंगे, और दूसरे अपने पैसों के साथ क्या करते हैं। इस बारे में कम आलोचनात्मक।

लोग पैसों के साथ कुछ मूर्खतापूर्ण हरकर्ते करते ज़रूर हैं, लेकिन कोई भी मूर्ख नहीं है। बात असल में यह है अलग अलग पीढ़ियों के लोग, जिनका पालन पोषण करने वाले माता पिता की आय अलग है, जीवन मूल्य अलग हैं, जो विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में अलग अलग अर्थव्यवस्था में जन्मे, जिन्होंने अलग अलग जॉब मार्केट में विविध प्रकार के प्रोत्साहन और भाग्य का अनुभव किया, वे एक दूसरे से बहुत अलग पाठ सीखते हैं।

दुनिया कैसे चलती है, इस बारे में हर किसी का अपना ही अनुभव होता है। और जो आपने अनुभव किया है. वह कहीं अधिक प्रभावशाली है उसके मुक़ाबले जो आप किसी और से सुनते या सीखते हैं। इसलिये हम सब आप मैं, और हर व्यक्ति धन-दौलत कैसे काम करती है, इससे संबंधी अपने मूल्यों के सहारे अपना जीवन गुजारते हैं, और अलग अलग लोगों के लिये इन मूल्यों में ज़मीन आसमान का फ़र्क हो सकता है। जो आपको मूर्खतापूर्ण लगे वह मेरे लिये मायने रख सकता है।


जो व्यक्ति ग़रीबी में पला बढ़ा वह जोखिम और प्रतिफल के बारे में जैसे सोचता है, एक समृद्ध बैंकर की संतान चाहे भी तो वैसे न सोच पाये। एक व्यक्ति जो ऐसे समय में पला बढ़ा जब मुद्रास्फीति की दर अधिक थी, उसने वह अनुभव किया जो उस व्यक्ति को नहीं करना पड़ा जो स्थिर कीमतों के बीच पला बढ़ा।

एक स्टॉक ब्रोकर जिसने महामंदी में अपना सब कुछ गँवा दिया, उसने जो अनुभव किया, 1990 के दशक के वैभव में काम करने वाला एक तकनीकी कर्मचारी उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता।

एक ऑस्ट्रेलियन जिसने 30 वर्षों में कोई आर्थिक मंदी नहीं देखी, उसने कुछ ऐसा अनुभव किया है जो किसी अमरीकी नागरिक ने कभी नहीं किया। बस इतना ही नहीं अनुभवों की यह सूची असंख्य है।

आप धन-दौलत के बारे में कुछ ऐसा जानते हैं जो मैं नहीं जानता, और इसका विपरीत भी उतना ही सच है। जिन धारणाओं, उद्देश्यों, पूर्वानुमानों के साथ आप अपना जीवन जीते हैं, वह मुझसे अलग हो सकता है। ऐसा इसलिये नहीं है कि हममें से एक दूसरे से अधिक होशियार है या अधिक जानकारी रखता है। ऐसा इसलिये है कि हमारे जीवन अलग हैं, जो हमारे विविध और बराबरी के ठोस अनुभवों से रचे हैं।

धन के साथ आपके व्यक्तिगत अनुभव, संसार में क्या हुआ, शायद उसका 0.00000001% मात्र हैं, लेकिन आपके विचारानुसार संसार कैसे चलता है, उसका 80% हैं। इसलिये समान रूप से होशियार लोग इस बात पर बहस कर सकते हैं कि मंदी कैसे और क्यूँ होती है, आपको निवेश कैसे करना चाहिये, आपको किसे प्राथमिकता देनी चाहिये, कितना जोखिम उठाना चाहिये आदि ।


1930 के अमरीका पराखी अपनी किताब में फ्रेडरिक लुईस ऐलन ने लिखा कि महामंदी ने लाखों अमरीकियों को उनके शेष जीवनकाल के लिये अंदरूनी तौर पर प्रभावित किया है। लेकिन अनुभवों में काफ़ी विभिन्नता थी। 25 वर्ष बाद जब जॉन एफ केनेडी राष्ट्रपति चुनाव लड़ रहे थे, एक रिपोर्टर ने उनसे पूछा कि उन्हें महामंदी के बारे में क्या याद है। उन्होंने टिप्पणी की:

मुझे महामंदी के बारे में कोई प्रत्यक्ष जानकारी नहीं। मेरा परिवार दुनिया के सबसे धनी परिवारों में से एक था और यह उस समय काफ़ी था। हमारे पास बड़े घर, नौकर-चाकर थे, और हम बहुत घूमा फ़िरा करते थे। जो चीज मैंने प्रत्यक्ष रूप से देखी वह बस यह थी कि मेरे पिता ने कुछ और मालियों को सिर्फ़ इसलिये काम पर रखा कि उन्हें नौकरी मिल जाये जिससे वे अपना पेट भर सकें। मुझे महामंदी के बारे में कुछ पता नहीं था जब तक मैंने हार्वर्ड में इसके बारें में नहीं पढ़ा।

यह 1960 के चुनाव का एक मुख्य मुद्दा था। लोगों को लगा कि कैसे कोई ऐसा व्यक्ति अर्थव्यवस्था की बागडोर संभाल सकता था जिसे पिछली पीढ़ी के सबसे बड़े आर्थिक वृत्तांत की कोई जानकारी ही नहीं थी? इसका क्षतिपूरण काफ़ी हद तक जे एफ़ के के द्वितीय विश्व युद्ध के अनुभव के द्वारा हो गया। यह पिछली पीढ़ी में व्यापक एक दूसरा भावनात्मक अनुभव था, जो उनके मुख्य प्रतिद्वंदी, हुबर्ट हम्फरे के पास नहीं था।

हमारे सामने चुनौती यह है कि अध्य्यन या ग्रहणशीलता की कोई भी मात्रा, भय और अनिश्चितता की शक्ति को उत्पन्न नहीं कर सकते।

मैं इस बारे में पढ़ सकता हूँ कि महामंदी में अपना सब कुछ गँवा देना कैसा रहा होगा। लेकिन मेरे मन में उन लोगों की तरह भावनात्मक घाव नहीं हैं जिन्होंने वास्तव में यह अनुभव किया। और कोई ऐसा व्यक्ति जिसने यह सब अनुभव किया यह नहीं समझ सकता कि मेरे जैसा व्यक्ति स्टॉक्स ख़रीद कर रखने जैसे विषयों में असावधान कैसे हो सकता है। हम दुनिया को बिल्कुल अलग नज़रिये से देखते हैं।

स्प्रेडशीट बड़ी स्टॉक मार्केट गिरावटों की ऐतिहासिक आवृत्ति का मॉडल पेश कर सकती हैं। लेकिन स्प्रेडशीट उस भावना का मॉडल पेश नहीं कर सकती, जो आप घर पहुँच कर अपने बच्चों की ओर देखकर सोचते हुए अनुभव करेंगे कि आपने ऐसी गलती की है। जिससे उनका जीवन प्रभावित हो सकता है। इतिहास पढ़ने से आपको यह ज़रूर लगता है कि आप कुछ जानते हैं, लेकिन जब तक आपने उसे जिया न हो, और उसके नतीजों को व्यक्तिगत तौर पर महसूस न किया हो आप उसे इतना नहीं समझ पायेंगे जिससे आपके व्यवहार में बदलाव आ सके।

हम सब को लगता है कि हम जानते हैं कि दुनिया कैसे चलती है। लेकिन हम सबने इसके एक तिनके मात्र का ही अनुभव किया है।

जैसा कि निवेशक बैटनिक कहते हैं, “कुछ सबक ऐसे होते हैं जिन्हें समझने से पहले हमें उनका अनुभव करना आवश्यक है।" और हम सब किसी न किसी तरह, इस सच के शिकार हैं।

2006 में नेश्नल ब्यूरो ऑफ़ इक्नॉमिक रिसर्च के अर्थशास्त्री अलराइक मैल्मैडियर और स्टीफ़न नेगल ने सर्वे ऑफ़ कंज्यूमर फ़ाइनेंसेज़ के 50 वर्ष के कार्य का अध्ययन किया, जिसमें अमरीकी लोग अपने पैसे के साथ क्या करते हैं, इस विषय पर विस्तृत जानकारी थी।'


परिकल्पना के अनुसार लोगों को अपने निवेश संबंधी निर्णय अपने लक्ष्यों और उस समय में उपलब्ध निवेश विकल्पों के अनुसार लेने चाहिये।


लेकिन लोग ऐसा करते नहीं। अर्थशास्त्रियों ने पाया कि लोगों के जीवन भर के निवेश निर्णय उनके उन अनुभवों से दृढ़तापूर्वक जुड़े होते हैं जो उन्होंने अपने जीवनकाल में देखे- मुख्यतः शुरुआती वयस्कता में।

अगर आप ऐसे समय में बड़े हुए जब मुद्रास्फीति की दर अधिक थी, तो आपने आगे जाकर अपना पैसा बॉन्ड में कम निवेश किया, उनके मुकाबले जो कम मुद्रास्फीति के समय में पले बढ़े। यदि आप ऐसे समय में पले बढ़े जब स्टॉक मार्केट मज़बूत था तो आपने आगे जाकर अपना पैसा बॉन्ड में अधिक निवेश किया, उनके मुकाबले जो स्टॉक मार्केट कमज़ोर होने के समय में पले बढ़े।


अर्थशास्त्रियों ने लिखा: “हमारी खोज दर्शाती है कि एक निवेशक की जोखिम उठाने की स्वेच्छा उसके व्यक्तिगत इतिहास पर निर्भर करती है।" न तो बुद्धिमत्ता, न शिक्षा, और न ही परिष्करण मात्र संयोग कि आप कब और कहाँ जन्मे ।


फाइनैंश्यल टाइम्स ने 2019 में प्रसिद्ध बॉन्ड मैनेजर बिल ग्रॉस का साक्षात्कार किया। "ग्रॉस मानते हैं कि आज वे जहाँ हैं वहाँ नहीं होते अगर वे एक दशक पहले या बाद जन्मे होते, " लेख का कहना था । ग्रॉस के करियर ने ढ़हती ब्याज दरों के साथ अच्छा मेल खाया जिससे बॉन्ड की कीमतों को अनुवात मिल गया। इस तरह की घटनाओं से न सिर्फ़ आपको • मिलने वाले अवसर प्रभावित होते हैं, इससे जब वे अवसर आपकी ओर आते हैं तो उन अवसरों के बारे में आपकी सोच भी प्रभावित होती है। ग्रॉस के लिये बॉन्ड पैसा बनाने की मशीन के सामान थे। उनके पिता की पीढ़ी के लिये, जो मुद्रास्फीति की ऊँची दर के समय बड़े हुए और उसे झेला, बॉन्ड धन भस्मक प्रतीत होंगे।

धन-दौलत को लेकर लोगों के अनुभवों में जो अंतर है वह छोटा नहीं है, उन लोगों के बीच भी जहाँ आपको यह अनुभव एक जैसे लगें।

अब स्टॉक को ही लीजिये। अगर आपका जन्म 1970 में हुआ, आपकी किशोरावस्था और युवावस्था के समय एस एंड पी 500 लगभग 10 गुना बढ़ा. मुद्रास्फीति समायोजित होकर। यह एक अद्भुत प्रतिफल है। अगर आपका जन्म 1950 में हुआ, तो मार्केट आपकी किशोरावस्था और युवावस्था के समय मुद्रास्फीति समायोजित होकर कहीं भी नहीं गया। लोगों के ये दो अलग समूह, अपने जन्म का वर्ष अलग होने के कारण, स्टॉक मार्केट को लेकर विविध दृष्टिकोण के साथ अपना जीवन गुज़ारते हैं।















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Rich Dad Poor Dad Book Summary In Hindi Chapter 2


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Rich Dad Poor Dad 
By Robert kiyshoki

रिच डैड पूअर डैड
अध्याय दो
अमीर लोग पैसे के लिए काम नहीं करते।

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"डैडी, क्या आप मुझे बता सकते हैं कि अमीर कैसे बना जाए?"

यह सुनते ही मेरे डैडी ने अपना शाम का अखबार नीचे रख दिया "बेटे, तुम अमीर क्यों बनना चाहते हो?"


"क्योंकि आज जिमी की मम्मी अपनी नई कैंडितक कार में आई और वे लोग पिकनिक पर अपने समुद्र तट वाले घर पर जा रहे थे। जिमी अपने साथ अपने तीन दोस्तों को ले गया, परंतु माइक और मुझे नहीं ले गया। उसने हमसे यह कहा कि वह हमें इसलिए नहीं ले जाएगा क्योंकि हम लोग 'ग़रीब बच्चे थे।"


"उसने ऐसा कहा ? " डॅडी ले अविश्वास से पूछा।

"हाँ, बिलकुल ऐसा " मैंने दर्द भरी आवाज़ में कहा।

डैडी ने अपना सिर हिलाया, नाक तक चश्मे को चढ़ाया और फिर अखबार पढ़ने लगे। मैं उनके जवाब का इंतजार करता रहा।


यह 1956 की बात है। तब में नौ साल का था। किस्मत की बात थी कि में उसी पब्लिक स्कूल में जाता था जिसमें अमीर लोगों के बच्चे पढ़ते थे। हम शुगर प्लांटेशन के कस्बे में रहते थे। प्लांटेशन के मैनेजर और कस्बे के बाकी अमीर लोग जैसे डॉक्टर, बिजनेसमैन और बँकर अपने बच्चों को पहली क्लास से छठी क्लास तक इसी स्कूल में भेजते थे। छठी क्लास के बाद बच्चों को प्रायवेट स्कूलों में भेजा जाता था। अगर मेरा परिवार सड़क के दूसरे छोर पर रह रहा होता तो मुझे अलग तरह के स्कूल में भेजा जाता जहाँ मेरे जैसे परिवारों के बच्चे पढ़ते थे। छठी क्लास के बाद इन बच्चों की तरह मैंने भी पब्लिक इंटरमीडिएट और हाई स्कूल किया होता क्योंकि उनकी ही तरह मेरे लिए भी प्रायवेट स्कूल में जाना संभव नहीं था।


मेरे डैडी ने आखिर अखबार को रख दिया। मुझे पता था कि वे क्या सोच रहे थे।

उन्होंने धीमे से शुरुआत की, "अगर तुम अमीर बनना चाहते हो, तो तुम्हें पैसे बनाना सीखना चाहिए"

मैंने पूछा, "मैं पैसे बनाना किस तरह सीख सकता हूँ?" "अपने दिमाग के इस्तेमाल से," उन्होंने मुस्कराते हुए कहा| जिसका असली मतलब यह था, 'बस, मैं तुम्हें इतना ही बता सकता हूँ' या 'में इसका जवाब नहीं जानता, इसलिए मुझे तंग मत करो।'

एक साझेदारी हुई

अगली सुबह मैंने अपने सबसे अच्छे दोस्त माइक को अपने डैडी की बातें बताई। जहाँ तक मुझे याद है, उस स्कूल में मैं और माइक ही दो गरीब बच्चे थे। माइक भी मेरी ही तरह था क्योंकि वह भी किस्मत की वजह से ही उस स्कूल में था। ऐसा लगता था जैसे किसी ने कस्बे में स्कूलों की सरहदें तय कर दी थीं और इसी कारण हम लोग अमीर बच्चों के स्कूल में पढ़ रहे थे। सच कहा जाए तो हम लोग गरीब नहीं थे, परंतु हमें ऐसा लगता था क्योंकि बाकी सभी बच्चों के पास नए बेसबॉल ग्लव्ज़, नई साइकलें और हर चीज़ नई होती थी।


मम्मी और डैडी ने हमें ज़रूरत की सभी चीजें दी थीं, जैसे खाना, घर, कपड़े। लेकिन इससे ज़्यादा कुछ नहीं। मेरे डंडी कहा करते थे, 'अगर तुम्हे कोई चीज़ चाहिए, तो उसके लिए काम कयो' हमें बहुत सी चीजें चाहिए थीं, लेकिन नौ साल के बच्चों के करने के लिए ज़्यादा काम मौजूद नहीं थे।

माइक ने पूछा, "तो पैसा कमाने के लिए हमें क्या करना चाहिए?"

"मैं नहीं जानता," मैंने कहा "लेकिन क्या तुम इस काम में मेरे पार्टनर बनना चाहते हो?"

वह राज़ी हो गया और उस शनिवार की सुबह माइक मेरा पहला बिज़नेस पार्टनर बन गया। हम दोनों पूरी सुबह यही सोचते रहे कि पैसा किस तरह कमाया जाए। कभी-कभार हम उन "बेफ़िक्र बच्चों" के बारे में बातें करते रहे जो जिमी के समुद्रतट वाले घर पर मज़े कर रहे होंगे। इससे थोड़ी चोट पहुँचती थी, परंतु यह चोट अच्छी थी क्योंकि इसने हमें यह सोचने के लिए प्रेरित किया कि पैसा कैसे कमाया जाए। आखिरकार उस दोपहर को हमारे दिमाग़ में बिजली काँध गई। यह एक ऐसा विचार था जो माइक ने किसी विज्ञान की किताब में पढ़ा था रोमांचित होकर, हमने अपने हाथ मिलाए और पार्टनरशिप के पास अब एक बिज़नेस था।


अगले कुछ हफ़्तो तक मैं और माइक आस-पास के इलाके में दौड़-भाग करते रहे। हम दरवाजों पर दस्तक देते थे और पड़ोसियों से कहते थे कि वे अपने इस्तेमाल किए हुए टूथपेस्ट ट्यूब हमारे लिए रख तो हैरत से हमें देखते हुए ज़्यादातर लोगों ने मुस्कराकर हमारी बात मान ली। कुछ ने हमसे पूछा कि हमें टूथपेस्ट ट्यूब क्यों चाहिए? इसके जवाब में हमने कहा, "हम आपको यह नहीं बता सकते। यह एक बिज़नेस सीक्रेट हैं।"


• सप्ताह गुजरते गए और मेरी माँ बहुत दुखी हो गई। अपने कच्चे माल को इकट्ठा करने के लिए हमने जो जगह चुनी थी वह उनकी वॉशिंग मशीन के ठीक पास थी। एक भूरे कार्डबोर्ड के डिब्बे में जिसमें कभी केचप की बोतलें रखी रहती थीं, हमारे इस्तेमाल किए हुए टूथपेस्ट के ट्यूब्स की संख्या बढ़ने लगी।


आखिर एक दिन माँ के सब्र का बाँध टूट गया। पड़ोसियों के मुडे-तुड़े और इस्तेमाल किए हुए टूथपेस्ट ट्यून्स को देखते-देखते वे ऊब गई थीं। उन्होंने पूछा " तुम लोग कर क्या रहे हो? और मैं यह नहीं सुनना चाहती कि यह एक बिजनेस सीक्रेट है। इस कचरे को साफ़ कर दो या मैं इसे उठाकर बाहर फेंक देती हूँ।


माइक और मैंने उनके हाथ-पैर जोड़े और उन्हें यह बताया कि जल्दी ही हमारा कच्चा माल पर्याप्त जमा हो जाएगा और फिर हम उत्पादन शुरू कर देंगे। हमने उन्हें बताया कि हम कुछ पड़ोसियों का इंतज़ार कर रहे थे ताकि वे अपने टूथपेस्ट के ट्यूब्श खत्म कर लें। माँ ने हमें एक हफ्ते की मोहलत और दे दी।


उत्पादन शुरू होने की तारीख क़रीब आ गई थी। दबाव बढ़ चुका था। हमारे वेअरहाउस के मालिक यानी मेरी माँ ने हमारी पहली पार्टनरशिप कंपनी को जगह खाली करने का नोटिस थमा दिया था। अब माइक का काम यह था कि वह पड़ोसियों को अपने टूथपेस्ट जल्दी खत्म करने के लिए कहे और साथ में यह भी जोड़ दे, दाँत के डॉक्टरों का कहना है कि दिन में कई बार ब्रश करना चाहिए में उत्पादन की प्रक्रिया को ठीक-ठाक करने में जुट गया।


एक दिन मेरे डैडी अपने एक दोस्त के साथ कार में बैठकर पोर्च में आए और उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने वहाँ नौ साल के दो बच्चों को उत्पादन की प्रक्रिया में पूरी गति से जुटे देखा। हर जगह बारीक सफेद पाउडर बिसारा हुआ था। एक लंबी मेज़ पर स्कूल से लाए गए दूध के छोटे कार्टन थे और हमारे परिवार की हिबाची बिल ताल दहकते कोयलों के साथ अधिकतम गर्मी पर जल रही थी।


डैडी सावधानी से चलकर हमारे करीब आए। चूँकि हमारे उत्पादन की प्रक्रिया ने पोर्ट पर करना कर लिया था इसलिए उन्हें कार बाहर ही खड़ी करनी पड़ी। जब वे और उनके दोस्त पास आए, तो उन्होंने कोयतो के ऊपर रखा एक स्टील का बर्तन देखा जिसमें टूथपेस्ट के ट्यूब पिछल रहे थे। उन दिनों टूथपेस्ट प्लास्टिक के ट्यूब्स में नहीं आते थे। ट्यूब सीसे के बने होते थे। एक •बार पेट जल जाने पर हम ट्यूब्स को स्टील के बर्तन में डाल देते थे ताकि वह पिघलकर द्रव रूप में आ सकें। इस पिघले हुए सीसे को हम छोटे छेद वाले दूध के कार्टनों में डाल रहे थे। 


दूध के इन कार्टलों में प्लास्टर ऑफ पेरिस भरा था। हर तरफ फैला सफ़ेद पाउडर प्लास्टर ही था, जिसमें हमने पानी मिलाया था। जल्दबाज़ी में, मैंने उसके बैग को गिरा दिया था और पूरी ज़मीन ऐसी लग रही थी जैसे वहाँ अभी-अभी बर्फ़ का तूफान आया हो। दूध के कार्टन बाहरी बवसे थे जिसके भीतर प्लास्टर ऑफ पेरिस के साँचे थे।


मेरे डैडी और उनके दोस्त हमें देखते रहे और हम पिघले हुए सीरो को प्लास्टर ऑफ पेरिस के क्यूब के ऊपर से छोटे से छेद में डालते रहे।


"सँभलकर," मेरे डैडी ने कहा

मैंने बिना सिर उठाए हामी भर दी।

आखिरकार जब सीसे को डालने का काम खत्म हो गया तो मैंने स्टील के बर्तन को नीचे रख दिया और फिर अपने डैडी की तरफ देखकर मुस्कराया।


उन्होंने हल्की मुस्कान के साथ पूरा, "तुम लोग क्या कर रहे हो?'

 "हम वही कर रहे हैं, जो आपने बताया था। हम अमीर बनने जा रहे हैं, "मैंने कहा

"हाँ," माइक ने सिर को हिलाते हुए और मुस्कराते हुए कहा "हम दोनों पार्टनर हैं।"

डैडी ने पूछा, "और इन प्लास्टर के साँचों में क्या है?"


"देखिए, "मैने कहा "इसमें एक बहुत अच्छी वीज़ है।"


छोटे हथौड़े से मैंने सील को ठोका जिससे बाहरी खोल टूट गया। सावधानी से मैंने ऊपर के आये प्लास्टर को हटाया और जस्ने का एक सिक्का बाहर गिर गया।


"है, भगवान !" मेरे डैडी ने कहा "तो तुम लोग जस्ते के सिक्के ढाल रहे थे।"

"बिलकुल सही, "माइक ने कहा "हम वही कर रहे थे जैसा आपने हमसे कहा था। हम पैसा बना रहे थे।

मेरे डैडी के दोस्त जोर से हँसने लगे। मेरे डैडी भी मुस्कराए और उन्होंने अपना सिर बना रहे थे। "दिलाया। उनके सामने आग और टूथपेस्ट की ट्यूब्स के बक्से के साथ सफ़ेद धूल में लिपटे हुए दो बच्चे खड़े थे, जो इस कान से उस कान तक खुलकर मुस्करा रहे थे।


उन्होंने हमसे कहा कि हम सब कुछ छोड़कर उनके साथ चलें और घर के सामने वाली सीढ़ी पर बैठें। मुस्कराते हुए उन्होंने हमें "जालसाजी" शब्द का मतलब समझाया।


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Think and grow rich book in hindi


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Think And Grow Rich
By Napoleon Hill
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About Book

सक्सेस किसी भी प्रोफेशन या करियर में मिल सकती है. और एक अनपढ़ या कम पढ़ा लिखा इंसान भी एक अमीर बन सकता है. और ये सीक्रेट लेखक अपने रीडर्स के साथ बांटना चाहता है कि आखिर कैसे 500 अमीर लोगो को अपनी जिंदगी में इतनी बड़ी सफलता मिली ? और ये सीक्रेट सिर्फ उनके लिए है जो इसे जानने के लिए तैयार है. जिन्होंने ये सीक्रेट एप्लाई किया उनका अमीर बनने का सपना पूरा हुआ है.


1. इस बुक से हम क्या सीखेंगे? 

अगर आप अपनी जिंदगी में पैसा, मान-सम्मान, पर्सनेलिटी, सुकून और ख़ुशी चाहते है तो इसका राज आप उन अमीर लोगो से जान सकते है. जैसे-जैसे आप ये तेरह स्टेप्स पार करेंगे, उस सीक्रेट के और करीब आते जायेंगे. अब तैयार हो जाईए क्योंकि जो मौका अब आपके हाथ लगने वाला है वो आपकी लाइफ बदल कर रख देगा. नेपोलियन हिल ने हमें इस सीक्रेट का एक क्ल्यू दिया है "सब तरक्की, सब अमीरी की शुरुवात के पीछे एक आइडिया है.


2. ये बुक किस किसको पढनी चाहिए?

हर कोई इंसान जो अमीर बनने के सपने देखता है लेकिन उसे पता नहीं है कि अमीर बनने के लिए उसे क्या और कैसे करना है. इस बुक में दिए रियल लाइफ एक्सपिरियेश प्रेक्टिकल लाइफ में काफी काम आ सकते है.


3. इस बुक के ऑथर कौन है?

26 अक्टूबर 1883 में जन्मे नेपोलियन हिल एक अमेरिकन ऑथर थे. थिंक एंड ग्रो रिच आल टाइम 10 बेस्ट सेलर सेल्फ हेल्प बुक्स की लिस्ट में आती है. उनकी इस बुक ने लाखो लोगो के अमीर बनने का सपना पूरा किया है. और आज भी कर रही है. तो देर किस बात की आज ही इस बुक को पढकर आप भी रिच बन सकते है.

विषय - सूची

अध्याय एक : परिचय 
अध्याय दो : इच्छाशक्ति 
अध्याय तीन : विश्वाश 
अध्याय चार : आतमसुझाव 
अध्याय पाँच : विशिष्ट ज्ञान
अध्याय छह :  कल्पना 
अध्याय सात : सुव्यवस्थिति योजना
अध्याय आठ : निर्णय
अध्याय नौ : लगन 
अध्याय दस : मास्टर माइंड की शक्ति प्रेरक बल
अध्याय ग्यारह: सेक्स रूपांतरण का रहस्य
अध्याय बारह: अंतर्मन
अध्याय तेरह : मन
अध्याय चौदह : छठी इन्द्रिय
अध्याय पन्द्रह : डर के छह भूतो को कैसे निकाला जाय
अध्याय सोलोह : Summry for you
अध्याय सतराह :  My Opeanion for this book 

                      अध्याय एक : परिचय 

विचारों में असीम शक्ति होती है। अगर इन विचारों में उद्देश्य, दृढ़ निश्चय और मजबूत इरादों का समावेश हो जाए तो आप दौलतमंद बन सकते हैं एवं वह सब कुछ हासिल कर सकते है, जो आपने सोचा हुआ है।

एडविन सी. बन्सं ने यह खोज निकाला कि कैसे विचार शक्ति से धनवान बना जा सकता है। इस खोज में सफलता पहले प्रयास में नहीं हासिल हुई, बल्कि वह धीरे-धीरे प्राप्त हुई। इस महान रहस्य की खोज की शुरुआत, बर्न्स की उस चाहत से हुई, जो उसे महान एडिशन का व्यावसायिक भागीदार बनाने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ थी। बर्न्स की उस इच्छा शक्ति की सबसे बड़ी बात यह थी कि वह स्पष्ट थी कि उसे एडिसन के साथ काम करना है, न कि एडिशन के दफ्तर में काम करना है। आप बस की कहानी को ढंग से पढ़िए, उसकी सोच वास्तविकता में कैसे तब्दील हुई? फिर आपको वे 13 नियम बेहतर समझ आएँगे, जो आपको दौलतमंद बनाते है।

जब वर्न्स के मन में यह विचार कौंधा, तब वह इस हालत में नहीं था कि वह इस पर कोई कदम उठा सके। उसके रास्ते में दो चुनौतियाँ थी, पहली यह कि एडिशन से उसकी कभी मुलाकात नहीं हुई थी, न ही एडिशन उसे जानता था। दूसरा यह उसके पास रेल का भाड़ा देने का इतना पैसा नहीं था कि वह ऑरेंज, न्यू जर्सी तक पहुँच सके। ये चुनौतियाँ इतनी पर्याप्त तो थी कि अधिकतर व्यक्तियों के आत्मविश्वास को डगमगा दे और उनकी सोच यहीं पर दम तोड़ दे।

परंतु उसके इरादे इतने कमजोर नहीं थे। वह दृढ प्रतिज्ञ था उसने हार नहीं मानी, बल्कि बिना टिकेट मालगाड़ी से यात्रा करके ईस्ट अरिंज पहुँच गया।

उसने एडिशन के प्रयोगशाला में खुद का परिचय दिया, और कहा कि वह इस अविष्कारक के साथ व्यवसाय करने आया हुआ है। काफी समय के पश्चात् एडिशन ने इस पहली मुलाकात का खुलासा कुछ इसप्रकार किया था, वह मेरे सामने एक सामान्य पर्यटक की तरह खड़ा था, परंतु उसके चेहरे का तेज देखकर यह पता चल गया था कि वह जिस कारणवश यहाँ आया है, उसके लिए दृढ प्रतिज्ञ है। इतने साल के अनुभव में मुझे यह ज्ञान हो गया था कि अगर किसी चीज को दिल से चाहो तो सारी कायनात तुम्हे उससे मिलाने की कोशिश में जुट जाती है। मैंने भी उसके मजबूत इरादों को भौंपकर उसे एक मौका दिया दे दिया था और उसने इस बात को पूरी तरह से दिमाग में बैठा लिया था कि उसे इस सफलता को पाकर ही रहना है। धीरे-धीरे उसके कार्यों ने भी यह सिद्ध कर दिया कि मैंने उसको मौका देकर कोई गलती नहीं की थी उस नौजवान बर्न्स ने उस वक्त एडिशन से क्या कहा यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं था, जितना कि उसने इस बारे में सोचा कि उसे एडिशन के साथ में काम करना है। इसबात पर एडिशन ने भी अपनी सहमति जताई थी।

अगर विचार शक्ति की यह बात हर पाठक तक पहुँच जाए तो उसे संपूर्ण किताब पढ़ने की कोई जरुरत नहीं है। बस अपने पहले ही साक्षात्कार के बाद एडिशन के व्यवसाय में भागीदार नहीं बन गया था। बल्कि उसे एडिशन के ऑफिस में बहुत ही कम मेहनताना में काम करने का अवसर प्राप्त हुआ था यह कार्य ऐसा था, जो एडिशन के लिए बहुत कम उपयोगी था पर बन्स के लिए बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण इस अवसर ने बर्न्स को अपने होनेवाले भागीदार को अपनी व्यापार कुसलता दिखाने का मौका दिया था उसका होनेवाला भागीदार वहाँ उसके काम को परख सकता था।

कई महीने बीत चुके थे, पर अपरोक्ष रूप से ऐसा कुछ भी घटित नहीं हो रहा था जिससे बर्न्स अपने उस निश्चित लक्ष्य तक पहुँच सके, जो उसने अपने दिलो-दिमाग में संजो रखा है पर उसके मन में कुछ ऐसी प्रक्रियाए चल रही थी, जिनका परिणाम बाद में निकला। पर तब तक वह अपने मनो मष्तिष्क में एडिशन का व्यावसायिक पार्टनर बनने के अपने विचार पर और दृढ़ता पूर्वक सोचने लगा था।

मनोवैज्ञानिको ने यह सही कहा है जब कोई विचार दिमाग पर हावी हो जाए, तो वह वास्तविकता में आपके सामने प्रकट हो जाता है।' बर्न्स पूर्णतया एडिशन के साथ काम करने के लिए तैयार था और वह तब तक दृढ़प्रतिज्ञ होकर लगा रहा, जब तक उसने वह हासिल नहीं कर लिया, जिसे वह इतने समय से खोज रहा था।

उसने कभी इस बात के लिए नहीं विचार किया इतना परेशान होने की क्या जरूरत है चलो, सेल्समैन की नौकरी असानी से मिल जायेगी। बल्कि उसने यह विचार किया, मैं यहाँ पर एडिशन के साथ व्यवसाय करने के लिए आया हूँ मैं तब तक पीछे नहीं हदूंगा, जब तक मैं इस मकसद में जीत नहीं जाता हूँ, चाहे बची हुई सारी जिंदगी यहीं पर गुजारनी पड़े, यह सच ही है कि अगर आप एक उद्देश्य को लेकर पूरी जिंदगी जीते है तो आप एक अलग ही कहानी लिख सकते हैं।

शायद उस समय बर्न्स को यह बात न पता रही हो, परंतु उसकी मजबूत इच्छा शक्ति और दृढ़ता ने बड़ी से बड़ी बाधाओ को पार करके वह अवसर दिला दिया, जिसको वह तलास कर रहा था। अवसरों की एक खास बात होती है, ये बिल्कुल अलग अंदाज में हमारे सामने आते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं जैसा आपने सोचा होता है, उससे बिल्कुल अलग दिशा से भी ये अवसर अवतरित होते हैं। ऐसा कह सकते हैं कि अवसरों की यह चालाकी होती है कि वे पिछले दरवाजे से आते है और कई दफा तो दुर्भाग्य तथा क्षणिक हार के रूप में भी सामने आ जाते हैं। शायद यही कारण है कि अधिक से अधिक लोग इन अवसरों को पहचानने में चूक जाते है।

उस समय एडिशन ने एक नई डिवाइस खोजी थी, जिसका नाम एडिशन डिस्टार्टिंग मशीन था। बाद में उसे एडिफोन नाम से भी जाना गया एडिशन के सेल्समेन उस मशीन के लिए अधिक उत्साही नहीं थे उन्हें ऐसा लग रहा था कि इसे बेचने के लिए उन्हें कुछ अधिक ही प्रयास करना पड़ेगा। बर्न्स को इसी मौके की तो तलास थी। उसने इस अवसर का लाभ उठाया और तुरंत उस मशीन को बेचने की अपनी इच्छा जाहिर की। यह वह मशीन थी, जिसके लिए दुनिया में सिर्फ दो ही लोग उत्साहित थे, एक बर्न्स और दूसरा उस मशीन का अविष्कारक उसने इतनी सफलता पूर्वक इस मशीन को बेचा कि एडिशन ने बर्न्स को उस मशीन को संपूर्ण देश के बाजार में वितरित करने का कॉन्ट्रैक्ट ही दे दिया। इस व्यवसाय की सफलता ने इसे एक नया स्लोगन दे दिया 'Made by Edison and installed by Barnes' (एडिशन ने बनाया और बर्न्स ने लगाया ) यह व्यावसायिक संधि इतनी सफल हुई कि इसने बर्न्स को बहुत धनवान बना दिया। पर इससे अधिक उसने यह सिद्ध कर दिया कि अगर आप चाह ले तो आप भी अमीर बन सकते है।

असल में बर्न्स ने कितना धन कमाया, इसकी सही सही जानकारी तो नहीं है पर यह अनुमान हैं कि उस समय उसने 20 से 30 लाख डॉलर कमाए थे जो भी यह संख्या रही हो, यह उस ज्ञान के सामने फीकी पड़ जाती है, जिन नियमों की मदद से बर्न्स ने वह हासिल किया, जो वह असल में चाहता था।

बन्स ने तब यह सोच लिया था कि उसे एडिसन के साथ भागीदारी करनी है, जब उसके पास इसकी शुरुआत करने के लिए कुछ भी नहीं था। सिवाय इसके कि वह इस विचार को और दृढ़ता के साथ सोचे और इस पर पूरे इरादे के साथ अमल करे, जब तक वह उसे हासिल न कर ले।

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Rich Dad Poor Dad Book In Hindi Introduction


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     Rich Dad Poor Dad 

      By Robert Kiyosaki 

  रिच डैड पूअर डैड

             
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  1. ''अमीरी की चोटी पर के लिए पहुंचने के लिए आपको रिच डडै, पअुर डडै पढ़नी ही चाहिए। इससे आपको बाजार की और  पैसों की व्यावहारिक समझ मिलेगी, जिससे आपका आिथक भविष्य सुधर सकता है।"
  2. ''जो भी व्यक्ति भविष्य मे अमीर बनना चाहता है, उसे अपनी शुरूआत रिच डडै, पअुर डडै से करना चाहिए"।

About This Book

क्या किसी के दो डैड हो सकते है ? लेकिन इस बुक के राइटर के थे. उनके रिच डैड उन्हें पैसे की इम्पोर्टेंस सिखाते है और पूअर डैड वैल्यूज़ की. तो राइटर को अपने दोनों डैड के एक्सपिरियेंश से काफी कुछ सीखने को मिला जो वो अपने रीडर्स के साथ शेयर करते है,


1. इस बुक से हम क्या सीखेंगे?

अमीर लोग पैसे के लिए काम नहीं करते, बल्कि पैसा उनके लिए काम करता है।
आप कितना कमाते है इससे ज्यादा मायने रखता है कि आपके पास कितना है. अपने काम से काम रखना सीखिए।
टैक्स किस तरह काम करते है।
अमीर लोग पैसा इन्वेंट करते है।
सीखने के लिए काम करिए, पैसे के लिए नहीं. सीखिए किस तरह लाइफ की हर्डल्स को दूर किया जाए। 
शुरुवात कीजिए।


2.    ये बुक किस किसको पढनी चाहिए? 

बेशक ये बुक हर किसी के काम आ सकती है, हर वो इंसान जो अमीर बनना चाहता है वो इस बुक से सीख सकता है कि पैसे से पैसा कैसे कमाया जाता है. अमीर बनना भी एक आर्ट है और इस आर्ट को सीखने के लिए इस बुक के की- आईडियाज आपकी काफी हेल्प करेंगे.


3. इस बुक के ऑथर कौन है ? 

रोबर्ट टोरू कियोसाकी एक अमेरिकन बिजनेसमेन और ऑथर है, उनका जन्म 8 अप्रेल, 1947 को हुआ था. कियोसाकी रिच ग्लोबल एलएल सी और रिच डैड कंपनी के फाउंडर है जो बुक्स और वीडियोज के थ्रू लोगो को पर्सनल फाइनेंस और बिजनेस एजुकेशन प्रोवाइड कराती है. कंपनी का मेन रेवेन्यू सोर्स रिच डैड की फ्रेंचाइजी सेमिनार्स है जोकि इंडीपेंडेंट लोग कियोसाकी का ब्रांड नेम यूज़ करके कंपनी को फ़ीस के तौर पर देते हैं. कियोसाकी ने अब तक 26 से भी ज्यादा मोटीवेशनल सेल्फ हेल्प बुक्स लिखी है जिनमे सेरिच डैड पूअर डैड मोस्ट पोपुलर मानी जाती है। 

विषय वस्तु  
सबक 

इसकी बहुत ज़रूरत है
अध्याय एक : रिच डडै पुअर डडै
अध्याय दो : अमीर लोग पसै के लिए काम नहीं करते
अध्याय तीन : पैसों की समझ क्यों सिखाई जानी चािहए?
अध्याय चार : अपने काम से काम रखो 
अध्याय पाँच : टैक्स का इतिहास और कॉररेशन की ताक़त
अध्याय छह : अमीर लोग पैसा का अविष्कार करते है 
अध्याय सात :  सीखने के लिए काम करें - पैसा के लिए काम न करे 
अध्याय आठ :बाधाओं को पार करना सीखें 
अध्याय नौ : शुरू करना
अध्याय दस : और ज्यादा चाहिए 


प्रस्तावना 
इसकी बहुत जरूर है

                                 
क्या स्कूल बच्चो को असली जिंदगी के लिए तयैार करता है ? मेरे mummy-daddy कहते थे, ''मेहनत से पढ़ो और अच्छे नंबर लाओ क्योंकि ऐसा करोगे तो एक अच्छी तनखबा वाली नौकरी मिल जाएगी।'' उनके जीवन का लक्ष्य यही था कि मेरी बड़ी बहन की और मेरी कॉलेज की शिक्षा पूरी हो जाए। उनका मानना था कि अगर कॉलेज की शिक्षा पूरी हो गई तो हम जिंदगी ज्यादा कामयाब हो सकेगें। जब मैंने 1976 में अपना डिप्लोमा हािसल किया - मैं फोलोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी में अकाउंटिंग में ओनर्स के साथ ग्रैजुएट हुई और अपनी कक्षा में काफी उच्च स्थान पर रही - तो मेरी mummy-daddy  का लक्ष्य पूरा हो गया था। यह उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। "मास्टर प्लान" के हिसाब से, मुझे एक "बिग 8" अकाउंटिंग फर्म में नौकरी भी मिल गई। अब मुझे उम्मीद थी एक लंबे करियर और कम उम्र में रिटायरमेंट की।

मेरे पति माइकल भी इसी रास्ते पर चले थे। हम दोनों ही बहुत मेहनती परिवारों से आए थे बहुत अमीर नहीं थे। माइकल ने ऑनर्स के साथ अँजुएशन किया था, एक बार नहीं बल्कि दो जो बार पहली बार इंजीनियर के रूप में और फिर लॉ स्कूल से उन्हें जल्दी ही पेटेंट लॉ में विशेषज्ञता रखने वाली वॉशिंगटन, डी.सी. की एक मानी हुई तो फर्म में नौकरी मिल गई। और इस तरह उनका भविष्य भी सुनहरा लग रहा था। उनके करियर का नक्शा साफ़ था और यह बात तय थी कि वह भी जल्दी रिटायर हो सकते थे।

हालाँकि हम दोनों ही अपने करियर में सफल रहे, परंतु हम जो सोचते थे, हमारे साथ ठीक वैसा ही नहीं हुआ। हमने कई बार नौकरियाँ बदलीं- हालांकि हर बार नौकरी बदलने के कारण सही थे परंतु हमारे लिए किसी ने भी पेंशन योजना में निवेश नहीं किया। हमारे रिटायरमेंट फंड हमारे खुद के लगाए पैसों से ही बढ़ रहे हैं।

हमारी शादी बहुत सफल रही है और हमारे तीन बच्चे हैं। उनमें से दो कॉलेज में हैं और तीसरा अभी हाई स्कूल में गया ही है। हमने अपने बच्चों को सबसे अच्छी शिक्षा दिलाने में बहुत सा पैसा लगाया।

1996 में एक दिन मेरा बेटा स्कूल से घर लौटा स्कूल से उसका मोहभंग हो गया था| वह पढ़ाई से ऊब चुका था। "मैं उन विषयों को पढ़ने में इतना ज्यादा समय क्यों बर्बाद करूँ जो असल जिंदगी में मेरे कभी काम नहीं आएँगे?" उसने विरोध किया।

बिना सोचे- विचारे ही मैंने जवाब दिया, "क्योंकि अगर तुम्हारे अच्छे नंबर नहीं आए तो तुम कभी कॉलेज नहीं जा पाओगे "

" चाहे मैं कॉलेज जाऊँ या न जाऊँ, " उसले जवाब दिया, "मैं अमीर बनकर दिखाऊँगा।"
"अगर तुम कॉलेज से मैजुएट नहीं हुए तो तुम्हें कोई अच्छी नौकरी नहीं मिलेगी, "मैंने एक माँ की तरह चिंतित और आतंकित होकर कहा "बिना अच्छी नौकरी के तुम किस तरह अमीर बनने के सपने देख सकते हो?"

मेरे बेटे ने मुस्कराकर अपने सिर को बोरियत भरे अंदाज़ में हिलाया। हम यह वर्चा पहले भी • कई बार कर चुके थे। उसने अपने सिर को झुकाया और अपनी आँखें घुमाने लगा। मेरी समझदारी भरी सलाह एक बार फिर उसके कानों से भीतर नहीं गई थी। हालांकि वह स्मार्ट और प्रबल इच्छाशक्ति वाला युवक था परंतु वह नम्र और शालीन भी था।

"मम्मी," उसने बोलना शुरू किया और भाषण सुनने की बारी अब मेरी थी। "समय के साथ चलिए! अपने चारों तरफ देखिए; सबसे अमीर लोग अपनी शिक्षा के कारण इतने अमीर नहीं बजे है। माइकल जॉर्डन और मैडोना को देखिए यहाँ तक कि बीच में ही हार्वर्ड छोड़ देने वाले बिल मेट्स ने माइक्रोसॉफ्ट कायम किया। आज वे अमेरिका के सबसे अमीर व्यक्ति हैं और अभी उनकी उम्र भी तीस से चालीस के बीच ही है। और उस बेसबॉल पिचर के बारे में तो आपने सुना ही होगा जो हर साल चालीस लाख डॉलर से ज्यादा कमाता है जबकि उस पर 'विमानी तौर पर कमज़ोर होने का लेबल लगा हुआ है।

हम दोनों काफ़ी समय तक चुप रहो अब मुझे यह समझ में आने लगा था कि मैं अपने बच्चे को वही सलाह दे रही थी जो मेरे माता-पिता ने मुझे दी थी। हमारे चारों तरफ की दुनिया बदल रही थी, परंतु हमारी सलाह नहीं बदली थीं। अच्छी शिक्षा और अच्छे ब्रेड हासिल करना अब सफलता की गारंटी नहीं रह गए थे और हमारे बच्चों के अलावा यह बात किसी की समझ में नहीं आई थी।

"मम्मी," उसने आगे कहा "मैं डैडी और आपकी तरह कड़ी मेहनत नहीं करना चाहता आपको काफ़ी पैसा मिलता है और हम एक शानदार मकान में रहते हैं जिसमें बहुत से क्रीमती सामान हो अगर में आपकी सलाह मानूँगा तो मेरा हाल भी आपकी ही तरह होगा। मुझे भी ज़्यादा मेहनत करनी पड़ेगी ताकि मैं ज्यादा टैक्स भर सकूँ और कर्ज में डूब जाऊँ। वैसे भी आज की दुनिया में नौकरी की सुरक्षा बची नहीं है। में यह जानता हूँ कि छोटे और सही आकार की फर्म कैसी होती है। मैं यह भी जानता हूँ कि आज के दौर में कॉलेज के स्नातकों को कम तनख्वाह मिलती है जबकि आपके जमाने में उन्हें ज़्यादा तनख्वाह मिला करती थी। डॉक्टरों को देखिए। वे अब उतना पैसा नहीं कमाते जितना पहले कभी कमाया करते थे। मैं जानता हूँ कि मैं रिटायरमेंट के लिए सामाजिक सुरक्षा या कंपनी पेंशन पर भरोसा नहीं कर सकता। अपने सवालों के मुझे नए जवाब चाहिय "

वह सही था। उसे नए जवाब चाहिए थे और मुझे भी मेरे माता-पिता की सलाह उन लोगों के लिए सही हो सकती थी जो 1945 के पहले पैदा हुए थे पर यह उन लोगों के लिए विनाशकारी • साबित हो सकती थी जिन्होंने तेज़ी से बदल रही दुनिया में जन्म लिया था। अब मैं अपने बच्चों से यह सीधी सी बात नहीं कह सकती थी, "स्कूल जाओ, अच्छे ब्रेड हासिल करो और किसी सुरक्षित नौकरी की तलाश करो। "मैं जानती थी कि मुझे अपने बच्चों की शिक्षा को सही दिशा देने के लिए नए तरीको की खोज करनी होगी।

एक माँ और एक अकाउंटेंट होने के जाते में इस बात से परेशान थी कि स्कूल में बच्चों को धन संबंधी शिक्षा या वित्तीय शिक्षा नहीं दी जाती। हाई स्कूल खत्म होने से पहले ही आज के युवाओं के पास अपना क्रेडिट कार्ड होता है। यह बात अलग है कि उन्होंने कभी धन संबंधी पाठ्यक्रम में भाग नहीं लिया होता है और उन्हें यह भी नहीं पता होता है कि इसे किस तरह निवेश किया जाता है। इस बात का ज्ञान तो दूर की बात है कि क्रेडिट कार्ड पर चक्रवृद्धि ब्याज की गणना किस तरह की जाती हैं। इसे आसान भाषा में कहें तो उन्हें धन संबंधी शिक्षा नहीं मिलती और यह ज्ञान भी नहीं होता कि पैसा किस तरह काम करता है। इस तरह वे उस दुनिया का सामना करने के लिए कभी तैयार नहीं हो पाते जो उनका इंतजार कर रही हैं। एक ऐसी दुनिया जिसमें बचत से ज्यादा खर्च को महत्व दिया जाता है।

जब मेरा सबसे बड़ा बेटा कॉलेज के शुरूआती दिनों में अपने क्रेडिट कार्ड को लेकर कर्ज में डूब गया तो मैंने उसके क्रेडिट कार्ड को नष्ट करने में उसकी मदद की। साथ ही में ऐसी तरकीब भी खोजने लगी जिससे मेरे बच्चों में पैसे की समझ आ सके।

पिछले साल एक दिन मेरे पति ने मुझे अपने ऑफिस से फोन किया। "मेरे सामने एक सज्जन बैठे हैं और मुझे लगता है कि तुम उससे मिलना चाहोगी।" उन्होंने कहा, "उनका नाम रॉबर्ट कियोसाकी है। वे एक व्यवसायी और निवेशक हैं तथा वे एक शैक्षणिक उत्पाद का पेटेंट करवाना चाहते हैं। मुझे लगता है कि तुम इसी चीज़ की तलाश कर रही थीं।"

जिसकी मुझे तलाश थी

मेरे पति माइक रॉबर्ट कियोसाकी द्वारा बनाए जा रहे नए शैक्षणिक उत्पाद कैशपलो से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने इसके परीक्षण में हमें बुलवा लिया। यह एक शैक्षणिक खेल था, इसलिए मैंने स्थानीय विश्वविद्यालय में पढ़ रही अपनी 19 वर्षीय बेटी से भी पूछा कि क्या वह मेरे साथ चलेगी और वह तैयार हो गई।

• इस खेल में हम लगभग पंद्रह लोग थे जो तीन समूहों में विभाजित थे।

माइक सही थे। मैं इसी तरह के शैक्षणिक उत्पाद की खोज कर रही थी। यह किसी रंगीन मोनोपॉली बोर्ड की तरह लग रहा था जिसके बीच में एक बड़ा सा चूढ़ा था। परंतु मोनोपॉली से यह इस तरह अलग था कि इसमें दो रास्ते थे एक अंदर और दूसरा बाहरा खेल का लक्ष्य था अंदर वाले रास्ते से बाहर निकलना जिसे रॉबर्ट 'चूहा दौड़' कहते थे और बाहरी रास्ते पर पहुँचना, या 'तेज़ रास्ते पर जाना। रॉबर्ट के मुताबिक तेज़ रास्ता हमें यह बताता है कि असल जिंदगी में अमीर लोग किस तरह पैसे का खेल खेलते हैं।

रॉबर्ट ने हमें 'चूहा दौड़' के बारे में बताया :

"अगर आप किसी भी औसत रूप से शिक्षित, कड़ी मेहनत करने वाले आदमी की जिंदगी को देखें, तो उसमें आपको एक-सा ही सफर दिखेगा। बच्चा पैदा होता है। स्कूल जाता है। माता पिता खुश हो जाते हैं, क्योंकि बच्चे को स्कूल में अच्छे नंबर मिलते हैं और उसका दाखिला कॉलेज में हो जाता है। बच्चा स्नातक हो जाता हैं और फिर योजना के अनुसार काम करता है। वह किसी आसान, सुरक्षित नौकरी या करियर की तलाश करता है। बच्चे को ऐसा ही काम मिल जाता है। शायद वह डॉक्टर या वकील बन जाता है या वह सेना में भर्ती हो जाता है या फिर वह सरकारी नौकरी करने लगता है। बच्चा पैसा कमाने लगता है, उसके पास थोक में क्रेडिट कार्ड •आने लगते हैं और अगर अब तक उसने खरीदारी करना शुरू नहीं किया है तो अब जमकर खरीदारी शुरू हो जाती हैं।

"खर्च करने के लिए पैसे पास में होते हैं तो वह उन जगहों पर जाता है जहाँ उसकी उम्र के ज्यादातर नौजवान जाते हैं- लोगों से मिलते हैं, डेटिंग करते हैं और कभी-कभार शादी भी कर लेते हैं। अब जिंदगी में मज़ा आ जाता है, क्योंकि आजकल पुरुष और महिलाएँ दोनों नौकरी करते हैं। दो तनख्वाहें बहुत सुखद लगती हैं। पति-पत्नी दोनों को लगता है कि उनकी ज़िंदगी सफल हो गई है। उन्हें अपना भविष्य सुनहरा नज़र आता है। अब वे घर, कार, टेलीविज़न खरीदने का फ़ैसला करते हैं, छुट्टियाँ मनाने कहीं चले जाते हैं और फिर उनके बच्चे हो जाते हैं। बच्चों के •साथ उनके खर्चे भी बढ़ जाते हैं। खुशहाल पति-पत्नी सोचते हैं कि ज़्यादा पैसा कमाने के लिए अब उन्हें ज़्यादा मेहनत करनी चाहिए उनका करियर अब उनके लिए पहले से ज्यादा मायने रखता है। वे अपने काम में ज्यादा मेहनत करने लगते हैं ताकि उन्हें प्रमोशन मिल जाए या उनकी तनख्वाह बढ़ जाए तनख्वाह बढ़ती हैं पर उसके साथ ही दूसरा बच्चा पैदा हो जाता है। अब उन्हें एक बड़े घर की जरूरत महसूस होती है। वे नौकरी में और भी ज़्यादा मेहनत करते हैं बेहतर कर्मचारी बन जाते हैं और ज्यादा मन लगाकर काम करने लगते हैं। ज्यादा विशेषज्ञता हासिल करने के लिए वे एक बार फिर किसी स्कूल में जाते हैं ताकि वे ज़्यादा पैसे कमा सके। हो सकता है कि वे दूसरा काम भी खोज लें। उनकी आमदनी बढ़ जाती हैं, परंतु उस आमदनी पर उन्हें इक्रा टैक्स भी चुकाना पड़ता है। यही नहीं, उन्होंने जो बड़ा घर खरीदा है उस पर भी टैक्स देना होता है। इसके अलावा उन्हें सामाजिक सुरक्षा का टैक्स तो चुकाना ही है। इसी तरह, बहुत से टैक्स चुकाने चुकाते उनकी तनख्वाह चुक जाती है। वे अपनी बड़ी हुई तजख्वाद लेकर घर आते हैं और हैरान होते हैं कि इतना सारा पैसा आखिर कहाँ बता जाता है। भविष्य के लिए बचत के हिसाब से वे कुछ म्यूचुअल फंड भी खरीद लेते हैं और अपने क्रेडिट कार्ड से घर का किराना खरीदते हैं। उनके बच्चों की उम्र अब 5 या 6 साल हो जाती हैं। यह चिंता भी उन्हें सताने लगती है कि बच्चों के कॉलेज की शिक्षा के लिए भी बचत ज़रूरी है। इसके साथ ही उन्हें अपने रिटायरमेंट के लिए पैसा बचाने की चिंता भी सताने लगती है।"

"35 साल पहले पैदा हुए यह खुशहाल दंपति अब अपनी नौकरी के बाकी दिन चूहा दौड़ में फँसकर बिताते हैं वे अपनी कंपनी के मालिकों के लिए काम करते हैं, सरकार को टैक्स चुकाने के लिए काम करते हैं, और बैंक में अपनी मिश्खी संपत्ति तथा क्रेडिट कार्ड के कर्ज को चुकाने के लिए काम करते हैं।

" फिर वे अपने बच्चों को यह सलाह देते हैं कि उन्हें मन लगाकर पढ़ना चाहिए अच्छे नंबर लाने चाहिए और किसी सुरक्षित नौकरी की तलाश करनी चाहिए वे पैसे के बारे में कुछ भी नहीं सीखते और इसीलिए वे जिंदगी भर कड़ी मेहनत करते रहते हैं। यह प्रक्रिया पीढ़ी दर पीढ़ी चलली रहती है। इसे 'चूहा दौड़' कहते हैं।"

"चूहा दौड" से निकलने का एक ही तरीका है और वह यह कि आप अकाउंट्स और इन्वेस्टमेंट दोनों क्षेत्रों में निपुण हो जाएँ। दिक्कत यह है कि इन दोनों ही विषयों को बोरिंग और कठिन माना जाता है। मैं खुद एक सी. पी. ए. हूँ और मैंने बिग 8 अकाउंटिंग फर्म के लिए काम किया है। मुझे यह देखकर ताज्जुब हुआ कि रॉबर्ट ने इन दोनों बोरिंग और कठिन विषयों को सीखना कितना रोचक, सरत और रोमांचक बना दिया था। सीखने की प्रक्रिया इतनी अच्छी तरह छुपा ली गई थी कि जब हम "चूहा दौड़" से बाहर निकलने के लिए जी जान लगा रहे थे तो हमें यह ध्यान ही नहीं रहा कि हम कुछ सीख रहे थे।

शुरू में तो हम एक नए शैक्षणिक खेल का परीक्षण कर रहे थे, परंतु जल्दी ही इस खेल में मुझे और मेरी बेटी को मज़ा आने लगा। खेल के दौरान हम दोनों ऐसे विषयों पर बात कर रहे थे जिनके बारे में हमने पहले कभी बातें नहीं की थीं। एक लेखापाल होने के कारण इन्क्रम स्टेटमेंट और बैलेंस शीट से जुड़ा खेत खेलने में मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। मैंने खेल के नियम और इसकी बारीकियाँ समझाने में अपनी बेटी और दूसरे लोगों की मदद भी की। उस रोज़ में 'चूहा दौड़' से सबसे पहले बाहर निकली और केवल मैं ही बाहर निकल पाई। बाहर निकलने में मुझे 50 मिनट का समय लगा हालाँकि खेल लगभग तीन घंटे तक चला।

मेरी टेबल पर एक बैंकर बैठा था। इसके अलावा एक व्यवसायी था, और एक कंप्यूटर प्रोग्रामर भी था। मुझे यह देखकर बहुत हैरत हुई कि इन लोगों को अकाउंटिंग या इन्वेस्टमेंट के बारे में कितनी कम जानकारी हैं, जबकि ये विषय उनकी जिंदगी में कितनी ज्यादा एहमियत रखते हैं। मेरे मन में यह सवाल भी उठ रहा था कि वे असल जिंदगी में अपने पैरो-थेो के कारोबार को कैसे सँभालते होंगे। मैं यह समझ सकती थी कि मेरी 19 साल की बेटी क्यों नहीं समझ सकती, पर ये लोग तो उससे दुगनी उम्र के थे और उन्हें ये बातें समझ में आनी चाहिए थीं।

'चूहा दौड़' से बाहर निकलने के बाद में दो घंटे तक अपनी बेटी और इन शिक्षित अमीर वयस्कों को पाँसा फेंकने और अपना बाज़ार फैलाते देखती रही। हालाँकि मैं खुश थी कि वे लोग कुछ नया सीख रहे थे, लेकिन मैं इस बात से बहुत परेशान और विचलित भी थी कि वयस्क लोग सामान्य अकाउंटिंग और इन्वेस्टमेंट के मूलभूत बिंदुओं के बारे में कितना कम जानते थे उन्हें अपने इन्कम स्टेटमेंट और अपनी बैलेंस शीट के आपसी संबंध को समझने में ही बहुत समय लगा। अपनी संपत्ति खरीदने और बेचते समय उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि हर सौदे से उनकी महीने की आमदनी पर असर पड़ रहा हो मैंने सोचा, असल जिंदगी में ऐसे करोड़ों लोग होंगे जो पैसे के लिए सिर्फ इसलिए परेशान हो रहे हैं, क्योंकि उन्होंने ये दोनों विषय कभी नहीं पड़े।

गंजे मन में सोया, भगवान का शुक्र हैं कि हमें मजा आ रहा है और हमारा लक्ष्य खेत में जीवना है। जब खेल खत्म हो गया तो रॉबर्ट ने हमें पंद्रह मिनट तक कैशपलो पर चर्चा करने और इसकी समीक्षा करने के लिए कहा।

मेरी टेबल पर बैठा व्यवसायी खुश नहीं था। उसे खेत पसंद नहीं आया था। "मुझे यह सब जानने की कोई ज़रूरत नहीं हैं, "उसने ज़ोर से कहा । "मेरे पास इन सबके लिए अकाउंटेंट, बैंकर और वकील हैं, जिन्हें यह सब मालुम है।"

रॉबर्ट का जवाब था, "क्या आपने गौर किया है कि ऐसे बहुत से अकाउंटेंट हैं जो अमीर नहीं हैं? और यही हाल बैंकर्स, वकीलों, स्टॉक ब्रोकर्स और रियल एस्टेट ब्रोकर्स का भी है। वे बहुत कुछ जानते हैं और प्राय: वे लोग स्मार्ट होते हैं परंतु उनमें से ज्यादातर अमीर नहीं होते। चूँकि हमारे स्कूल हमें वह सब नहीं सिखाते जो अमीर लोग जानते हैं, इसलिए हम इन लोगों से सलाह लेते हैं। परंतु एक दिन जब आप किसी हाईवे पर कार से जाते हैं, आप ट्रैफिक जाम में फँस जाते हैं। आप बाहर निकलने के लिए छटपटाते हैं। जब आप अपनी दाई तरफ देखते हैं तो वहाँ आप देखते हैं कि आपका अकाउंटेंट भी उसी ट्रैफिक जाम में फँसा हुआ है। फिर आप अपनी बाई तरफ देखते हैं और आपको वहाँ अपना बैंकर भी उसी हाल में नज़र आता है। इससे आपको हालात का अंदाज़ा हो जाएगा।"

कंप्यूटर प्रोग्रामर भी इस खेल से प्रभावित नहीं हुआ था। "यह सीखने के लिए में सॉफ्टवेयर खरीद सकता है।"

बैंकर ज़रूर प्रभावित हुआ था। "मैंने स्कूल में अकाउंटिंग सीखी थी, परंतु मैं अब तक यह नहीं समझ पाया था कि इसे असल जिंदगी में किस तरह काम में लाया जाए अब मैं समझ गया ही मुझे 'चूहा दौड़' से बाहर निकलने के लिए खुद को तैयार करने की ज़रूरत हैं।"

Next Chapter :-------                   Read Now 



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