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The Psychology Of Money Book Summary In Hindi Introduction


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The Psychology of Money
By Morgan Housel



विषय - सूची

प्रस्तावना: पृथ्वी पर सबसे बड़ा प्रदर्शन
1. कोई भी मूर्ख नहीं है 
2. भाग्य और जोखिम
3. कभी भी पर्याप्त नहीं 
4. विस्मयकारी कंपाउंडिंग
5. धनवान बनना बनाम धनवान बने रहना
6. पट, आप जीते
7 स्वतंत्रता
8. कार में बैठे आदमी का विरोधाभास
9. संपत्ति वह है जो आपको दिखाई नहीं देती
10 धन-संपत्ति की बचत करें
11. यथोचित तर्कशील 
12. अप्रत्याशित!
13. त्रुटि के लिये जगह
14. आप बदलेंगे
15. कुछ भी मुफ्त नहीं होता
16. आप और मैं
17. निराशावाद का बहकावा 
18. जब आप कुछ भी मान लेंगे
19. अब सब साथ में 
20. स्वीकारोक्तियाँ


                            प्रस्तावना

                     पृथ्वी पर सबसे बड़ा प्रदर्शन


मैंने अपने कॉलेज के वर्ष लॉस एन्जेलस के एक बढ़िया होटल में सेवक के रूप में बिताये। वहाँ एक तकनीकी कार्यकारी अतिथि के रूप में अक्सर आया करता था। वह काफ़ी प्रतिभावान था, उसने लगभग 20 वर्ष से कुछ ही अधिक की आयु में वाई-फ़ाई का एक मुख्य घटक डिज़ाइन कर पेटेंट किया था। वह कई कंपनियां शुरू करके बेच चुका था और बेतहाशा कामयाब था ।


धन संपत्ति के साथ उसका जो संबंध था, उसे मैं असुरक्षा और बचकानी मूर्खता का मेल कहूँगा ।

वह सौ डॉलर के नोटों की कई इंच मोटी गड्डी साथ लेकर घूमता था, जिसे वह हर किसी को दिखाता था, फिर चाहे वे देखना चाहते हों या नहीं। वह बिना किसी संदर्भ के अपनी धन सम्पदा की खुलकर डींग मारता, खासकर जब वह नशे में धुत होता ।


एक दिन उसने मेरे एक सहकर्मी को कई हज़ार डॉलर की रकम दी और कहा, “गली में जो जवाहरात की दुकान है, वहाँ जाओ और $1000 के कुछ सोने के सिक्के लेकर आओ।"


एक घंटे बाद, हाथ में सोने के सिक्के लिये, वह कार्यकारी और उसके दोस्त एक डॉक के चारों तरफ़ इकट्ठा हो गये जो प्रशांत महासागर के सामने था। फिर उन्होंने उन सिक्कों को पानी में फेंकना शुरू कर दिया। वे उन सिक्कों को कंकरों की तरह उछालते, और फिर किसका सिक्का सबसे दूर गया, इस बात पर बहस करते और ठहाके मार कर हँसते। सिर्फ़ मनोरंजन के लिये। कुछ दिनों बाद उसने होटल के रेस्त्रां में एक लैंप तोड़ दिया।


एक मैनेजर ने उससे कहा कि वह $500 का लैंप था और उसे उसकी भरपाई करनी होगी। "तुम्हें $500 चाहिये?” कार्यकारी ने अविश्वासपूर्वक पूछा और जेब से नोटों की एक गड्डी निकाल कर मैनेजर को देते हुए कहा, "ये रहे पाँच हज़ार डॉलर। अब मेरे सामने से दफ़ा हो जाओ। और फिर कभी भी दोबारा इस तरह मेरी बेइज़्ज़ती मत करना। "


आप सोच रहे होंगे कि आख़िर इस तरह का व्यवहार कब तक चल सकता था, और इसका जवाब है "ज़्यादा दिन नहीं। कई वर्षों बाद मुझे पता चला कि वह दिवालिया हो गया।


इस किताब का आधार यह है कि धन-संपत्ति के मामले में आप कितना अच्छा प्रबंधन करते हैं, यह इस पर कम निर्भर करता है कि आप कितने होशियार हैं और इस पर ज़्यादा कि आपका व्यवहार कैसा है और व्यवहार सिखाना कठिन कार्य है, उन्हें भी जो वास्तव में होशियार हैं।


एक प्रतिभाशाली व्यक्ति, जो अपनी भावनाओं का नियंत्रण खो दे, एक वित्तीय आपदा हो सकता है। इसका विपरीत भी उतना ही सत्य है सामन्य व्यक्ति जिन्हें वित्तीय ज्ञान नहीं हैं, धनी हो सकते हैं अगर उनके पास कुछ ऐसे व्यावहारिक कौशल हों जिनके लिये बुद्धिमत्ता की औपचारिक युक्तियों की आवश्यकता नहीं होती।


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The alchemist book summary in hindi (द अल्कमिस्ट बुक समरी इन हिन्दी)


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About Book

अलकेमिस्ट सेंटियागो नाम के एक लड़के की कहानी है जो अपनी पर्सनल लेजेंड (अपनी डेस्टिनी ) को हासिल करना चाहता है. वो दूर-दूर के जगहों की यात्रा करता है और अलग अलग तरह के लोगों से मिलता है. अंत में, सैंटियागो को समझ में आता है कि वो जो खजाना ढूंढ रहा है, वह उसके अंदर ही है. अगर आपका कोई ऐसा सपना है जो आप पाना चाहते हैं, तो ये बुक आपके लिए है. आप इसमें कई लेसन सीखेंगे जो आपकी जर्नी में आपकी मदद करेंगे.


यह बुक किसे पढनी चाहिए

सभी ऐज और प्रोफेशन के लोगों के लिए, स्टूडेंट्स, एम्प्लॉईज़, मदर्स, जो रिटायर हो चुके उनके लिए


ऑथर के बारे में 

पाउलो कोएहलो इंटरनेशनल बेस्ट सेल्लिंग बुक के ऑथर हैं. वो चार दशकों से नॉवेल लिख रहे हैं. उनकी कहानियां ज्ञान, इंस्पिरेशन और यादगार पात्रों से भरी हुई है.



द अल्केमिस्ट पार्ट 1.

ये स्टोरी एक शेपहर्ड लड़के की है जिसका नाम सेंटीयागो था. वो स्पेन के एंडाल्यूसिया में रहता था और भेड़े चराता था. एक बार वो अपनी शीप्स चराते हुए किसी जगह पर पहुंचा जहाँ एक शॉपकीपर की काले बालो वाली सुंदर लड़की से उसकी मुलाकात हुई जो उससे उन खरीदने आती थी. सेंटीयागो को वो लड़की बड़ी अच्छी लगती थी और हर बार की तरह इस साल भी वो उस लड़की से मिलने की उम्मीद में उसी जगह पर वापस जाने की सोच रहा था. वो स्पेन के हिंटरलैंड एरिया में अपनी शीप्स लेके घूमता था जहाँ घास और पानी की कोई कमी नहीं थी.


रात में ठंड से बचने के लिए वो एक जैकेट रखता था लेकिन दिन में बड़ी गर्मी होती थी इसलिए उसे जैकेट लेके घूमना पसंद नहीं था. "लेकिन लाइफ में किसी भी चेंज के लिए रेडी रहना चाहिए, चाहे दिन हो या रात या लाइफ में बड़ी चीज़े" ये खुद बात से कहा करता था क्योंकि जैकेट उसे रात में ठंड से बचाती थी. उस लड़के की फेमिली चाहती थी कि वो एक प्रीस्ट बने लेकिन उस लड़के को ट्रेवल करने का बड़ा शौक था इसलिए वो एक शीपहर्ड बन गया ताकि वो अपनी शीप्स के साथ हमेशा घूमता रहे. उसे एक ही ड्रीम दो बार आया जब रात में वो एक चर्च के एक टूटे हुए कमरे में सो रहा था जहाँ पर एक बड़ा सा पेड़ उग आया था. फिर वो एक मिस्टिक लेडी से मिलने तारीफा नाम के टाउन में जो ड्रीम्स के मतलब बताती थी.


तो उस जिप्सी औरत ने उस लड़के के ड्रीम का मतलब ये बताया कि उसे ईजिप्ट के पिरामिड जाना चाहिए जहाँ उसे एक खजाना मिलेगा. और जब उसे वो खजाना मिल जाए तो उसका दसंवा हिस्सा फीस के तौर पर वो उस जिप्सी लेडी को दे दे. लेकिन उस लड़के ने इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और टाउन में घूमने लगा. फिर उसे एक ओल्ड मेन मिला. पहले तो सेंटीयागो उससे बात करने में ज़रा भी इंटरेस्ट नहीं था लेकिन उस ओल्ड मेन की विजडम ने उसे इम्प्रेस कर दिया और वे दोनों बाते करने लगे. उस ओल्ड मेन ने बताया कि वो सालेम का राजा है. उसने सेंटीयागो को अपने ड्रीम यानी खजाने तक पहुँचने में हेल्प भी की. उसने सेंटियागो को ये भी बताया कि वो अक्सर लोगो को उनकी डेस्टिनी तक पहुँचने में किसी ना किसी तरह से हेल्प करता है.


अब क्योंकि सेंटियागो ने अपनी डेस्टिनी तक पहुँचने से पहले ही हार मान ली थी इसलिए वो उसे सही रास्ता दिखाने के लिए उसके पास आया था. उस ओल्ड मेन ने उससे कहा कि लाइफ हमेशा हमें कुछ साइन या क्ल्यूज़ देती है ताकि हम राईट डायरेक्शन चूज़ कर सके. फिर उसने सेंटियागो से कहा कि उसे बाकि की गाइडेंस लेसन के लिए फीस के तौर पे अपनी शीप्स का दसवा हिस्सा देना होगा. अगले दिन सेंटियागो फिक्स टाइम पर उस ओल्ड मेन से मिला जिसने उसे दो स्टोंस यानी पत्थर दिए. इनमे से एक स्टोन ब्लैक था और दूसरा व्हाईट. उस ओल्ड मेन ने सेंटियागो से कहा कि अपनी मंजिल की तलाश में अगर उसे कभी भी कोई कन्फ्यूजन हो तो इन दोनों स्टोंस की हेल्प से वो अपना डिसीज़न ले सकता है.


उसने उसे ये भी एडवाइस दी कि अगर उसे कोई गुड ओमेन दिखे तो ध्यान रखे जो उसे उसकी डेस्टिनी तक पहुँचने में हेल्प करेंगे. तभी अचानक एक बटरफ्लाई सेंटियागो के फेस के उपर से उडी जोकि एक गुड ओमेन था. और फिर उसी दिन वो लड़का एफ्रिका के टंगीयर नाम की जगह पहुंचा. वहां पर वो एक बार में बैठा था कि एक आदमी उसके पास आया. उस आदमी में स्पेनिश में उससे पुछा कि वो इस नयी जगह में क्या करने आया है. अब उस लड़के के लिए ये एक और ओमेन था. सेंटियागो ने उसे कहा कि उसे पिरामिड्स तक जाना है और अगर वो आदमी गाइड बनाकर उसे वहां तक ले जाए तो वो उसे पैसे देगा. वो आदमी सेंटियागो से पैसे लेकर बिज़ी मार्किट में कहीं गायब हो गया और सेंटियागो देखता रह गया.


वो बड़ा उदास हुआ फिर अचानक उसे वो दो स्टोंस याद आये. जब उसने वो स्टोंस अपनी पॉकेट से निकाले तो उसे उस ओल्ड मेन की बात याद आ गयी. उस ओल्ड मेन ने कहा था" अगर तुम किसी चीज़ को दिल से चाहो तो ये सारी कायनात उसे तुमसे मिलाने में मदद करती हैं" उन दो स्टोंस को देखके सेंटियागो को लगा कि जैसे वो ओल्ड मेन एक स्पिरिट की तरह उसके साथ है और उसे खजाने की खोज में आगे बढ़ने के लिए इंस्पायर कर रहा है. अपना पैसा खोने के बावजूद सेंटियागो ने हार नहीं मानी और अपने शिपहर्ड के एक्स्पिरियेश से किसी तरह उस अजनबी शहर में सर्वाइव कर लिया. अब उसका सेल्फ बीलीफ़ और कोंफिडेंश और भी स्ट्रोंग हो गया था फिर उसे एक क्रिस्टल सेलर मिला.


सेंटियागो ने उस क्रिस्टल सेलर से कहा कि अगर वो उसे खाना खिला दे तो बदले में वो उसका कुछ काम कर सकता है. उस शॉप कीपर ने उसे लंच कराया और फिर उससे अपनी शॉप में रखी ग्लास की चीज़े साफ़ करने को कहा. जब वो ग्लासवेयर साफ़ कर रहा था तो उसी टाइम शॉप में दो कस्टमर्स ने आकर कुछ सामान खरीदा. अब वो शॉप वाला भी ओमेन में बीलिव करता था तो उसने सेंटियागो को हमेशा के लिए काम पे रख लिया. लेकिन सेंटियागो को वहां काम नहीं करना था, उसे तो पिरामिड्स जाने के लिए पैसो की ज़रूरत थी. उसकी बात सुनकर वो शॉप वाला हंसा और उसने बताया कि पिरामिड्स वहां से हज़ारो किलोमीटर दूर है और वहां तक जाने के लिए ढेर सारा पैसा चाहिए. ये सुनकर सेंटियागो का इरादा बदलने लगा उसने सोचा क्यों ना काम करके इतना पैसा कमाया जाए कि वो वापस अपने नेटिव प्लेस जाकर शीप्स खरीदे और फिर से शिपहर्ड का काम शुरू कर दे.


पार्ट 2.


वो लड़का क्रिस्टल्स के लिए एक नया केबिनेट बनाना चाहता था ताकि वो जल्द से जल्द ढेर सारा पैसा कमा सके और वापस अपने टाउन जाकर शिपहर्ड का काम शुरू कर सके. शॉप कीपर ने उसकी बात मान ली क्योंकि उसे सेंटियागो से सिम्पेथी थी. वो खुद कई सालो से मक्का जाने का ख्वाब देख रहा था लेकिन कभी जा नहीं पाया था तो इसलिए वो चाहता था कि कम से कम सेंटियागो की विश पूरी हो. इसलिए उसने सेंटियागो को एडवाइस दी कि उसे क्रिस्टल के ग्लासों में चाय बेचनी चाहिए जिससे ज्यादा कस्टमर अट्रेक्ट हो सके. हालांकि उसकी शॉप अच्छी चल रही थी और उसे ज्यादा मेहनत करके शॉप को एक्सपेंड करने की कोई जरूरत नहीं थी फिर भी वो सेंटियागो की हेल्प करने के लिए तैयार हो गया.


क्योंकि सेंटियागो की डेस्टिनी में उस शॉप कीपर के इस डिसीज़न का भी कंट्रीब्यूशन था. और इस डिसीज़न से एक बड़ा चेंज आया क्योंकि क्रिस्टल ग्लास में चाय बेचने से ये शॉप बड़ी फेमस हो गयी थी और इसे एक बड़ी कमर्शियल सक्सेस मिली थी. जब सेंटियागो के पास काफी पैसा जमा हो गया तो उसने अपने घर वापस जाने का डिसीजन लिया, लेकिन जाने से पहले वो शॉपकीपर से ब्लेस्सिंग्स लेना चाहता था. शॉप कीपर ने उसे ब्लेस्सिंग दी और साथ ही ये प्रेडिक्ट भी किया कि सेंटियागो वापस स्पेन नहीं जा पायेगा.


सेंटियागो ने अपना सारा सामान समेटा और किंग के दिए दो स्टोंस भी अपनी पॉकेट में रख लिए. जैसे ही वो एंडाल्यूसिया जाने के लिए तैयार हुआ कि तभी उसे एक ख्याल आया. जो कुछ भी अब तक उसके साथ हुआ था, उसने उस सब के बारे में सोचा. उसे अचानक ख्याल आया कि वो जब चाहे अपने देश जाकर शीप्सहर्ड बन सकता है लेकिन पिरामिड्स जाने का मौका उसे दुबारा नहीं मिलेगा. किंग के दिए उन दो स्टोंस को देखकर उसे ये ख्याल आया था. वो अपने डिसीजन पर गौर करने लगा. अब उसने अपना माइंड चेंज कर लिया था और पिरामिड्स जाने के लिए निकल पड़ा. वो एक वेयर हाउस पहुंचा जहाँ उसे एक इंग्लिशमेन मिला जो काफी बातो मे सेंटियागो की तरह था


वो आदमी उन दो स्टॉस को भी पहचानता था जो सेंटियागो के पास थे. ये और ओमेन था सेंटियागो के लिए. फिर वे दोनों ईजिप्ट जाने वाले एक कारवाँ के साथ-साथ चलने लगे जिसका सरदार एक दाड़ी वाला आदमी था. वो कारवाँ एक रेगिस्तान से गुज़र रहा था. कारवाँ में पहले तो काफी चहल पहल हो रही थी लेकिन फिर सब चुपचाप चलने लगे. जर्नी के दौरान सेंटियागो की अपने ऊंट चलाने वाले से दोस्ती हो गयी और दोनों अपनी-अपनी लाइफ के बारे में एक दुसरे को बताने लगे. दोनों को एक फिलोसिफिकल ट्रऊथ का एहसास हुआ. उन्हें फील हुआ कि जैसे डेस्टिनी ने हर चीज़ पहले से प्लान कर रखी है क्योंकि लाइफ में हर एक चीज़ किसी दूसरी चीज़ से जुडी हुई है.


जर्नी के बीच-बीच में उन्हें बेडूइन्स भी मिल जाते थे जोकि डेजर्ट के मिस्टीरियस प्रोटेक्टर ट्राइब थे. वे उन्हें डेजर्ट के डाकुओ और आने वाले खतरों के बारे में अलार्म करके फिर से गायब हो जाते थे. एक बार तो उन्हें ये भी इन्फोर्मेशन मिली कि ट्राइबल्स के बीच में वार होने वाली है जिसे सुनकर सारे लोग डर गए थे लेकिन वापस लौटना अब पोसिबल नहीं था. और जब वापस जाना मुमकिन ना हो तो आगे बढ़ते रहना ही एक पोसिबल रास्ता होता है।


पार्ट 3.


जैसे जैसे वे लोग आगे बढ़ रहे थे, वो इंग्लिशमेन डेजर्ट में और ज्यादा इंटरेस्ट लेता गया और वो लड़का उस इंग्लिशमेन की बुक्स में. तो ये एक तरह का छोटा सा रोल रिवर्सल था. वो इंग्लिशमेन किसी भी मेटल को गोल्ड में चेंज करने के आर्ट यानी कि अल्केमी में इंट्रेस्टेड था. लेकिन सेंटियागो जितना उन बुक्स को पढता गया उतना ही ज्यादा कन्फ्यूज़ होता गया क्योंकि उसे उन बुक्स की लेंगुएज और उनमे बने सिम्बल्स कुछ समझ नहीं आ रहे थे. वो ये सब ईजी वे में सीखना चाहता था लेकिन उस इंग्लिशमेन ने कहा" हायर नॉलेज उसी को मिलती है जो खूब सारा टाइम देकर बड़ी मेहनत से ये किताबे पढ़ते है...


अब उनका कारवाँ तेज़ी से आगे बढ़ता जा रहा था और वे लोग ट्राइबल वार से बचने के लिए रात-दिन बिना रुके चलते जा रहे थे. और फ़ाइनली उनका कारवाँ ट्राइबल वार से बचता बचाता किसी तरह ओएसिस तक पहुँच ही गया. फिर वो अल्केमिस्ट अपने ओमेन के सजेशन पर बड़ी बेसब्री से एक आदमी का इंतज़ार करने लगा जो उसे कुछ सीक्रेट्स बताने वाला था. अपने हथियार उतारने के बाद कारवाँ के लोगो को ओयसिस में ठहरने के लिए जगह मिली. और फिर नेक्स्ट डे वो इंग्लिशमेन उस लड़के के साथ अल्केमिस्ट की तलाश में निकल पड़ा. वे एक कुंए के पास पहुंचे. वहां काले कपड़ो में कुछ औरते खड़ी थी. सेंटियागो को किसी ने बताया था कि वहां मैरिड औरतो से बात करना मना है इसलिए वे लोग वेट करते रहे. कुछ देर बाद उन्हें एक अनमैरिड औरत कुंए की तरफ आती दिखी.


वो इतनी खूबसूरत थी कि सेंटियागो उसे देखता ही रह गया. और तब पहली बार उसे लव की लेंगुएज समझ आई जो सारी दुनिया में एक सी बोली जाती है. उसका दिल गवाही दे रहा था कि वे दोनों एक दुसरे के लिए ही बने है. सेंटियागो के पूछने पर उस लड़की ने अपना नाम फातिमा बताया. अब हर रोज़ वो उससे कुंए पर पन्द्रह मिनट के लिए मिलने जाता था जोकि उसकी लाइफ बन चुकी थी. फिर जल्द ही ये खबर भी उड़ने लगी कि ट्राइबल वार अभी लम्बी चलने वाली है और जब तक ये ख़त्म नहीं होती, वे लोग वहां से नहीं निकल सकते. अब उनके पास ओएसिस में रुके रहने के अलावा और कोई ऑप्शन नहीं था और शायद उन्हें कई और साल वहां गुजरने पड़े. वो लड़की भी सेंटियागो को उतना ही चाहती थी. दोनों अब बहुत क्लोज आ चुके थे.


सेंटियागो ने उसे अपनी लाइफ के बारे में सब कुछ बता दिया था, खजाने के बारे में भी. फातिमा ने उसे कहा कि वो खजाने की तलाश ना छोड़े. उसके सामने दो रास्ते थे. या तो वो इसी ओएसिस में रहकर अपने सवालों के ज़वाब ढूढे या फिर डेजर्ट का रास्ता पकड़े. लेकिन फिर से एक बार वो इस खजाने की तलाश में निकल पड़ा. इस टाइम तक काफी अँधेरा हो चूका था. तभी उसे एक और ओमेन दिखा दो बाज़ उसके उपर से उड़ रहे थे कि तभी एक ने दुसरे पर अटैक किया. उस टाइम वो खुद भी जैसे इस दुनिया की आत्मा में घुस चूका था जिसकी वजह से उस ओमेन का इंटरप्रेशन ये था कि ओएसिस पर अटैक होगा.


उसने ये बात अपने ऊंट ड्राइवर को बताई जिसने उसे कहा कि वो जाकर ये बात ओएसिस के चीफ को बताये तो सेंटियागो ने ये बात जाकर चीफ को बताई. चीफ ने अपने साथियों से कंसल्ट किया और इस खबर की सच्चाई टेस्ट करने की सोची. सेंटियागो को बोला गया कि नेक्स्ट डे सब लोग वार के लिए रेडी रहेंगे और अगर उसकी अटैक वाली बात सच हुई तो सेंटियागो को रिवार्ड दिया जाएगा. और अगर उसकी बात झूठ निकली तो बदले में सेंटियागो को अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा. सेंटियागो ने इस फैसले को अपना "मकतब" यानी डेस्टिनी समझ कर एक्स्पेट कर लिया. फिर जब वो पीछे जाने लगा तो उसे एक हॉर्समेन मिला जो बड़ा हैरान था.


उसने सेंटियागो से ओमेन का राज़ पुछा तो सेंटियागो ने बड़ी ब्रेवली उसे सब कुछ बता दिया और ये भी बताया कि उसे इसका प्रेडिक्शन मालूम नहीं था. उसके इस ज़वाब से वो हॉर्समेन सेटिसफाईड लग रहा था उसने उसे जाने दिया और सबसे कहा कि इस लड़के की हिम्मत ही वो चाबी है जिससे इस दुनिया की लेंगुएज समझी जा सकती है. उस हॉर्समेन के ऐसे डीप वर्ड्स सुनकर सेंटियागो को ओल्ड किंग की याद आ गई. उस हॉर्समेन के इस स्माल जेस्चर से उसे पता चल गया कि वो ही अल्केमिस्ट है और अगर अटैक में उसकी जान बची तो सेंटियागो को उससे मिलना था और नेक्स्ट डे उन पर सचमुच अटैक हुआ. फाइव हंड्रेड हॉर्समेन ने ओएसिस को घेर रखा था. लेकिन ओयसिस में रहने वाले भी पूरी तरह रेडी थे और सिर्फ आधे घंटे में ही उनके लीडर को छोड़कर सारे अटैकर्स मारे गए. लीडर को पूछताछ के लिए चीफ के पास लाया गया और बड़े ओनर के साथ उसे फांसी पर लटका दिया गया.


पार्ट 4.


सेंटियागो को ईनाम में 50 गोल्ड कोइंस मिले और साथ ही उसे ट्राइब का काउंसिलर बनाने की भी बात हुई. लड़ाई अब खत्म हो चुकी थी इसलिए सेंटियागो अल्केमिस्ट से मिलने गया जिसने उसे अपने टेंट में डिनर के लिए इनवाईट किया था. उसने सेंटियागो को खजाने की तलाश में पिरामिड जाने के लिए कहा. लेकिन जब सेंटियागो ने कहा कि उसे खजाने के तौर पर फातिमा मिल गयी है तो अल्केमिस्ट ने उसकी बात काटी. उसने सेंटियागो से कहा कि उसे फातिमा पिरामिड से नहीं मिली इसलिए वो खजाना नहीं हो सकती है. उसने फिर सेंटियागो को एडवाइस दी कि उसे अपने ऊंट बेचकर एक घोडा लेना चाहिए क्योंकि वो ज्यादा डिपेंडेबल रहेगा. नेक्स्ट नाईट वे दोनों एक साथ सफर पर निकल पड़े. अल्केमिस्ट ने सेंटियागो से कहा कि वो डेजर्ट में उसे लीड करे.


स्टार्टिंग में सेंटियागो थोडा कन्फ्यूज़ हुआ फिर लड़के सीख लिया कि जहाँ रास्ता मिले बढ़ते जाओ. और इस तरह उसका घोडा उसे एक स्पॉट पर लेकर पहुंचा जहाँ उन्हें लाइफ फॉर्म एक स्नेक के रूप में दिखी. यही वो ओमेन था जो अल्केमिस्ट देखना चाहता था. वो सेंटियागो को खजाने तक पहुंचाने के लिए कमिटेड था लेकिन वो लड़का तो बस ओएसिस में रहकर फातिमा के साथ एक पीसफुल लाइफ गुजारना चाहता था. इस पर अल्केमिस्ट ने सेंटियागो से कहा कि कुछ टाइम तक तो उसकी लाइफ अच्छी गुजरेगी लेकिन अगर उसने अभी खजाना नहीं ढूँढा तो बाद में वो पछतायेगा और कभी खुश नहीं रह पायेगा.


क्योंकि उसकी डेस्टिनी में यही लिखा है कि वो खज़ाना ढूंढें. वे दोनों रात काटने के लिए फिर से ओएसिस में लौटे. सेंटियागो ने फिर से एक बार मन बनाया कि वो अपनी डेस्टिनी फोलो करेगा और यही बात उसने अल्केमिस्ट को भी बताई. और नेक्स्ट डे वे दोनों सूरज उगने से पहले अपनी जर्नी पर निकल पड़े. वे डेजर्ट में घुमते रहे. फातिमा की जुदाई में सेंटियागो का दिल भारी हो रहा था. अल्केमिस्ट ने उससे कहा कि वो पुरानी बाते भूल कर आगे बड़े अगर फातिमा का प्यार उसके नसीब में लिखा है तो उसे ज़रूर मिलेगा. लड़का उस डेजर्ट में बढ़ता जा रहा था, वो डेजर्ट से काफी कुछ सीख रहा था. वे वार जोन के रास्ते अवॉयड करते रहे, कभी-कभी तो उन्हें ब्लड की स्मेल से ही पता लग जाता था कि कहीं पास में ही वार हो रही है.


और इस तरह बड़े केयरफूली चलते हुए वे अपनी जर्नी के काफी क्लोज आ गए थे. जहाँ डेजर्ट का एक बड़ा स्ट्रेच फैला हुआ था जिस पर बड़ी भारी लड़ाई चल रही थी. पूरी जर्नी के टाइम सेंटियागो के सामने काफी कॉफ्लिक्ट मोमेंट्स आये. वो कभी खुश होता था तो कभी उदास हो जाता था. उसने अल्केमिस्ट को ये बात बताई. अल्केमिस्ट उसकी बाते बड़े ध्यान से सुनकर अच्छी कांउसिलिंग करता था जिससे सेंटियागो उससे दिल खोलकर बाते करता और अपनी सर्च के बारे में अच्छा फील करता था. क्योंकि वो अपनी डेस्टिनी की तरफ बढ़ रहा था और इसका हर मोमेंट उसके लिए मायने रखता था. अब तक अपने पास्ट के एक्स्पिरियेंश से उसने काफी कुछ सीख लिया था और वो आज जो कुछ भी था, जहाँ पर भी था, अपनी लर्निंग की वजह से ही था.


ये सब लाइफ की एक बड़ी प्लानिंग का पार्ट था, ये प्लानिंग अनदेखे हाथो ने लिखी थी जो सबकी लाइफ की प्लानिंग लिखते है. हार्ट ने ये सीखा कि सफरिंग और फेलियर का डर एक्चुअल सफरिंग और फेलियर से बड़ा होता है. ये सब जानकार अब सेंटियागो का मन शांत था. ये सब उसने अल्केमिस्ट से शेयर किया तो उसने कहा कि अब वो अपनी डेस्टिनी के लिए पूरी तरह प्रीपेयर है. लेकिन अभी उसे लड़के को एक लास्ट लेखन देना बाकी था और ये लेसन था" जो कुछ उसने अब तक सीखा उसका टेस्ट देने के लिए उसे प्रीपेयर रहना था". और ये इसलिए क्योंकि हर सर्च बिगेनर के लक से स्टार्ट होती है. ताकि जो कुछ लेसन हमने सीखे है वो पूरी तरह से जिंदगी भर के लिए हमारे अंदर समां जाये. और फिर जल्दी ही टेस्ट का दिन भी आया.


उन्हें एक ट्राइब ने घेर लिया था. वे लोग उन्हें अपने चीफ के पास ले गए और पूछताछ शुरू कर दी. जान बचाने के लिए अल्केमिस्ट ने सेंटियागो का सारा गोल्ड उन लोगो को दे दिया. और साथ ही ये भी कहा कि उस लड़के में ऐसी पॉवर है कि वो उन्हें हवा बनके दिखा देगा और अगर ऐसा नहीं हुआ तो वो लोग उन्हें तीन दिन में मार सकते है. अब ये बात सेंटियागो के लिए कुछ ज्यादा हो गयी थी, वो बहुत डर गया था कि आगे क्या होगा..


पार्ट 5.


पहले दिन के खत्म होने पर सेंटियागो ने अल्केमिस्ट से कहा कि उसे हवा बनना नहीं आता. इस पर अल्केमिस्ट ने जवाब दिया कि वो उसकी प्रॉब्लम है क्योंकि उसे तो ये जादू आता है. दुसरे दिन वो लड़का दिनभर एक माउन्टेन के ऊपर बैठा रहा और डेजर्ट से बाते करता रहा. जब तीसरे दिन अपना जादू दिखाने का टाइम आया तो उसने डेजर्ट से हेल्प करने की रिक्वेस्ट की. डेजर्ट ने उससे कुछ सवाल किये जिसका जवाब उस लड़के बड़ी हिम्मत से दिया. डेजर्ट उसे अपनी सेंड देने के लिए तैयार हो गया और उससे कहा कि वो हवा से हेल्प मांगे. जब सेंटियागो ने हवा से हेल्प मांगी तो हवा ने भी कुछ सवाल किये और उन सवालों के जवाब भी उसने उसी तरह हिम्मत दिए.


उसने हवा को कन्विंस किया कि वो इतनी तेज़ चले कि वो आसमान से हेल्प ले सके. हवा उसकी बात मान गयी और जोर जोर से चलने लगी. लड़के ने फिर सूरज से बात की और उसे भी तेज़ चमकने के लिए कन्विंस कर लिया. सूरज ने उसे कहा कि वो उन हाथो से बात करे जिन्होंने ये सब कुछ लिखा है. अब उस लड़के ने प्रे करना शुरू कर दिया. उसकी प्रेयर साइलेंट थी मगर उसका हार्ट उस ऊपर वाले से कनेक्ट था. उसे सोल ऑफ गॉड की पॉवर रियालाईज हुई और ये भी रियेलाईज़ हुआ कि उसके अंदर भी सोल ऑफ़ गॉड मौजूद है. वो इस सीक्रेट को समझ गया था कि इंडीविजुली किसी को भी नहीं पता होता है कि उन्हें क्या करना है क्योंकि सारा प्लान उन सुप्रीम पॉवर के हाथो लिखा होता है.


और उसने सबके लिए एक प्लान लिखा होता है. कुछ लोग ये बात समझ जाते है और जो नहीं समझ पाते वो फना हो जाते हैं. सेंटियागो को जब इस सीक्रेट का पता चला तो उसे एहसास हुआ कि उसमे और उसकी डेस्टिनी लिखने वाले हाथो में कोई फर्क नहीं है, वे एक हो गए है. और जैसे ही उसे ये रिवील हुआ उसने ऊपरवाले की हेल्प से खुद को हवा में बदल कर दिखा दिया. सब हैरान रह गए और सेंटियागो शर्त जीत गया. उसे और अल्केमिस्ट को छोड़ दिया गया और ट्राइब की तरफ से साथ में चलने के लिए गार्ड भी दिए गए जिन्हें वो चाहे जितनी दूर तक साथ रख सकते थे. चलते-चलते वे लोग एक मोंटेसरी पहुंचे जहाँ उन्होंने गार्ड्स को गुडबाई बोला और आगे बड़े अल्केमिस्ट ने उसे एक रास्ता दिखाया जो गोल्ड में टर्न हो सकता था.


दोनों वहां से अलग हो गए. अल्केमिस्ट वापस ओएसिस में लौट गया और सेंटियागो खजाने की तलाश में आगे चलता रहा. वो अपने दिल की सुन रहा था और आगे बढ़ता जा रहा था. और फाइनली वो पिरामिड्स तक पहुँच ही गया. अपनी मंजिल देखकर वो रो पड़ा और जहाँ पर उसके आंसू गिरे वहां उसे एक बीटल दिखा जोकि उस इलाके में गॉड का सिम्बल माना जाता था. उसे ये एक और ओमेन लगा और उसने वहां पर खोदना शुरू कर दिया. उसने काफी गहरे तक खोदा मगर कुछ नहीं निकला. तभी उसके पास कुछ ट्राइब्स मेन आये जो वार से अपनी जान बचाकर लौट रहे थे. उन्होंने सेंटियागो का वो सारा गोल्ड छीन लिया जो उसे अल्केमिस्ट ने पार्टिंग गिफ्ट के तौर पे दिया था. उन्होंने सेंटियागो की ख़ूब पिटाई की और उसे सेंड में और डीप खोदने के लिए बोला.


जब लड़के ने उन्हें बताया कि उसने ड्रीम में यहाँ पर खजाना गड़ा हुआ देखा था तो उन लोगो को लगा कि यहाँ उन्हें कुछ नहीं मिलने वाला क्योंकि ड्रीम कभी सच नहीं होते. जाते-जाते ट्राइब्समेन के चीफ ने उससे कहा कि उसने भी एक ड्रीम देखा था कि स्पेन के एक चर्च के अंदर खजाना छुपा है जहाँ एक टूटे हुए कमरे में साईकामीर का पेड़ उगा है. ये बोलकर वो चीफ और उसके साथी वहां से चले गए. लड़का ख़ुशी से ठहाके लगाने लगा क्योकि ये एक्जेक्ट वही जगह थी जहाँ उसे ईजिप्ट के खजाने का ड्रीम आया था. तो वाकई में कोई खजाना था लेकिन उसे पाने का रास्ता इतना लंबा था उसे पहले डेजर्ट में पिरामिड्स तक पहुंचना था फिर किसी और के थ्रू उसके बारे में जानना था. अगर उसने अपनी डेस्टिनी फोलो नहीं की होती तो शायद उसे कभी भी उस खजाने का पता नहीं चल पाता जो उसके अपने ही देश में छुपा था.


एपिलोग 


सेंटियागो चर्च में गया और खजाने को खोद निकाला. फिर वो उस जिप्सी औरत के पास गया जिसे उसने वन टेंथ देने का प्रोमिस किया था. उसके बाद उसे हवा में वो खुशबू महसूस हुई जो उसे बड़े अच्छे से याद थी और जो अभी उसके होंठो पर एक याद बनकर बैठी थी. ये खुशबू भी फातिमा की. उसने अपने प्यार को बड़ी जोर से आवाज़ दी " मैं आ रहा हूँ, फातिमा !"

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Apj Abdul Kalam Biography In Hindi। (एपीजे अब्दुल कलाम बायोग्राफी हिन्दी में)


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Apj Abdul Kalam Biography In Hindi
Missile Man Biography

एपीजे अब्दुल कलाम का बायोग्राफी हिन्दी में

About This Post 

अगर आप एपीजे अब्दुल कलाम के बारे में और ज़्यादा जानना चाहते हैं, तो ये पोस्ट आपके लिए है. वो एक मेहनती स्टूडेंट, समर्पित मिसाइल साइंटिस्ट और बहुत पसंद किये जाने वाले लीडर थे. ये कहानी आपको, तमिलनाडु में उनके बचपन से लेकर DRDO और ISRO में उनके इम्पोर्टेन्ट कंट्रीब्यूशन तक की जर्नी के बारे में बताएगी. इस बुक में आप एरोस्पेस के बारे में कई बातें जानेंगे. आप इंडिया के मिसाइल मैन कहे जाने वाले एपीजे से लाइफ के इम्पोर्टेन्ट लेसंस भी सीखेगे।
 

1. यह बुक किसे पढनी चाहिये। 

स्टूडेंट्स, टीचर्स, जो साइंटिस्ट बनना चाहते हैं, जो सिविल सर्वेट बनना चाहते हैं

2. आँथर के बारे में।

एपीजे अब्दुल कलाम मिसाइल साइंटिस्ट और भारत के पूर्व प्रेजिडेंट हैं. उन्हें सब प्यार से मिसाइल मैन कहते हैं. अरुण तिवारी एक प्रोफेसर और मिसाइल साइंटिस्ट हैं. उन्होंने डीआरडीओ में कलाम के साथ काम किया है. साथ में, उन्होंने 5 बुक्स लिखीं हैं.

Wings of fire 


मैं एक गहरा कुंआ हूँ इस ज़मीन पर बेशुमार लड़के लड़कियों के लिए कि उनकी प्यास बुझाता रहूँ. उसकी बेपनाह रहमत उसी तरह ज़रें ज़रें पर बरसती है जैसे कुंवा सबकी प्यास बुझाता है. इतनी सी कहानी है मेरी, जैनुलाब्दीन और आशिअम्मा के बेटे की कहानी, उस लड़के की कहानी जो अखबारे बेचकर अपने भाई की मदद करता था. उस शागिर्द की कहानी जिसकी परवरिश शिव सुब्र्यमानियम अय्यर और आना दोरायिसोलोमन ने की. उस विद्यार्थी की कहानी जिसे पेंडुले मास्टर ने तालीम दी, एम्. जी. के. मेनन और प्रोफेसर साराभाई ने इंजीनियर की पहचान दी. जो नाकामियों और मुश्किलों में पलकर सायिन्स्दान बना और उस रहनुमा की कहानी जिसके साथ चलने वाले बेशुमार काबिल और हुनरमंद लोगों की टीम थी.

मेरी कहानी मेरे साथ ख़त्म हो जायेगी क्योंकि दुनियावी मायनों में मेरे पास कोई पूँजी नहीं है, मैंने कुछ हासिल नहीं किया, जमा नहीं किया, मेरे पास कुछ नहीं और कोई नहीं है मेरा ना बेटा, ना बेटी ना परिवार. मे दुसरो के लिए मिसाल नहीं बनना चाहता लेकिन शायद कुछ पढने वालो को प्रेणना मिले कि अंतिम सुख रूह और आत्मा की तस्कीन है, खुदा की रहमत है, उनकी वरासत है. मेरे परदादा अवुल, मेरे दादा फ़कीर और मेरे वालिद जेनालुब्दीन का खानदानी सिलसिला अब्दुल कलाम पर ख़त्म हो जाएगा लेकीन खुदा की रहमत कभी ख़त्म नहीं होगी क्योंकि वो अमर है, लाफ़ानी है. मै शहर रामेश्वरम के एक मिडिल क्लास तमिल खानदान में पैदा हुआ. मेरे अब्बा जेनाब्लुदीन के पास ना तालीम थी ना दौलत लेकिन इन मजबूरियों के बावजूद एक दानाई थी उनके पास.

एक हौसला था और मेरी माँ जैसी मददगार थी आशींअम्मा और उनकी कई औलादों में एक मैं भी था बुलंद कामिन माँ बाप का एक छोटा सा कदवाला मामूली शक्ल सूरत वाला लड़का. अपने पुश्तैनी मकान में रहते थे हम जो कभी बीसवी सदी में बना था. काफी बड़ा और वसील मकान था, रामेश्वरम की मस्जिद स्ट्रीट में. मेरे अब्बा हर तरह के ऐशो आराम से दूर रहते थे मगर ज़रूरियत की तमाम चीज़े मुयस्सर थी. सच तो ये है कि मेरा बचपन बड़ा महफूज़ था दिमागी तौर पर भी और ज़ज्बाती तौर पर भी. मटीरियली और इमोशनली. रामेश्वर का मशहूर शिव मंदिर हमारे घर से सिर्फ दस मिनट की दूरी पर था. हमारे इलाके में ज्यादा आबादी मुसलमानों की थी फिर भी काफी हिन्दू घराने थे जो बड़े इत्तेफाक से पड़ोस में रहते थे. हमारे इलाके में एक बड़ी पुरानी मस्जिद थी जहाँ मेरे अब्बा मुझे हर शाम नमाज़ पढने के लिए ले जाया करते थे. रामेश्वरम मंदिर के बड़े पुरोहित बक्षी लक्ष्मण शाश्त्री मेरे अब्बा के पक्के दोस्त थे. अपने बचपन की आंकी हुई यादो में एक याद ये भी थी की अपने अपने रिवायती लिबासो में बेठे हुए वो दोनों कैसे रूहानी मसलो पर देर देर तक बाते करते रहते थे.

मेरे अब्बा मुश्किल से मुश्किल रूहानी मामलो को भी तमिल की आम जबान में बयान कर लिया करते थे. एक बार मुझसे कहा था" जब आफत आये तो आफत की वजह समझने की कोशिश करो, मुश्किल हमेशा खुद को परखने का मौका देती है'

मैंने हमेशा अपनी साईंस और टेक्नोलोजी में अब्बा के उसुलूँ पर चलने की कोशिश की है. मै इस बात पर यकीन रखता हूँ की हमसे ऊपर भी एक आला ताकत है, एक महान शक्ति है जो हमें मुसीबत, मायूसी और नाकामियों से निकाल कर सच्चाई के मुकाम तक पहुचाती है. मैं करीब छह बरस का था जब अब्बा ने एक लकड़ी की कश्ती बनाने का फैसला किया जिसमे वो यात्रियों को रामेश्वरम से धनुषकोटि का दौरा करा सके. ले जाए और वापस ले आये. वे समुन्दर के साहिल पर लकडिया बिछाकर कश्ती का काम किया करते थे एक और हमारे रिश्तेदार के साथ अहमद जलालुदीन, बाद में उनका निकाह मेरी आपा जोहरा के साथ हुआ. अहमद जलालुदीन हालाँकि मुझसे पंद्रह साल बड़े थे फिर भी हमारी दोस्ती आपस में जम गयी थी. हम दोनों ही शाम लम्बी सैर पर निकल जाया करते थे. मस्जिद गली से निकलकर हमारा पहला पड़ाव शिव मंदिर हुआ करता था, जिसके गिर्द हम उतनी ही श्रधा से परिकर्मा करते जितनी श्रधा से बाहर से आये हुए यात्री. जलालुदीन ज्यादा पढ़ लिख नहीं सके उनके घर की हालत की वजह से लेकिन मैं जिस ज़माने की बात कर रहा हूँ, उन दिनों हमारे इलाके में सिर्फ एक वही शख्स था जो अंग्रेजी लिखना जानता था.

जलालुदीन हमेशा तालीमयाफ्ता और पढ़े लिखे लोगो के बारे में बाते करते थे. और एक शख्स जिसने बचपन में मुझे बहुत मुद्दफिक किया वो मेरा कजिन था, मेरा चचेरा भाई शमसुदीन और उसके पास रामेश्वरम में अखबारों का ठेका था और सब काम अकेले ही किया करता था. हर सुबह अखबार रामेश्वरम रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से पहुचता था. सन 1939 में दूसरी आलमगीर जंग शुरू हुई, द सेकंड वर्ड वार, उस वक्त मै आठ साल का था. हिन्दुस्तान को एह्तियादी फौज के साथ शामिल होना पड़ा और एक इमरजेंसी जैसे हालात पैदा हो गए थे. सिर्फ पहली दुर्घटना ये हुई कि रामेश्वरम स्टेशन पर ट्रेन का रुकना कैंसिल कर दिया गया और अखबारों का गठ्ठा अब रामेश्वरम और धनुषकोटी के बीच से गुज़रनेवाली सड़क पर चलती ट्रेन से फेंक दिया जाता. शमसुदीन को मजबूरन एक मददगार रखना पड़ा जो अखबारों के गठ्ठे सड़क से जमा कर सके, वो मौका मुझे मिला और शमसुदीन मेरी पहली आमदनी की वजह बना.


हर बच्चा जो पैदा होता है वो कुछ समाजी और आर्थिक हालात से ज़रूर बशरमान होता है और कुछ अपने ज़ज्बाती माहौल से भी और उसी तरह उसकी तबियत होती है. मुझमे दयानतदारी और सेल्फ डिसपीलीन अपने अब्बा से वरासत में मिला था और माँ से अच्छाई पर यकीन करना और रहमदिली लेकिन जलालुदीन शम्शुदीन की वजह से जो असर मुझ पर पड़ा उससे मेरा बचपन ही महज़ अलग नहीं हुआ बल्कि आईंदा जिंदगी पर भी उसका बहुत बड़ा असर पड़ा. फिर जंग ख़त्म हो गयी और हिन्दुस्तान की आज़ादी बिलकुल यकीनी हो गयी. मैंने अब्बा से रामेश्वरम छोड़ने की इजाज़त चाही. मै डिस्ट्रिक्ट हेडक्वार्टर रामनाथपुरम जाकर पढना चाहता था. शम्शुदीन और जलालुदीन मेरे साथ रामनाथपुरम तक गए, मुझे स्वार्ट्स हाई स्कूल में दाखिला कराने के लिए. ना जाने क्यों वो नया माहौल मुझे रास नहीं आया. रामनाथपुरम बड़ा मशहूर शहर था और करीब पचास हज़ार की आबादी थी लेकिन रामेश्वरम का सुकून और इत्मीनान कहीं नहीं था. घर बहुत याद आता था और घर लौटने का कोई मौका मै छोड़ता नहीं था.

स्वार्ट्स हाई स्कूल में दाखिले के बाद एक पंद्रह साला लड़के के तमाम शौक जो हो सकते थे, मेरे अन्दर जाग उठे थे. मेरे टीचर अन्ना दोराई सोलोमन बेहतरीन रहबर थे, गाईड उस नौजवान के लिए जिसके सामने जिन्दगी की बेसुमार मुमकीनात खुलने वाली थी. रामनाथपुरम के उस अरसा-ए-कायम में उनसे मेरा रिश्ता उस्ताद शागिर्द या गुरु शिष्य से भी आगे निकल गया. अन्ना दोराई कहा करते थे" जिंदगी में कामयाब होने और नतीजे पाने के लिए तीन चीजों पर काबू पाना बहुत ज़रूरी है, ख्वाहिश यकीन और उम्मीद अन्ना दोराई जो बाद में रेवेरेंट हो गए, कहा करते थे" इससे पहले की मै चाहू कुछ हो जाए, उससे पहले मेरे अन्दर उसकी पूरी शिद्दत से ख्वाहिश हो और यकीन हो कि वो होगा." मैं अपनी जिंदगी से अगर मिसाल दूँ तो मुझे बचपन से ही आसमान के इसरार और परिंदों की परवाज़ हमेशा हैरान करती थी, फेसिनेट करती थी. सम्नुदर में कुंजो और बगुलों को ऊँची उड़ाने लगाते देखता था तो उड़ने को जी चाहता था. मै एक सादा सा गाँव का लड़का तो था मगर मुझे यकीन था की एक दिन मै उन कुंजो की तरह बुलंद उड़ान लगाकर बुलंदी पर पहुचुंगा.

और हकीकत ये है की रामेश्वरम से उड़ने वाला मै पहला लड़का था. स्वार्ट्स स्कूल में तालीम हासिल करते करते मेरे अन्दर खुद एतमादी बस चुकी थी और मुझे यकीन था मै ज़रूर कामयाबी हासिल करूंगा. मै तालीम आगे जारी रखूँगा, उसमे कोई दूसरा ख्याल नहीं था. सन 1950 में मै इंटर मीडिएट पढने के लिए सेंट जोसेफ कोलेज त्रिची में दाखिल हो गया. जब बी. एस. सी डिग्री करने के लिए मैंने सेंट जोसेफ कोलेज में एडमिशन लिया तो हायर एजुकेशन के माने सितने ही जानता था. ये नहीं जानता था कि हायर एजुकेशन के लिए कुछ और भी हो सकता है, ना ये जानता था कि साईंस पढके फ्यूचर के लिए और क्या हासिल हो सकता है. बी.एस.सी पास करने के बाद ही जान पाया कि फिजिक्स मेरा सब्जेक्ट नहीं था. अपने ख्वाब को पूरा करने के लिए मुझे इंजीनियरिंग में जाना चाहिए था मगर पता नहीं क्यों कुछ लोगो का ऐसा ख्याल है कि साईंस आदमी को खुदा से मुल्कर कर देती है लेकिन मेरे लिए तो साईस एतमाद, विश्वास और रूहानी तस्कीन की वजह रही है.

किसी तरह मैं एम आई टी यानी मद्रास इंजीयरिंग और टेक्नोलोजी के उमीद्वारो की लिस्ट में तो आ गया लेकिन उसका दाखिला बहुत महंगा था कम से कम एक हज़ार रुपयों की ज़रुरत थी और मेरे अब्बा के पास इतने पैसे नहीं थे. उस वक्त मेरी अक्का, मेरी आपा जोहरा ने अपने सोने के कड़े और चेन बेचकर मेरी फीस का इतेजाम किया. उसकी उम्मीद और यकीन देखकर मै पसीज गया. एमाईटी में सबसे ज्यादा मज़ा आया. वहाँ दो हवाई जहाज रखे देखकर, जो उड़ान से बरी कर दिए गए थे एक अजीब सा खिंचाव महसूस होता था. और जब बाकि लड़के हॉस्टल चले जाते थे, मैं घंटा डेढ़ घंटा उनके पास बैठा रहता था. फर्स्ट इयर मुक्कमल होने के •बाद जब मुझे अपने ज्यादा खशूशी मज़मून चुनने थे तो मैंने फ़ौरन एरोनोटिकल इंजीयरिंग का चुनाव किया. एम आई टी की तालीम के दौरान मुझे तीन टीचर्स ने बहुत मुद्दसर किया. प्रोफ. के. ए.वी. मेंडेलीन, प्रोफ. स्पोंडर, प्रोफ. नरसिम्हाराव. प्रोफ. स्पोंडर टेक्नीकल एरो डायनामिक सिखाते थे.

मेकेनिकल इंजीयरिंग में दाखिले से पहले ही मैंने उनसे सलाह ली थी. उन्होंने मुझे समझाया था कि " मुस्तकबिल का फैसला करने से पहले मुस्तकबिल की मुमकिनियत के बारे में नहीं सोचना चाहिए बल्कि सोचना चाहिए एक अच्छी बुनियाद के लिए और अपने रुझान और रिश्तियात के बारे में कि उनमे कितनी शिद्दत है, एप्टीटपुड और इन्सिपिरेशन में कितनी इन्टेन्सिटी है. मैं खुद भी होने वाले इंजीनियर स्टूडेंट्स से ये कहना चाहता हूँ कि जब वे अपने स्पेशलाइजेशन का चुनाव करे तो देखना होगा कि उनमे कितना शौक है कितना उत्साह और लगन है उस शौक में जाने के लिए. प्रोफ. के. ए. वी. मेंडेलींन ने मुझे एरो स्ट्रक्चर डिजाइन सिखाया और उसका तंजिया भी. विश्लेषण और एनालिसिस भी वे बड़े खुशदिल और दोस्त टीचर थे और हर साल कोई ना कोई नया तरीका, नया नजरिया लेकर आते थे. प्रोफ. नरसिंहाराव मेथमेटीशियन थे, वे एरो डायनामिक्स की थ्योरी सिखाया करते थे. उनकी क्लास में शामिल होकर मुझे मेथमेटिक्स फिजिक्स बाकी तमाम सब्जेक्ट से ज्यादा अच्छा लगने लगा.

एम आई टी से मै बेंगलोर के हिन्दुस्तान एरोनोटिकल लिमिटेड में बतौर ट्रेनी दाखिल हो गया. एचएएल से जब मै एरोनोटीकल इंजीयरिंग में ग्रेजुएट बनकर निकला तो जिंदगी ने दो मौके मेरे सामने खड़े कर दिए. दोनों मेरी परवाज़ के देरीना ख्वाब को पूरा कर सकते थे. एक मौका था एयरफोर्स का दूसरा मिनिस्ट्री ऑफ़ डिफेन्स में डायरेक्टरेट ऑफ़ टेक्नीकल डेवलपमेंट और प्रोडक्शन का. मैंने दोनों में अर्जी भेज दी और बावक्त दोनों से इंटरव्यू का बुलावा आ गया. एयरफोर्स के लिए मुझे देहरादून बुलाया गया था और डिफेन्स के लिए दिल्ली. मेरे दोनों मुकाम दो हज़ार किलोमीटर के फासले पर थे और ये पहला मौका था मेरा अपने वसील और विराट वतन को देखने का. खिड़की पर बैठा हुआ मै इस देश की सरजमीं को पावों के नीचे से बहता हुआ देख कर हैरान था कि उत्तर की सफ़र करते हुए एक ही मुल्क का लैंडस्केप कैसे बदल जाता है. मै एक हफ्ता दिल्ली में ठहरा डिफेन्स मिनिस्ट्री का इंटरव्यू दिया. इंटरव्यू अच्छा हुआ था वहां से मैं देहरादून गया एयरफोर्स सिलेक्शन बोर्ड के इंटरव्यू के लिए. पच्चीस उमीद्वारो में मैं नवें नंबर पर आया. मेरा दिल बैठ गया.

बहुत मायूस हुआ और कई दिन तक अफ़सोस रहा कि एयरफोर्स में जाने का मौका मेरे हाथ से निकल गया. मै ऋषिकेश चला गया, दिल पे ये बोझ लेकर कि आने वाले दिन बड़े सख्त होंगे. गंगा में स्नान किया और फिर चलता हुआ पास की पहाड़ी में शिवानन्द आश्रम तक पहुच गया. स्वामी शिवानन्द से भेंट हुई. देखने में बिलकुल गौतम बुद्ध लगते थे. सफ़ेद दूधियाँ धोती और पावों में लकड़ी की खड़ाऊ उनकी बच्चो सी मासूम मुस्कान और सादादिल देखकर बहुत प्रभावित हुआ. मैंने बताया उन्हें कि कैसे इंडियन एयरफोर्स में भारती होने से रह गया और मेरी कितनी शदीद ख्वाहिश थी आसमानों में उड़ने की, परवाज़ करने की. वो मुस्कुरा दिए और बोले " ख्वाहिश अगर दिलो जान से निकली हो तो वो पवित्र होती है और उसमे अगर शिद्दत हो तो उसमे कमाल की एक इलेक्ट्रो मेग्नेटिक एनर्जी होती है. एक बर्की मकनती सी ताकत होती है. दिमाग जब सोता है तो वो एनर्जी रात की ख़ामोशी में बाहर निकल जाती है और सुबह कायनात, ब्रह्माण्ड सितारों की गति रफ़्तार को अपने साथ समेट कर दिमाग में वापस लौट आती है. इसलिए जो सोचा है उसकी सृष्टि अवश्य है. वो बख्ति होगा तुम विश्वास करो इस अजली बंधन पर, इस वचन पर कि सूरज फिर लौटेगा. बहार फिर से आएगी. मै दिल्ली लौट आया.

डिफेन्स में अपने इंटरव्यू का नतीजा दरयाफ्त किया. जवाब में मुझे अपोइंटमेंट लैटर थमा दिया गया. और अगले दिन से सीनियर साइंटिफिक अस्सिस्टेंट मुकर्रर कर दिया गया ढाई सौ रूपये के महीना तनख्वाह पर. तीन साल गुजर गए. उन्ही दिनों बंगलोर में एरोनोटिकल डेवलपमेंट एश्टेबिलिश्मेंटADE का नया महकमा खुला और मुझे वहां पोस्ट कर दिया गया. बेंगलोर कानपुर से बिलकुल मुक्तलिफ़ शहर था. मै अपने डायरेक्टरेट का पहला साल वहाँ गुज़ार चूका था. दरअसल हमारे देश में अजीब सा तरीका है, अजीब सा ढंग है अपने लोगो को हद दर्ज़ा तक निचोड़ लेने का, जो हमारे लोगो को इन्तेहापसंद बना देता है. शायद इसलिए कि सदियों से देश ने गैर मुल्को की तहजीबो के जख्म खाए है और उन्हें अपने दामन में जगह दी है. अलग अलग हुक्मरानों से वफ़ा करते करते हम अपनी हैसियत, अपनी इफ्तेदा खो बैठे है. बल्कि हमने एक और ही खूबी पैदा कर ली है कि एक ही वक्त में रहमदिल भी है और बेरहम भी, हसाज़ भी है और बेहिस भी जितने गहरे है उतने ही सतही. ऊपर से देखो तो हम बड़े खुशरंग और खूबरू नज़र आते है लेकिन कोई गौर से देखे तो हम अपने हुक्मरानों की बेढब नक़ल से ज्यादा और कुछ नहीं है.

मैंने कानपुर में कल्ले में दबाये हुए पान वाले नवाब वाजिद अली शाह के नकलची बहुत देखे और बेंगलोर में फिरंगियों के अंदाज़ में कुत्ते की ज़ंजीर थामे टहलते हुए साहिबो की कमी नहीं थी. बेंगलोर में रहते हुए मै रामेश्वरम के गहरे सुकून और शांत वातावरण के लिए तरसता था. पहले साल तो ADE में कोई ज्यादा काम नहीं था. एक प्रोजेक्ट टीम बनायी थी कि तीन सालो में एक स्वदेशी होवर क्राफ्ट तैयार करे और जो वक्त से पहले तैयार हो गया. उसका नाम रखा गया शिव की सवारी के आधार पर उसका डिजाइन हमारी उम्मीद से ज्यादा अच्छा था लेकिन मै सख्त मायूस हुआ जब आपसी कंट्रोवर्सी के बिना पर सारा प्रोजेक्ट बला-ए-ताक पर रख दिया गया, बंद कर दिया गया. प्रोफ. एम्. जी. के. मेनन टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च के डायरेक्टर एक दिन अचानक हमारी जांच पड़ताल को आ पहुंचे. नंदी का जिक्र निकला, मुझसे पूछताछ करते हुए उन्होंने ख्वाहिश जाहिर की एक दस मिनट की उड़ान के लिए. उसके हफ्ता बाद की बात थी मुझे इन्स्कोसपर से बुलावा आ गया.

मैं मुंबई चला गया इंटरव्यू देने मेरा इंटरव्यू लेने वालो में विक्रम साराभाई, एम्. जी. के मेनन के अलावा मिस्टर सराफ थे जो उस वक्त एटॉमिक एनर्जी कमीशन के डेपुटी सेक्रेटरी के ओहदे पर थे. डाक्टर साराभाई की गरमजोशी ने पहली ही मुलाकत में मेरा दिल मोह लिया. अगले ही दिन मुझे खबर मिली कि मै चुन लिया गया. मुझे इन्कोस्पर में राकेट इंजीनियर की हैसियत से शामिल कर लिया गया था. सन 1962 में देरेना हिस्से में कहीं इन्कोस्पर ने थुम्बा में इक्वेटोरियल राकेट लांच स्टेशन बनाने का फैसला किया. थुम्बा केरल में त्रिवेंद्रम से परे दूर दराज़ के एक उंघते से गाँव का नाम है. हिन्दुस्तान में ये मॉडर्न राकेट बेस्ड रिसर्च की एक दबी सी इफ्तेदा थी, एक हलकी सी शुरुवात थी. उसके फ़ौरन बाद ही मुझे छेह महीने के लिए अमेरिका भेज दिया गया. नासा में राकेट लौन्चिंग की ट्रेनिंग के लिए. जाने से पहले मैं थोडा सा वक्त निकाल कर रामेश्वरम गया. मेरे अब्बा मेरी इस कामयाबी के लिए बहुत खुश हुए और मुझे उसी मस्जिद में ले जाकर शुक्राने की नमाज़ अदा की.


नासा लेंगले रिसर्च सेंटर वर्जीनिया में मैंने अपने काम की शुरुवात की. बाद में गोडार्ड फ्लाई स्पेस सेंटर मेरीलैंड चला गया. मै अपना इम्प्रेशन अमेरिकन के बारे में बेंजामिन फ्रेंक्लिन के इस जुमले से बयान कर सकता हूँ "जिन बातों से तकलीफ होती है उनसे तालीम भी मिलती है" हिन्दुस्तानी तंजीमो में यहाँ की ओगनिज़ेशन में एक बड़ी मुश्किल है. जो ऊपर है वो बड़े मगरूर है. अपने से छोटो की, जूनियर और सबोर्डिनेट की राय लेना अपनी हदके समझते है. कोई भी शख्स अपनी खूबी दिखा नहीं सकता अगर आप उसे मलामत ही करते रहे. उसूल और पाबन्दी, पाबन्दी और सख्ती, सख्ती और जुल्म के बीच की लाइन बड़ी महीन है, बारीक है. उसकी पहचान बहुत ज़रूरी है. मै जैसे ही नासा से लौटा फ़ौरन बाद ही हिन्दुस्तान का पहला राकेट लांच वाकया हुआ. 21नवम्बर 1963, वो साउन्डिंग राकेट था, नाम अपाचे नाइकी. नाइकी अपाचे की कामयाबी के बाद प्रोफ साराभाई ने अपनी आरजू, अपने ख्वाब का इज़हार किया. एक इंडियन सेटेलाईट लांच व्हीकल ISLV का सपना हिन्दुस्तानी राकेट का सपना 20वी सदी का ख्वाब भी कहा जा सकता है जो टीपू सुलतान ने देखा था. टीपू सुलतान की फौज में 27 ब्रिगेड थे जो कुशहूंस कहलाते थे और हर एक ब्रिगेड में एक दस्ता था राकेटमेन का जो साथ रहता था और जुक्स कहलाता था. जब टीपू सुलतान मारा गया तो अंग्रेजो ने 700 राकेट और 900 राकेट के सब- सिस्टम बरामद किये.

1799 में तिरुनेलवेली की जंग के बाद वो रॉकेट्स विलियम कांगेरी ने इंग्लैंड भिजवा दिए जांच पड़ताल के लिए. उसकी तकनीक समझने के लिए जिसे आज की साइंस जुबान में हम रिवर्स इंजीयरिंग कहते हैं. टीपू सुलतान की मौत के बाद उस ख्वाब की भी मौत हो गयी कम से कम डेढ़ सौ साल के लिए. पंडित जवाहरलाल नेहरु की बदौलत वो रोकेटरी का ख्याल फिर एक बार हिन्दुस्तान में जिंदा हुआ. प्रोफ. साराभाई ने उस ख्वाब को हकीकत बनाने की जिम्मेदारी अपने सर ली. बहुत से तंगनज़र लोगो को एतराज़ था इस बात से कि इस मुल्क में जहाँ कौम को दो वक्त की रोटी नसीब नहीं होती वहां इस स्पेस उड़ानों को इन खयालाई तहरीको को क्यों तरजीह दी जा रही है. लेकिन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू और साराभाई के नज़रिए में किसी किस्म का मुबारता नहीं था. उनके नज़रिए बिलकुल साफ़ थे कि अगर दुनिया के मुल्को में, दुनिया के मसलो में हिस्सा लेना है, शिरकत करनी है हिन्दुस्तान को कोई हैसियत हासिल करनी है तो साइंस और टेक्नोलोजी की तरक्की, खुद मुख्तारी और सेल्फ रिलाएंस ज़रूरी है और उनका मकसद ताकत का मुजाहिरा बिलकुल नहीं था.

सहज पके सो मीठा होए, थुम्बा में दो राकेट सहज पके और कामयाब हुए एक रोहिनी और दूसरा मेनिका. अगला साल लगा ही था जब प्रोफ. साराभाई ने मुझे दिल्ली बुला भेजा एक मीटिंग थी और मीटिंग में ग्रुप कैप्टेन वी. एस. नारायणन से मेरा तार्रुफ़ कराया गया जो एयर हेडक्वार्टर से थे. प्रोफ. साराभाई ने RATO तैयार करने का इरादा ज़ाहिर किया. राकेट असिस्टेंट टेक ऑफ जो एक मिलिट्री एयरक्राफ्ट की मदद से उड़ाया जा सके बड़ी छोटी सी जगह में. शाम तक ये खबर भी आम हो गयी कि हिन्दुस्तान एक खुद शाफ़्ट मिलिट्री एयरक्राफ्ट तैयार कर रहा है और मै उस प्रोजेक्ट का मुख्तार हूँ, जिम्मेदार हूँ. मैं कई तरह के जज्बात से भर गया. खुश भी था, शुक्रगुजार भी, खुशकिस्मत भी और एक एहसास हुआ तकनील का, फुलफिलमेंट का 19वी सदी के एक शायर की ये शेर बहुत याद आये "हर दिन के लिए हमेशा तैयार रहो, हर दिन को एक तरही में लो जब ओखली में हो तो बर्दाश्त करो, जब दश्ता हो तो वार करो.

RATO पे काम करते हुए दो अहम् वाक्यात हुए. पहला तो ये था कि अपने देश में पहली बार स्पेस रिसर्च का दस साला प्रोग्राम तैयार हुआ जिसके ओथेर थे प्रोफ. साराभाई. मेरे लिए वो एक रूमानी मेनिफेस्टो था जैसे स्पेस से इश्क करने वाले किसी शायर की रूमानी नज़्म हो, जैसे कोई अपने देश के आसमान से इश्क करने लगा हो. और दूसरा वाकया, मिनिस्ट्री ऑफ़ डिफेन्स में मिसाइल पैनल का तैयार होना. नारायणन और मैं हम दोनों उस पैनल के मेम्बर थे. उस वक्त तक भविष्य की आने वाली SLV सेटेलाईट लांच वेहिकल का नाक-नक्शा भी तैयार हो चूका था. प्रोफ. साराभाई अपने देरीना ख्वाब की ताबीर देने के लिए कुछ और साथियों का चुनाव कर चुके थे. मै खुद को खुशकिस्मत समझता हूँ, मुझे उस प्रोजेक्ट का लीडर चुना गया. उस पर प्रोफ. साराभाई ने मुझे एक और जिम्मेदारी भी सौंपी कि लांच की चौथी स्टेज़ में ही डिसाइड करू. ये मामुल था, मेरा अल्क था कि हर मिसाइल पैनल की मीटिंग के बाद मैं जाकर प्रोफ. साराभाई को पूरी तफसील, पूरी रिपोर्ट देता था. दिल्ली में ऐसे ही एक मीटिंग के बाद 23 दिसंबर 1971 को मै त्रिवेंद्रम लौट रहा था और उस दिन थुम्बा में प्रोफ. साराभाई SLV का मुआयना करने गए हुए थे. दिल्ली एअरपोर्ट के लौंज़ से मैंने उन्हें फोन किया, पैनल मीटिंग की तफसील बताई. प्रोफ. साराभाई ने कहा कि मैत्रिवेंद्रम एअरपोर्ट पर उनका इंतज़ार करूँ, मै जब त्रिवेंद्रम पहुंचा तो फिज़ा में एक मातम छाया हुआ था, मुझे खबर दी गयी कि प्रोफ. साराभाई नहीं रहे. चंद घंटो पहले दिल का दौरा पड़ने से उनका इन्तेकाल हो गया. मै थर्रा कर रह गया. चंद घंटे पहले ही तो मैंने उनसे बात की थी. मेरे लिए वो बहुत बड़ा सदमा था. प्रोफ. साराभाई मेरी नज़र में इंडियन साइंस के राष्ट्रपिता थे, जैसे महात्मा गाँधी है. उन्होंने अपनी टीम से रहनुमा पैदा किये और खुद अमल से उनके लिए मिसाल साबित हुए.


कुछ अरसा प्रोफ. एम्. जी. के. मेनन ने स्पेस रिसर्च का काम संभाला. बिल आखिर प्रोफ. सतीश धवन को इंडियन स्पेस रिसर्च ओर्गेनाइजेशन ISRO की जिम्मेदारी सौंप दी गयी. थुम्बा का पूरा काम्प्लेक्स बड़े पैमाने पर एक स्पेस सेंटर बना दिया गया और विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर VSSC का नाम दिया गया. जिसने वो सेंटर कायम किया था उसी के नाम से उस जगह की श्रधांजलि पेश की गयी. मशहूर मेटीरियोलिजिस्ट डॉ. ब्रह्म प्रकाश VSSC के पहले डायरेक्टर मुकरर्र हुए. कोई भी शख्स अपनी जिम्मेदारी में तभी कामयाब हो सकता है अगर वो बा- रसूख हो, मोतबर हो और अपने फैसलों के लिए उसे सही हद तक आजादी हो शायद निजी जिंदगी में भी तस्लील का यही एक रास्ता है. आजादी और जिम्मेवारी एक साथ हो तभी वो तस्कीन और ख़ुशी का बायिस हो सकती है और ज़ाती आज़ादी हासिल करने के लिए मै दो रास्ते तजवीर कर सकता था जो मैंने इख्तियार किये. पहला तो ये कि अपनी तालीम और तबरियत को बढावा दो. इल्म, नॉलेज बड़ा करामाती हथियार है, बहुत काम आता है. इल्म जितना ज्यादा होगा उतनी ज्यादा आजादी के हक़दार होंगे. इल्म वो पूँजी है जो कोई छीन नहीं सकता, इनकी रहनुमाई तभी मुमकिन है अगर आपकी जानकारी मुक्कमल हो, अपटूडेट हो. कामयाब रहनुमा बनने के लिए ज़रूरी है कि दिन का काम जब ख़त्म हो आप पिछले काम का जायजा ले, अगले दिन के काम की तैयारी करे. दूसरा तरीका ये है कि अपने काम को अपना फ़न समझो, गर्व समझो और ज़रुरत भी है कि अपने अन्दर की शक्ति की सही जानकारी हो. जो करो उस पर यकीन रखो, ये जिस पर यकीन हो वही करो वर्ना दुसरो के ईमान का शिकार बनते रहोगे. SLV प्रोजेक्ट के पहले तीन सालो में साईस के बहुत से नए नए इसरार खुले पर अहिस्ता आहिस्ता साईस और टेक्नोलोजी का फर्क समझ आने लगा | रिसर्च और डेवलपमेंट का फासला पता चलने लगा | किसी भी इजाद में गलतियां होना लाजिमी है लेकिन हर गलती कामयाबी की तरफ एक और कदम उठाती है । इस और सीड़ी बन जाती है। किसी भी तखलीक की तरह SLV की तखलीक भी कई दर्दनाक लम्हों से गुजरी | एक रोज़ जब मै और मेरे तमाम साथी अपने कामो में पूरी तरह डूबे हुए थे मेरे घर से एक मौत की इत्तला पहुची | मेरे दोस्त और मेरे हमदर्द मेरे बह्नोई जलालुद्दीन का इन्तेकाल हो गया था। कुछ देर के लिए तो मैं सुन्न होक रह गया, मेरी आँखों में अँधेरा छा गया | थोड़ी देर बाद जब अपने चौगिरदे का एहसास हुआ, मैंने महसूस किया कि जैसे मेरी हस्ती का एक हिस्सा मर गया था। रात के रात बसों में सफ़र करता हुआ अगली सुबह मै रामेश्वरम पहुचा |

जोहरा को क्या तसल्ली देता और क्या सब्र देता अपनी भांजी महबूबा को जो रो रोकर हलकान हो रही थी, मेरी आँखों के सोते पहले ही सूख चुके थे। थुम्बा लौटकर बहुत दिनों तक सारा काम काज, सारी मसरूफियत बेमानी लगने लगी | बहुत दिनों तक बहुत मलाल लगा, सब बेमानी लगता था। प्रो. धवन देर देर तक हौसला देते थे, कहते थे, "SLV पर जैसे जैसे काम आगे बढ़ेगा, मुझे सब्र महसूस होगा और ये मायूसी कम होते होते गुज़र जायेगी

1976 में मेरे अब्बा जेनुलाब्दीन 102 साल की उम्र में वही रामेश्वरम में इन्तेकाल फरमा गए । 15 पोते पोतियाँ छोड़ कर गए थे पीछे और एक पड़पोता | दुनियावी तौर पर वो सिर्फ एक और बुजुर्ग की मौत थी, कोई बड़ा मातम नहीं हुआ, झंडा नहीं उतारा गया, ना अखबारों में स्याह हाशिये दिए गए। ना सियासतदान थे वो ना विद्वान कोई, ना कोई बड़े सरमाया दार, एक सीधे सादे इंसान थे फ़रिश्ता शिफत और हर एक उस बात की वजह थे जो दानाई और पारसाई की राह दिखाती है। मैं बहुत देर तक अपनी माँ के पास बैठा रहा चुपचाप और जब उठा थुम्बा लौटने के लिए तो उसने रुंधे गले से दुआए दी मुझे |

SLV 3 आपाचे रॉकेट जो फ्रांस से उडाई जाने वाली थी, अचानक कुछ मुश्किलों का शिकार हो गयी | मुझे फ़ौरन फ्रांस जाना पड़ा। मै रवाना होने ही वाला था कि मेरी माँ की मौत की खबर पहुची, एक के बाद एक पूरी तीन मौते हो गयी मेरे घर में, उस वक्त मुझे अपने काम में पूरे ध्यान की ज़रुरत थी |

सौर फीसदी लगन से काम करने की ख्वाहिश किसी और लगन की गुंजाईश नहीं छोडती | मुकल्माती और पूरी लगन से SLV 3 का ख्वाब 1979 के दरमियान में जाकर पूरा हुआ | हमने SLV3 की परवाज का दिन 10 अगस्त 1979 तय किया। 23 मीटर लम्बा चार स्टेजेस का ये राकेट 17 टन का वजन लेकर 7 बजकर 58 मिनट में बड़ी कजादाई से उड़ा और खला की तरफ रवाना हुआ।

पहली स्टेज हर तरह से पुख्ता निकली और बड़े आराम से राकेट दूसरी स्टेज में चला गया हम दम्खुद रह गए. सांस रुकी बैठी थी. हमारे बरसो का ख्वाब आसमान की तरफ सफ़र कर रहा था। अचानक हमारे ख्वाब में दरार आयी, हमारा सुकून टूटा, हमारी खमोशी टूटी | दूसरी स्टेज काबू से बाहर होने लगी थी। तीन सौ सत्रह सेकंड बाद परवाज टूट गयी मेरी मेहनत और उम्मीद चौथी स्टेज को साथ लेकर तमाम मलबा हरिकोटा से 560 किलोमीटर दूर समुन्दर में जाकर गिरा | इस हादसे से हम सबको सख्त सदमा पहुचा, मै गमो गुस्से से भर गया | निचुड़ गया बिलकुल जिस्मानी तौर पर भी और जेहानी तौर पर भी मै सीधा अपने कमरे में गया और बिस्तर पर धंस गया |

मैंने अपने कंधे पर एक दिलासे का हाथ महसूस किया तो आँख खोली | दुपहर ढल चुकी थी शाम करीब थी | डा. ब्रह्म प्रकाश मेरे सिरहाने बैठे थे। उनकी इस हमदर्दी ने छू लिया मुझे, मै उदास था, मायूस था लेकिन अकेला नहीं था | हर शख्स तकनीकी जमातफरीकी और बहस मुबाहिसे के बाद मुतमईन हो चूका था लेकिन मुझे इत्मीनान ना आया | मै मुसलसल और बैचेन रहा, मै बेसाख्ता खड़ा हो गया और एतराफ किया प्रो. धवन के सामने "सर मेरे साथियो को नाकामयाबी की वजह दरयाफ्त हो जाने की वजह से इत्मीनान हो गया है लेकिन मै उसे काफी नहीं समझता, इस मिशन में डायरेक्टरेट की हैसियत से इस गलती को भी मैं अपनी जिम्मेवारी समझता हूँ | SLV 3 की नाकामयाबी की जिम्मेदारी मेरी है।

साईंस का काम कमाल दर्जा उत्साह भी देता है, ख़ुशी भी और उतनी गहरी मायूसी भी | इस तरह के वाक्यात सोच सोच के मै दिल को ढाढस देता रहा | ये ख्याल के इंसान चाँद पर उतर सकता है, ये सबसे पहले एक रुसी साइंटिस्ट ने सोचा था | उसे हकीकत बनाने में 40 साल गुज़र गए जब अमेरिका ने उसे पूरा किया | प्रोफ. चन्द्रशेखर ने चंद्रशेखर लिमिट का आविष्कार किया था 1930 में जब केम्ब्रिज में पढ रहे थे लेकिन पचास साल बाद उन्हें उसी डिस्कवरी पर नोबेल प्राईज़ मिला | अपनी सेटेल लांच वीहिकल से आदमी को चाँद पर उतारने से पहले कितनी सारी नाकामियों से गुज़रे होंगे | पहाड़ की चोटी पर उतरने से पहाड़ पर चढने का तजुर्बा नहीं मिलता। जिंदगी पहाड़ की चडानो पर मिलत हा चोटी पर नहीं चढानों पर ही तजुर्बे मिलते है और जिंदगी मंजती है और टेक्नोलोजी तरक्की करती है | चोटी पर पहुचने की कोशिश में ही चढानों का इल्म हासिल होता है। मैं एक एक कदम चलता रहा, चढता रहा चोटी की तरफ |

SLV 3 की उड़ान से 30 घंटा पहले 17 जुलाई 1980 के दिन अखबारों की सुर्खिया तरह तरह की राय और अंदाज से भरी हुई थी | ज़्यादातर रिपोर्टर ने पहली PSLV की याद दिलाई थी कि किस तरह रॉकेट फेल हो गया और उसका मलबा समुन्द्र में जा गिरा था | कुछ लोगो ने तो उसे देश की दूसरी खामियों का जिक्र करते हुए भी उसे SLV 3 से जोड़ दिया था | मै जानता था कि अगले दिन का नतीजा हमारे फ्यूचर के स्पेस प्रोग्राम का फैसला करने वाला है। मुख़्तसर ये कि सारे कौम की नज़रे हम पर गड़ी हुई थी। 18 जुलाई 1980 सुबह 8 बजकर तीन मिनट पर हिन्दुस्तान का पहला सेटेलाईट लांच व्हीकल उड़ा | मैने रोहिणी सेटेलाईट का तमाम डेटा कम्प्यूटर पर जांचा, अगले दो मिनट के अन्दर अन्दर रोहिणी अन्तरिक्ष में था | उस तमाम शोरगुल के बीच मैंने अपनी जिंदगी के सबसे अहम् अलफ़ाज़ अदा किये "मै मिशन डायरेक्टर बोल रहा हूँ, एक ज़रूरी खबर सुनने को तैयार रहो, चौथी स्टेज की कामयाबी के साथ रोहिणी सेटेलाईट को लेकर अन्तरिक्ष में दाखिल कर रही है"

ब्लाक से बाहर आया तो मेरे साथियों ने मुझे कंधो पर उठा लिया और नारे लगाते हुए जुलूस निकला | सारी कौम में एक जोश की लहर दौड़ गयी, हिन्दुस्तान उस चंद कौमो में शामिल हो गया था जिनके पास सेटेलाईट लांच की काबिलियत थी, हमारे कौम का एक बड़ा ख्वाब पूरा हुआ था, हमारे इतिहास का एक नया वाक्फ खुला, एक नया चेप्टर | प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने मुबारकबाद का तार भेजा और सबसे ज्यादा हिंस्दुस्तान के सायिन्स्दान खुश थे कि ये पूरी कोशिश स्वदेशी थी, हमारी अपनी थी।

मै कुछ मिले जुले जज़्बात से गुज़र रहा था, मै खुश था कि पिछली दो दहायियों से जिस कोशिश में था बिल आखिर उसमें कामयाब हुआ लेकिन उदास था | जिन लोगो की बदौलत मै यहाँ पंहुचा था वो लोग मेरे साथ नहीं थे मेरे अब्बा, मेरे बहोई जलालुदीन और प्रोफ. साराभाई |

SLV 3 की कामयाबी के महीने भर के अन्दर ही प्रोफ. धवन का फोन आया एक दिन और दिल्ली बुलाया प्रधान मंत्री से मिलने के लिए मेरी एक छोटी सी उलझन थी कपड़ो को लेकर हमेशा से ही बड़े आमियाना से कपडे पहनता हूँ और पांवो में चप्पल या स्लीपर्स कह लो । प्रधान मंत्री को मिलने जैसा वो लिबास नहीं था मेरे लिए तो नहीं, उनके एहतराम के लिए सुना तो प्रोफ. धवन बोले कपड़ो की फ़िक्र मत करो, तुमने जो शानदार कामयाबी पहन रखी है वो काफी है"

रिपब्लिक डे 1981 मेरे लिए एक बड़ी खुशखबरी लेकर आया कि मुझे पद्म भूषन से नवाज़ा गया है। मैंने अपने कमरे को बिस्मिल्लाह खान की शहनाई से भर लिया । शहनाई की गूँज मुझे कहीं और ही ले गयी, मै रामेश्वरम में पहुच गया | माँ के गले लगा, अब्बा ने मेरे बालो को उँगलियों से सहलाया और मेरा दोस्त मेरा रफीक जलालुदीन मस्जिद में मेरे इनाम का एलान कर रहा था | मेरी बहन जोहरा ने मीठा बनाया घर में | बक्शी लक्ष्मण शास्त्री ने मेरे माथे पर तिलक लगाया और फादर सोलोमन ने मेरे हाथ में सलीब लेकर दुआ पड़ी और प्रोफ. साराभाई को देखा। उनके चेहरे पर मुस्कराहट थी, फन था जो पौधा वो लगाकर गए थे अब पूरा पेड़ बन चूका था जिसके फल हिन्दुस्तान की अवाम तक पहुँच रहे थे ।

पहली जून 1982 को मैंने डिफेन्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरटरी DRDL की जिम्मेदारी संभाल ली | उस वक्त के डिफेन्स मिनिस्टर श्री आर वेंकटरमण ने जब मशविरा दिया कि बजाय दरजा व दरजा मिसाईल तैयार करने के हमें मुक्कमल अपनी मिसाईल तैयार करने का प्रोग्राम बनाना चाहिए तो हमें अपने कानो पर यकीन नहीं आया और देखते ही देखते वो प्रोजेक्ट बन जिसके नतीजे आईंदा बहुत दूर तक पहुचे | हर प्रोजेक्ट का नाम हिन्दुस्तान की खुद मुख्तारी, सेल्फ रिलायंस का सुबूत था | सरफेस टू सरफेस मिसाईल का नाम पृथ्वी रखा गया, टेक्टिकल कोर व्हीकल को त्रिशूल का नाम दिया गया, सरफेस तो एयर डिफेन्स सिस्टम आकाश कहलाया | एंटी टैंक मिसाईल के प्रोजेक्ट को नाग के नाम से पुकारा गया और मेरे देरीना ख्वाब रेक्स को यानि रिएक्स्पेरिमेंट लांच व्हीकल को मैंने अग्नि का नाम दिया |

मिसाईल टेक्नोलोजी का हुनर दुनिया की कुछ चुनी हुई कौमो के पास ही था, वो बड़े ताज्जुब से हमारी तरफ देख रहे थे कि हम क्या करने जा रहे हैं और कैसे करेंगे। हम एक मीटिंग में बैठे हुए अपने मकसद को पूरा करने के लिए 1984 की निशानदेही कर रहे थे जब डा. ब्रह्म प्रकाश की मौत की खबर आई। मेरे लिए तो वो एक और सदमा था। पहली SLV की नाकामयाबी के वक्त जिस तरह उन्होंने ढाढस दी थ मुझे, वो याद करके मैं और ज्यादा ग़मगीन हो गया। प्रोफ. साराभाई अगर VSSC के निर्माता थे, बनाने वाले थे तो प्रोफ. ब्रह्म प्रकाश उसके आमिल थे, एक्जिक्युटर थे | उनकी विनम्रता ने मुझे बड़ी हद तक नम्र कर दिया और मैने अपनी तुन्जमिजाजी पर काफी हद तक काबू कर लिया | उनकी हलीमी सिर्फ अपनी खूबियों तक ही महदूद नहीं थी बल्कि अपने से छोटो को इज्ज़त देना भी उनकी आदत में शामिल था। उनके बर्ताव और सुलूक में बात नज़र आ जाती थी कि कोई भी शख्स खामियों से खाली नहीं है। यहाँ तक कि अफसर भी, लीडर भी, रहनुमा भी, वो बहुत बड़े दानेशर थे, एक कमजोर शरीर के अन्दर उनमे बच्चों सी मासूमियत थी | मुझे हमेशा वो साईंसदानो में संत नज़र आते थे |

पृथ्वी का काम अपनी तकमील को पहुँच रहा था जब हम 1988 में दाखिल हुए। 25 फरवरी 1988 को सुबह 11 बजकर 23 मिनट पर पृथ्वी की पहली परवाज वाकिब हुई | हमारे मुल्क में वो एक ऐतिहासिक मौका था | पृथ्वी सिर्फ एक सरफेस टू सरफेस मिसाईल ही नहीं बल्कि आईदा आने वाली तमाम किस्म की मिसाईल का बुनियादी नक्शा भी था, फ्यूचर का मोड्यूल था वो | पृथ्वी ने हमारे आस पड़ोस के मुल्को को दहला दिया मगरबी यानी वेस्टर्न मुल्को को पहले तो हैरत हुई फिर गुस्से का इज़हार किया और पाबन्दी लगा दी इंडिया के लिए कि वो ऐसी कोई चीज़ बाहर के मुल्को से ना खरीद सके जो उनके मिसाईल प्रोग्राम में इस्तेमाल हो सकती हो या काम आ सकती हो। मिसाईल की ईजाद ने, हिन्दुस्तान की खुद मुख्तारी ने दुनिया के तमाम तरक्की याफ्ता मुल्को को परेशान कर दिया। अग्नि की टीम में 580 से ज्यादा साईसदान शामिल थे। अग्नि की परवाज 20 अप्रेल 1989 तय पायी गई |

लांच की तमाम तैयारियां मुक्कमल हो चुकी थी और फिर हिफाज़त के लिए ये फैसला किया गया था कि लांच के वक्त आस पास के तमाम गावं खाली करा दिए जाए। अखबार और मीडिया ने इस खबर को बहुत उछाला | 20 अप्रैल पहुचते पहुचते तमाम मुल्क की नज़रे हम पर टिकी हुई थी। दुसरे मुल्को का दबाव बड रहा था कि हम इस तजुर्बे को मुल्तवी कर दे या खारिज कर दे लेकिन सरकार मज़बूत दिवार की तरह हमारे पीछे खड़ी रही और किसी तरह हमें पीछे नहीं हटने दिया | परवाज़ से सिर्फ 14 सेकेण्ड पहले हमें कम्प्यूटर ने रुकने का इशारा किया। किसी एक पुर्जे में कोई खामी थी, वो फ़ौरन ठीक कर दी गयी | लेकिन उसी वक्त डाउन रे स्टेशन ने रुकने का हुक्म दिया | चंद सेकेंड्स में कई रूकावटे सामने आ गयी, अब परवाज़ मुल्तवी कर दी गयी । अखबारात ने आस्तीने चढ़ा ली | हर बयानात में अपनी अपनी तरह की वजूहात निकाल ली | कार्टूनिस्ट सुधीर लाल ने एक कार्टून शाया किया जिसमे एक खरीददार कुछ सामान दुकानदार को वापिस करते हुए कह रहा था " अग्नि की तरह वो भी नहीं चली" एक कार्टून में दिखाया गया कि साईंसदान कह रहा है" सब ठीक था, स्विच बटन नहीं चला"

हिन्दुस्तान टाईम्स के एक कार्टून में एक नेता रिपोर्टर को समझा रहा था " डरने की कोई बात नहीं, ये बड़ी अमन पसंद अहिंसा की मिसाईल है जिससे कोई मरेगा नहीं" करीब दस रोज़ दिन रात काम चला मिसाईल की दुरुस्ती पर और आखिरकार साईंसदानो ने एक नयी तारीख तय की अग्नि की परवाज़ के लिए मगर फिर वही हुआ | 10 सेकेंड्स पहले कम्प्यूटर ने रुकावट का इशारा किया, पता चला कि एक पुर्जा काम नहीं कर रहा है। परवाज़ फिर मुल्तवी कर दी गयी ऐसी बात किसी भी साईस तजुर्बे में होना आम बात थी, गैर मुल्को में भी बहुत बार होता है लेकिन उम्मीद से भरी हुई कौम हमारी मुश्किल समझने को तैयार नहीं थी। हिन्दू अख़बार में केशव का एक कार्टून छपा जिसमे एक देहाती कुछ नोट गिनते वलत कह रहा था " मिसाईल के वक्त गाँव से हट जाने का मुवावजा मिला है, दो चार बार और तजुर्बा मुल्तवी हुआ तो फिर पक्का घर बनवा लूंगा | अमूल बटर ने अपने होर्डिंग पर लिखा कि "अग्नि को ईंधन के लिए हमारे बटर की ज़रूरत है।

अग्नि की मरम्मत का काम जारी रहा। आखिरकार एक बार फिर 22 मई की तारीख अग्नि की परवाज़ के लिए तय पायी | उसकी पिछली रात डा. अरुणाचलम, जर्नल के. एन. सिंह और मे डिफेन्स मिनिस्टर के. सी. पन्त के साथ चहलकदमी कर रहे थे। पूरे चाँद की रात थी, हाई टाईड का वक्त था और लहरे गरज गरज कर ख़ुदा की अजबल का नाम ले रही थी। कल अग्नि की परवाज कामयाब होगी कि नहीं बार बार यही सवाल हमारे दिमाग में गूँज रहा था |

डिफेंस मिनिस्टर ने एक लम्बी ख़ामोशी को तोड़ते हुए पूछा " कलाम कल अग्नि की कामयाबी मनाने के लिए क्या चाहते हो तुम?" मै क्या चाहता था ? क्या था जो नहीं था मेरे पास ? अपनी ख़ुशी के इज़हार के लिए मुझे क्या करना चाहिए ? और अचानक मुझे जवाब मिल गया । "हम एक लाख पेड़ो की कोंपले लगायेंगे" मैंने कहा और उनके चेहरे पर रौनक आ गयी "तुम अपनी अग्नि के लिए धरती माँ का आशीर्वाद चाहते हो" वे बोले, कल यही होगा" उन्होंने पेशनगोई की | अगले दिन सुबह 7 बजकर 10 मिनट पर अग्नि लांच हुई। कदम कदम सही निकला, मिसाईल ने जैसे टेक्स बुक याद कर ली हो, जैसे सबक याद कर लिया था | हर सवाल का सही जवाब मिल रहा था। लगता था जैसे एक लम्बे खौफनाक ख्वाब के बाद एक खूबसूरत सुबह ने आँख खोली हो ।

पांच साल की मशक्कत के बाद हम इस लांच पेड पर पहुचे थे | इसके पीछे पांच लम्बे सालो की नाकामी, कोशिशे, और इम्तिहान खडे थे । इस कोशिश को रोक देने के लिए हिन्दुस्तान ने हर तरह के दबाव बर्दाश्त किये थे। लेकिन हमने कर दिखाया जो करना था | मेरी जिंदगी का सबसे कीमती लम्हा था वो मुट्ठीभर सेकेंड्स | 600 सेकेंड्स की वो परवाज़ जिसने हमारी बरसो की थकान दूर कर दी, बरसो की मेहनत को कामयाबी का तिलक लगाया | उस रात मैंने अपनी डायरी में लिखा " अग्नि को इस नज़र से मत देखो, ये सिर्फ ऊपर उठने का साधन नहीं है, ना शक्ति की नुमाईश है, अग्नि एक लौ है जो हर हिन्दुस्तानी के दिल में जल रही है। इसे सिर्फ एक मिसाईल मत समझो, ये कौम के माथे पर चमकता हुआ आग का एक सुनहरी तिलक है"।

1990 के रिपब्लिक डे पर देश ने अग्नि व् मिसाईल प्रोग्राम की कामयाबी का जश्न मनाया | मुझे पद्म विभूषण से नवाज़ा गया और डा. अरुणाचलम को भी । दस साल पहले पद्म भूषन की यादे एक बार फिर हरी हो गयी | रहन-सहन अभी भी मेरा वैसा ही था जैसा तब था |

10 बाय 12 का एक कमरा किताबो से भरा हुआ और कुछ ज़रूरत का फर्नीचर जो किराए पर लिया था | फर्क इतना ही था कि तब ये कमरा त्रिवेंद्रम में था अब हैदराबाद में वेटर मेरा नाश्ता लेकर आया, इडली और छांछ और आँखों में एक खामोश मुस्कुराहट मुबारकबाद की मै अपने हम वतनो की इस नवाजिश से छलक गया | मै जानता हूँ कि बहुत से साइंसदान और इंजीनियर मौका मिलते ही वतन छोड़कर दुसरे देशो में चले जाते है ज्यादा रुपया कमाने के लिए, ज्यादा आमदनी के लिए लेकिन ये आदर, इज्जत और मुहब्बत क्या कमा सकते है जो उन्हें अपने वतन से मिलती है ।

15 अक्टूबर 1991 को मै 60 साल का हो गया | मुझे अपनी रिटायरमेंट का इंतज़ार था, चाहता था कि गरीब बच्चो के लिए एक स्कूल खोलू | ये वो दिन थे जब मैंने सोचा कि अपनी जिंदगी के तजुर्बे, मुसाहिदे और वो तमाम बाते कलमबंद करूँ जो दुसरो के काम आ सके | एक तरह से अपनी उमरी लिखू, अपनी जीवनी | मेरे ख्याल से मेरे वतन के नौजवानों को एक साफ़ नज़रिए और एक दिशा की ज़रुरत है तभी ये इरादा किया कि उन तमाम लोगो का जिक्र करूँ जिनकी बदौलत मै ये बन सका जो मै हूँ | मकसद ये नहीं था कि मैं बड़े बड़े लोगो के नाम लूँ बल्कि ये कि कोई भी शख्स कितना भी छोटा क्यों ना हो उसे हौसला नहीं छोड़ना चाहिए |

मसले, मुश्किलें जिंदगी का हिस्सा है और तकलीफे कामयाबी की सच्चाई | जैसा कहा है किसी ने कि" खुदा ने ये वादा नहीं किया कि आसमान हमेशा नीला ही रहेगा, जिंदगी भर फूलों से भरी राहे ही मिलेंगी, खुदा ने ये वादा नहीं किया कि सूरज है तो बादल नहीं होंगे, ख़ुशी है तो गम नहीं, सुकून है तो दर्द नहीं होगा | मुझे ऐसा कोई गुमान नहीं कि मेरी जिंदगी सबके लिए एक मिसाल बने मगर ये हो सकता है कि कोई मायूस बच्चा किसी गुमनाम सी जगह पर जो समाज के किसी माजूर से हिस्से से ताल्लुक रखता हो, ये पढ़े और उसे चैन मिले, ये पढ़े और उसकी उम्मीद रोशन हो जाए । हो सकता है कि ये कुछ बच्चो को नाउम्मीदी से बाहर ले आये और जिसे वो मजबूरी समझते है वो मजबूरी ना लगे | उन्हें यकीन रहे कि वो जहाँ भी है, खुदा उनके साथ है | काश हर हिन्दुस्तानी के दिल में जलती हुई लौ को पर लग जाए और उस लौ की परवाज़ से सारा आसमाँ रोशन हो जाए ।

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Elon Musk- Biography in Hindi। दुनिया के सबसे अमीर इंसान की कहानी


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दुनिया के सबसे अमीर इंसान की कहानी

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स्पेस एक्स और टेस्ला के को-फाउंडर एलन मस्क का नाम भला किसने नहीं सुना होगा. उनकी एक्स्ट्रा ओर्डीनेरी पर्सनेलिटी ने करोडो लोगो को इंस्पायर किया है और आज भी कर रहे है. उनकी बायोग्राफिकल बुक है एलन जो हमे उनकी लार्जेर देन लाइफ पर्सनेलिटी की झलक दिखाती है. इस बुक के थ्रू हमे उनकी लाइफ के स्ट्रगल, अचीवमेंट्स और गोल्स के बारे में जानने का मौका मिलता है. ये बुक काफी इंस्पिरेशनल है खासकर उन लोगो के लिए जो कभी हार नहीं मानते.


1. इस बुक से हम क्या सीखेंगे?


एक जीनियस बच्चा जिसका बचपन बड़े स्ट्रगल में गुज़रा, जो बचपन से ही राकेट बनाने का सपना देखता था और इसी सपने को पूरा करने के वो साऊथ अफ्रीका से यूनाइटेड स्टेट्स आया. एलन मस्क वो जीनियस था जो ना सिर्फ टेक्नोलोजिकल इनोवेशसं का एक्सपर्ट था बल्कि उसे इस दुनिया को बचाने की भी उतनी ही परवाह थी इसीलिए तो उसके माइंड में इलेक्टिकल कार और स्पेसशिप बनाने का आईडिया आया. एलन मस्क की ये बुक उनके चाहने वालो के लिए एक गिफ्ट की तरह है जिसके थ्रू उन्हें इस महान इनोवेटर की लाइफ के कई अनजाने पहलुओ को जानने का मौका मिलेगा.

2. ये बुक किस किसको पढनी चाहिए?


हर वो इंसान जो एलन मस्क की मैजिकल और इंस्पायरिंग स्टोरी जानने में इंट्रेस्टेड है, स्पेशली एंटरप्रेन्योर्स इस बुक से काफी कुछ लर्न कर सकते हैं, एलन मस्क ने कभी गिव अप नहीं किया और हर ग्रेट एंटरप्रेन्योर में यही क्वालिटी होती है.

3. इस बुक के ऑथर कौन है

राइटर एश्ली वांस ने एलन मस्क की बायोग्राफी' एलन मस्क, टेस्ला, स्पेस एक्स एंड क्वेस्ट फॉर अ फेंटास्टिक फ्यूचर " लिखी है. एश्ली वांस एक अमेरिकन बिजनेस कोलमनिस्ट और ऑथर है जिन्होंने कई सारी बुक्स लिखी है लेकिन एलन मस्क पर लिखी उनकी बायोग्राफी सबसे ज्यादा पोपुलर बुक्स में से एक है. 2015 में उन्होंने ब्लूम बर्ग के लिए एक वीडियो सीरीज हेल्लो वर्ल्ड राईट और होस्ट करनी शुरू की थी.

आध्याय 1-एलन की दुनिया 

साल 2000 में सिलिकोन वैली और सेन फ्रेंसिस्को डिप्रेशन में डूबे हुए थे क्योंकि इन्टरनेट का नशा उतरने लगा था। अब जमाना डॉट कॉम का था जिसके चलते वेंचर कैपिटलिस्ट किसी भी इन्वेस्ट में पैसा लगाने से कतरा रहे थे। इस दौर में सिलिकोन वैली के पास सिर्फ एक क्लीक एड्स का काम ही बचा था। ट्विटर और फेसबुक ने अभी-अभी पैर पसारने शुरू किये थे। कुछ लोगो का मानना था कि टेक्नोलोजी इंडस्ट्री अब ठंडी पड़ चुकी है।

एलन मस्क भी इसी डॉट कॉम मेनिया का एक हिस्सा थे। अपनी कॉलेज की पढ़ाई खत्म करने के बाद उन्होंने ज़िप 2 बनाया और $22 मिलियन कमाए । ज़िप 2 गूगल मैप्स की ही तरह का एक सॉफ्टवेयर था। कॉमपेक ने ज़िप 2 को 1999 में खरीदा था। मस्क ने इस कमाई को एक और स्टार्ट-अप X.com खोलने के लिए इन्वेस्ट किया जो बाद में पे-पाल बना। और फिर जब 2002 में ई-बे ने पे-पाल (Pay Pal) खरीदा तो मस्क पहले से ज्यादा अमीर हो गए।

मस्क सिलिकोन वैली के बजाए लॉस एंजेल्स में रहने चले गए थे, जहाँ पर उन्होंने टेस्ला, स्पेस एक्स और सोलर सिटी बनाई। उनकी कंपनीज़ ELECTRIC CARS, एरोस्पेस और सोलर इंडस्ट्रीज में लीड करती है। राकेट, इलेक्ट्रिक कार और सोलर पैनल बनाकर मस्क ने फ्यूचर को बदल कर रख दिया। एलन की दुनिया में रियलिटी और साइंस फिक्शन मिलकर एक हो गए है।

एलन मस्क बाकी टेक्नोलोजी मिलेनियर से हटकर है। उनका सोच विश्वव्यापी है। मस्क कहते है" अगर हम कभी ना खत्म होने वाली वाली एनर्जी का हल ढूंढ ले और मल्टी प्लानेटेरी स्पीसीज़ बनने की राह में तरक्की कर ले । तो ये वाकई में बहुत बढ़िया बात होगी" । आज मस्क कंपनी मे हज़ारो लोग काम करते है जिसका नेट वर्थ $10 बिलियन है।

अध्याय 2 अफ्रीका


मस्क के नाना जोशुआ हेल्डीमेन केनेडा से साउथ अफ्रीका तक खुद का जहाज उड़ाया करते थे। वे माइग्रेट होने के बाद अपने पूरे परिवार सहित हमेशा के लिए प्रेटोरिया में सेटल हो गए थे मगर कभी-कभी वे लोग नोर्वे, स्कॉट और आस्ट्रेलिया जाया करते थे।

मेये हेल्डीमेन (Maye Haldeman) और एरोल मस्क बचपन से ही एक दुसरे को चाहते थे। जब वे बड़े हुए तो दोनों ने शादी कर ली और उसके बाद जल्द ही एलन का जन्म हुआ। मस्क 28 जून, 1971 को पैदा हुए थे। उनके पिता एरोल मस्क एक सक्सेसफुल इंजीनियर थे वहीं माँ मेये (Maye) एक डाइटीशिएन थी। एलन के अलावा उनके दो बच्चे और थे, किम्बल और टोस्का।

एलन अभी सिर्फ 5 साल के ही थे जब उनकी काबिलियत दिखने लगी थी वे घंटो किताबो में डूबे रहते। “द लार्ड ऑफ़ द रिंग्स" और "द हिचहाइकर "स गाइड to गेलेक्सी' उनकी पसंदीदा किताबे थी। उनके पास एनसाइक्लोपीडीयया के दो बड़े सेट रखे थे जिन्हें वो तब पढ़ते जब पढने के लिए किताबे ख़त्म हो जाती थी मस्क परिवार एक खुशहाल परिवार था। प्रेटोरिया में उनके पास बहुत बड़ा घर था। मगर एलन जब आठ साल के हुए तो उनके माँ-बाप का तलाक हो गया था। वे और उनके भाई किम्बल अपने पिता के साथ रहने लगे। उनके पिता खुशमिजाज़ नहीं थे इसलिए एलन को कभी भी अपना बचपन खुशहाल नहीं लगा।

एलन जब 10 साल के थे जब उन्होंने पहली बार कंप्यूटर देखा। वे इसे देखकर इतने हैरान हुए कि उन्होंने अपने पिता से अपने लिए एक कंप्यूटर खरीदने की जिद की। और जब उनके पिता उनके लिए कंप्यूटर लेकर आये तो पूरे तीन दिनों में ELON ने बेसिक प्रोग्रमिंग सीख ली एलन अपने भाई किम्बल और कज़न पीटर, लेंडन और रस रिवे के बेहद करीब थे वे उनके साथ मिलकर होम मेड राकेट और एक्सप्लोसिव बनाया करते थे। उन सबको एक साथ लंबी ट्रेन ट्रिप्स पे जाना और डनजियंस और ड्रेगन्स खेलना भी बहुत पसंद था पर जब एलन स्कूल जाने लगे तो वहां उन्हें कुछ अलग ही अनुभव हुए। स्कूल में उन्हें अक्सर बुल्ली किया जाता था। एक बार उनके साथ ऐसा दर्दनाक हादसा हुआ जिससे उन्हें गहरा सदमा लगा एलन सीडीयों पर बैठे कुछ खा रहे थे जब एक लडके ने उन्हें पीछे से सर पर लात मारी और एक जोर का धक्का दिया। इस धक्के से एलन सीडीयों से गिर पड़े। उसके बाद उस लड़के ने उन पर मुक्को की बरसात शुरू कर दी। उन्हें इतनी चोट आई कि तुरंत उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा। खून से उनका बदन सन गया था। उन्हें पूरी तरह ठीक होने में पूरा एक हफ्ता लगा और उसके बाद ही वे स्कूल जाने लायक हुए। पूरे चार सालो तक एलन उसी खौफ के साए में जीते रहे। स्कूल का वो बदमाश गेंग बेवजह ही एलन को हर वक्त परेशान किया करता था। आखिरकार उन्होंने उन्हें अपना स्कूल बदलना पड़ा।

जब एलन 17 साल के हुए तो उन्होने साउथ अफ्रीका छोड़ कर जाने का मन बनाया। उन्हें लगता था कि अमेरिका में उन्हें अपने लिए बेहतर मौके मिल सकते है। साथ ही उन्हें सिलिकोन वैली भी पसंद थी जब उनके परिवार को केनेडा की सिटीजनशिप मिली तो एलन को निकल भागने का एक मौका मिल गया था।

अध्याय 3 केनेडा


केनेडा में अपने शुरुवाती दिनों में मस्क को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा जब वे घर से केनेडा जाने के लिए निकले तो उनके पास वहां रहने का कोई ठिकाना नहीं था। उन्होंने वहां अपने कुछ रिश्तेदारों को खोजा और किसी तरह रहने का बंदोबस्त किया। अपना 18वा जन्मदिन उन्होंने कुछ पड़ोसियों और रिश्तेदारों के साथ मनाया जिन्हें वे ठीक से जानते तक नहीं थे। इस दौरान मस्क ने कुछ ओड जॉब्स भी की जैसे कि सब्जिया वगैरह ले आना और लकडियाँ काटना। उनके भाई किम्बल भी बाद में उनके पास केनेडा आ गए।

साल 1989 में मस्क ने क्वीन्स युनिवेर्सिटी ओंटारियो (Queen's University Ontario) में दाखिला लिया जहाँ पर उनकी मुलाकात अपनी पहली पत्नी जस्टिन विल्सन से हुई पहली डेट के लिए जस्टिन ने उन्हें बहुत तरसाया था मगर मस्क भी कम जिद्दी नहीं थे। जस्टिन ने बाद में कहा कि " वो किसी को भी अपना दीवाना बना सकते है" ।

कॉलेज की पढ़ाई ने मस्क की जिंदगी में बहुत से बदलाव लाए। वे अभी भी स्पेस और एनर्जी की बाते किया करते थे जिसका उनके क्लासमेट मज़ाक उड़ाया करते। मस्क उन लोगो से मिले जिनसे उनके विचार मिलते थे। अपने खाली वक्त में वे कंप्यूटर ठीक किया करते जिससे उनकी कुछ एक्स्ट्रा कमाई हो जाती। वे अपने क्लास मेट्स को स्पेयर पार्ट भी बेचा करते थे।

दो साल बाद मस्क को स्कोलरशिप मिली। उन्होंने युनिवेर्सिटी ऑफ़ पेनेसिलेवेनिया से अपनी पढ़ाई जारी रखी वहां उन्होंने इकोनोमिक्स और फिजिक्स दोनों की पढाई की। पेनसिल्वेनिया युनिवेर्सिटी में मस्क लंच के दौरान अपने दोस्तों से फिजिक्स पर डिसकसन किया करते। उन्होंने और उनके खास दोस्त ने मिलकर एक घर किराए पर लिया। इस घर में वे वाइल्ड पार्टीज़ रखते और जो लोग पार्टी में आते उनसे $5 पर हेड के हिसाब पैसा वसूलते। मस्क अपनी क्लास के लिए कई दिलचस्प बिजनेस आडियाज़ भी सोचा करते उनका ऐसा ही एक आइडिया था" द इम्पोर्टेंस ऑफ़ बीइंग सोलर" यानी सोलर पॉवर का महत्त्व। उन्होंने दावा किया कि आने वाले समय में सोलर पॉवर टेक्नोलोजी के फील्ड में तेजी आएगी और बड़े-बड़े सोलर प्लांट सिस्टम लगाए जायेंगे। उन्होंने सोलर सेल्स और ऐसे कम्पाउंड के बारे में बताया जो पॉवर को ज्यादा से ज्यादा बड़ा सकते है। उन्होंने अल्ट्रा- केपेसिटर्स के बारे में भी एक पेपर लिखा था जिसमे बताया गया कि ये एक प्रकार की बेट्री सेल्स है जो बड़ी तादाद में एनेर्जी स्टोर कर सकती है। इन्हें रीचार्ज किया जा सकता है। और बाकी केपेसिटर्स के मुकाबले थे 100 गुना ज्यादा पॉवर दे सकती है। मस्क ने तभी इलेक्ट्रिक कार और रॉकेट्स के बारे में सोच लिया था।

उनके प्रोफेसर्स ने उनके इस लाजवाब एनालिसिस की तारीफ की थी। मस्क हर तरह की मुश्किल से मुश्किल फिजिक्स कॉन्सेप्ट्स का हल ढूंढ लेते थे। उन्हें ये भी मालूम होता था कि इससे अच्छा प्रॉफिट कैसे कमाया जाता है। कॉलेज खत्म होने के बाद उनके दिमाग में पहले वीडियोगेम्स बनाने का ख्याल आया। मगर मस्क अपने लिए एक ऐसा करियर चाहते थे जिससे वे पूरी दुनिया में एक बड़ा बदलाव ला सके।

वे अक्सर स्पेस, रीन्युयेब्ल एनर्जी और इन्टरनेट के सपने देखा करते थे। उन्हें यकीन था कि आने वाला कल इन्ही का होगा। भविष्य में एक बड़ा बदलाव आने वाला था और इसी में उनको प्रॉफिट दिख रहा था। सिलिकोन वैली फ़ोटोज़ शेयर करने में बीजी था और मस्क दुनिया को विनाश से बचाने की तैयारी कर रहे थे ।

अध्याय 4  एलन का पहला स्टार्ट-अप 


साल 1994 में किम्बल और एलन ने कई रोड ट्रिप्स साथ की। उन दोनों के दिमाग में इन्टरनेट के बिजनेस का आडिया था। फिर आखिरकार मस्क सिलिकोन वैली में बतौर इंटर्न काम करने लगे और जब उन्होंने स्कूल खत्म किया तो किम्बल के साथ मिलकर उन्होंने अपनी कम्पनी स्टार्ट की ज़िप 2 येल्लो पेजेस (yellow pages) का ऑनलाइन वेर्जन है। इसमें सभी बिजनेस एस्टब्लीशमेंट के मेप और उनकी जानकारी दी हुई है। एलन इसके लिए वेबसाइट कोडिंग करते थे और किम्बल उन साइट्स को बेचने का । किम्बल डोर-टू-डोर सेल किया करते थे। मगर ज्यादातर बिजनेसमेन को पता नहीं था कि ज़िप 2 आखिर है क्या? उन्हें कपनी कंपनी के लिए इन्वेस्टर ढूँढने में बहुत मशक्कत करनी पड़ी। आखिरकार एक Investor ने उनके काम में रूचि ली और $3 मिलियन का इन्वेस्ट किया।

ज़िप 2 ने न्यूजपेपर क्लासीफाइड एड देने शुरू किये। हालांकि कंपनी चल पड़ी और तरक्की करने लगी मगर एलन को मेनेजमेंट से निकाल दिया गया। वे अब चीफ टेक्नीकल ऑफिसर थे। ज़िप 2 का अब एक बड़ा सा ऑफिस था और कंपनी ने कोड्स की क्वालिटी बेहतर बनाने के लिए कई प्रोग्रामर्स भी रख लिए थे। साल 1998 में $300 मिलियन की डील के साथ zip-2 सिटी-सर्च के साथ मर्ज हो गयी जो कि पहले उनकी कम्पटीटर थी।

मस्क बर्दस का डॉट कॉम का आइडिया एक हकीकत में तब बदला जब 1999 में कॉम्पैक ने ज़िप-2 को खरीदा। मगर सब कुछ आसान नहीं था। एलन मस्क सीईओ बनना चाहते थे।

पे-पाल माफिया बॉस 
एक दशक बाद मस्क केनेडियन बैकपेकर से एक मल्टी मिलेनियर बन चुके थे वो भी सिर्फ 27 साल में वे कुल मिलाकर $ 22 मिलियन के मालिक थे। उनके पास अब एक बड़ा सा अपार्टमेंट, एक प्लेन और सपोर्ट कार थी। मस्क अपनी McLaren F7 में सिलिकोन वैली के चक्कर काटा करते।

जब वे इंटर्न कर रहे थे उनके दिमाग में इन्टरनेट बैंकिंग का ख्याल आया। उन्होंने इस बारे में अपने सीनियर्स के साथ डिस्कस किया मगर उन्हें ये आइडिया जमा नहीं। ये 1990 का वक्त था, लोग उन दिनों ऑनलाइन किताबे खरीदने से कतराते थे क्योंकि कोई भी अपना क्रेडिट कार्ड नंबर इन्टरनेट पर नहीं देना चाहता था। मस्क फिर भी अपने ऑनलाइन बैंक के आइडिया पर डटे रहे। अपने इस नए प्रोजेक्ट पर उन्होंने $12 मिलियन इन्वेस्ट किये। उन्होंने इस ऑनलाइन बैंकिंग साइट का नाम एक्स।कॉम (X.COM) रखा। उनके एक को-फाउन्डर ने कहा" यही वो खूबी है जो एलन को बाकियों से अलग करती है"। वे रिस्क लेकर अपनी जिम्मेदारी पर इतनी बड़ी रकम लगा रहे है और इस तरह की डील फायदा भी दे सकती है या फिर कंगाल भी कर सकती है। जिप-2 एक साफ-सुथरा सा प्रेक्टिल आइडिया था मगर X कॉम ने तो बैंकिंग इंडस्ट्री को बदल कर रख दिया। मस्क इस बिजनेस में सिर्फ अपने PASSION को लेकर उतरे थे। उन्हें लगता था कि बैंकर्स का तरीका बिलकुल गलत है। और वे उनसे बेहतर कुछ कर सकते है।

मस्क ने ज़िप 2 को एक फायदेमदं इन्वेस्ट के रूप में केपेटीलिस्ट के सामने पेश किया। लोगो को इसके बारे में यकीन दिलाने के लिए उन्होंने पॉवरफुल स्पीच दी और इंजीनियर्स को अपने साथ काम करने के लिए एनकरेज किया। एक्स.कॉम अब जायज रूप से फिनेंस सर्विस कंपनी बन गयी। इसमें बैंकिंग लाइसेस, म्यूचल फंड लाइसेंस और ऍफ़डीआइसी इंश्योरेंस (FDIC insurance) जैसी सुविधाए मौजूद थी। नवम्बर 1999 में साइट इन्टरनेट पर लाइव हुई मस्क उस दिन अपने ऑफिस में पूरे 48 घंटे तक रहे क्योंकि वे चीजों को अपने सामने ही स्मूदली चलते हुए देखना चाहते थे।

एक्स.कॉम ने एक क्रांतिकारी पेमेंट ईजाद किया जिसे पे-पाल नाम दिया गया। इसमें किसी को पैसे भेजने के लिए सिर्फ उसका ई-मेल एड्रेस ही काफी था। कुछ महीनों के अन्दर ही पे पाल को 200,000 क्लाइंट्स मिल गए। पैसे के लेन-देन का ये बड़ा आसान तरीका था जबकि Banks इसी प्रोसेस में कई दिन लगा देते थे। मार्च 2000 में एक्स।कॉम अपने कॉम्पीटीटर कोनफिनिटी के साथ मर्ज हो गयी। मस्क के पास अभी भी कंपनी के ज़्यादातर शेयर थे और कंपनी का नाम भी नहीं बदला गया। मगर फिर एक्स कॉम और कोनफिनिटी की अनबन होने लगी जिसकी वजह थी दोनों का अलग कल्चर और डीसीजन मेकिंग। Employees के एक ग्रुप ने मस्क को कंपनी से बाहर करने की प्लानिंग की। मस्क के बदले वे कोनफ़िनीटी के पीटर थियेल को सीईओ बनाना चाहते थे।

इस दौरान मस्क अपनी पत्नी जस्टिन के साथ हनीमून मना रहे थे। उन्हें जब इस बात का पता लगा तो उन्होंने कम्पनी को अपने फैसले पर दुबारा सोच-विचार करने की गुजारिश की। मगर तब तक बात हाथो से निकल चुकी थी। उन्हें पता चला कि कंपनी ने अपना फैसला ले चुकी थी। मस्क उस कंपनी में अपनी पॉवर खो बैठे थे जिसे उन्होंने ही शुरू किया था।

जून 2001 में एक्स.कॉम पे पाल के नाम से री-ब्रांड की गई। कंपनी एडवाइज़र के तौर पर मस्क की नौकरी सीक्योर थी। उन्होंने और पैसा इन्वेस्ट किया अपना स्टेक बडाकर वे पे-पाल के सबसे बड़े स्टेक होल्डर बन गए। इस वक्त तक उनका डॉट कॉम का बुखार अब उतरने लगा था। बाकी टेक कंपनीज बेचने की जल्दबाजी में लगी थी।

मस्क ने बोर्ड को offers ठुकराने के लिए मना लिया था। पे-पाल का एनुबल रेवेन्यू बड़कर $240 मिलियन हो चूका था। अब ये अपने पैरो पर मजबूती से खड़ी कंपनी बन चुकी थी जो अब पब्लिक हो सकती थी। और तभी 2002 में पे-पाल को ई-बे से $715 बिलियन का ऑफर मिला। ये एक बहुत बड़ा और शानदार ऑफर था। टैक्स काटने के बाद भी मस्क पूरे $180 मिलियन अपने पास रख सकते थे। पे-पाल डॉट कॉम बबल से बच निकला था। ये सब मस्क की बिजनेस इंस्टिंक्ट और टेक्नोलोजी ट्रेंड में उनकी कुशलता का नतीजा था। 19/11 के हमले के बावजूद कंपनी ने एक सक्सेसफुल आईपीओ (IPO) बनाया। भले ही टेक्नोलोजी इंडस्ट्री डाउन हो गयी मगर पे-पाल एक विनर बनकर उभरा।

अध्याय 5 स्पेस में चूहा 

जून 2001 में एलन मस्क जब अपने तीसवे साल में थे, वे और उनकी पत्नी सिलिकोन वैली छोड़कर लोस एंजेल्स शिफ्ट हो गए। उनका बनाया पे-पाल एक सफल प्रोजेक्ट रहा था। अब वे अपने सपने स्पेस ट्रेवल और राकेट शिप्स पर ध्यान दे सकते थे, और इसके लिए लोस एंजेल्स से बढ़कर कोई और बढ़िया जगह नहीं थी क्योंकि वहां का मौसम एरोनोटिक्स के लिहाज़ से अच्छा था। मस्क ने अपने जैसे ही कुछ लोग ढूंढ लिए। उन्होंने मार्स सोसाइटी नाम का एक ग्रुप भी ज्वाइन कर लिया था जो मार्स पर जीवन की संभावना तलाश रहा था। ट्रांसलाइफ नाम से इस ग्रुप का एक प्रोजेक्ट भी था ये एक कैप्सूल के आकार का बनने वाला था जो अर्थ के चक्कर लागाये। और इसके क्र्यू मेम्बर चूहे बनने वाले थे। मस्क ने $500,000 मार्स सोसाइटी और इसके प्रोजेक्ट के लिए दिए। उन्होंने सुझाव रखा कि ट्रांसलाइफ मिशन को मार्स तक ही एक्सटेंड करना चाहिए। एक दिन मस्क नासा की वेबसाईट ब्राउस कर रहे थे। उन्हें गहरी निराशा हुई क्योंकि मार्स एक्सप्लोरेशन का कहीं पर भी कोई एक्जेट शेड्यूल या पुख्ता प्लान नहीं दिया गया था।

मस्क ने एरोस्पेस पर कई किताबे पढ़ी। उन्होंने राकेटशिप को प्लान करने के लिए टेलेंटेड इंजीनियर्स को अपने साथ काम पर रखा। उन्होंने कम बजट वाले रॉकेट्स का परफोर्मेंस स्टडी किया उस वक्त के रॉकेट्स सिर्फ रसियन बनाते थे। बोईंग और लॉक हील बहुत ज्यादा महंगे थे और बड़े से बड़े सेटेलाइट्स उठा सकते थे। मस्क इनसे कुछ सस्ते रॉकेट्स बनाना चाहते थे जो रिसर्च और कमर्शियल इस्तेमाल के लायक हो । जब ई-बे ने पे-पाल खरीदा था तो मस्क ने इस डील से सौ मिलियन डॉलर की कमाई की थी। उन्होंने ये पैसा मार्स के लिए राकेट शिप बनाने में लगा दिया। जून 2002 में स्पेस एक्सप्लोरेशन टेक्नोलोजी बनाई गई। इसमें मस्क के साथ मार्स सोसाइटी के मेम्बर और लोस एंजेल्स के वे लोग भी जुड़े जो स्पेस एन्थ्युपास्टिक थे।

स्पेस एक्स (Space X) को लेकर मस्क बहुत एक्साइटेड थे। हालांकि इस दौरान उनके परिवार में एक दुखद घटना घट गयी। उनकी पत्नी जस्टिन ने एक बेटे को जन्म दिया था जिसका नाम नेवेडा एलेक्जेंडर मस्क रखा गया था। लेकिन 10 दिन के अंदर ही वो बच्चा चल बसा।

हुआ यूँ कि एक रात एलन और जस्टिन ने बच्चे को बिस्तर पर सुलाया। नेवेडा गहरी नीद में पीठ के बल सो गया था। जब कुछ देर बाद उसके पेरेन्टस उसे देखने गए तो उन्होंने पाया कि उसकी सांसे नहीं चल रही थी। डॉक्टरर्स इसे सडन इन्फेंट डेथ सिंड्रोम (sudden infant death syndrome) कहते है।

जब तक पेरामेडिक्स बुलाये गए दिमागी रूप से बच्चे की मौत हो चुकी थी उसके दिमाग में ऑक्सीजन की सप्लाई नहीं पहुँच पाई थी। उसे तीन दिन तक लाइफ सपोर्ट पर रखा गया। बच्चा जब मरा तो जस्टिन ने उसे अपनी बांहों में पकड़ रखा था। वो बुरी तरह रो रही थी। मगर एलन मस्क ने कहा कि वो इस बारे में कुछ नहीं कहना चाहते है।

जस्टिन को लगता था कि ये एलन मस्क का डिफेन्स मेकेनिस्म का तरीका है। जिसे उन्होंने बचपन से ही सीख लिया था। उसने कहा कि एलन सदमे में नहीं रह सकते। उनकी फितरत ही आगे बढ़ने की है। और मुझे लगता है कि ये ही उनके सरवाइव करने का तरीका है"। मस्क ने अपना सारा ध्यान स्पेस एक्स के राकेट लौंच में लगा दिया।

अगले 5 सालो में जस्टिन जुड़वाँ बच्चो को जन्म दिया और उसके बाद ट्रिप्लेट्स को मस्क ने कहा" मै इस बात पर यकीन नहीं रखता कि मुझे बेहद दुखद घटनाओं के बारे में बात करनी चाहिए। क्योंकि ये किसी भी तरह हमारे भविष्य को नहीं सुधारती। अगर आपके और बच्चे और जिम्मेदारियां है तो बीती बातो पर दुखी होने से आपका और आपके अपनों का कोई भला नहीं होने वाला" ।




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The Power Of Subconscious Mind in Hindi – अवचेतन मन की शक्ति हिन्दी में


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The Power Of Your Subconscious
 Mind Book In Hindi
By -- Joseph Murphy 




About Book

आपके अंदर एक पूरा खज़ाना छुपा हुआ है, वो आपका सबकॉन्सियस माइंड है. हो सकता है आप अभी कमजोर, गरीब, अकेले और अनसक्सेस्स्फुल हों. ये बुक आपको अपना जीवन बदलने में मदद करेगी. द लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन कहता है कि आप जो सोचते हैं वही आपको मिलता है. अगर आप अपने मन में सफलता, खुशी, पैसा, प्यार और फिटनेस के विचार पैदा करते हैं, तो ये सब आपको मिल सकता है.


यह बुक किसे पढना चाहिये। 

जो लोग बिमारी से लड़ रहे हैं, गरीबी, डिप्रेशन और मायूस हो गए हैं, जो लोग अपनी लाइफ बदलना चाहते हैं.


आँथर के बारे में।

जोसेफ मर्फी आयरलैंड में एक कैथोलिक प्रीस्ट थे. लेकिन वो लॉस एंजेलिस चले गए, जहाँ वो डिवीने साइंस के मिनिस्टर बने. उन्होंने साइकोलॉजी में पीएचडी हासिल की और पावर ऑफ़ द माइंड के बारे में कई बुक्स लिखीं हैं.


The power of your Subconscious mind


ये किताब ख़ास आपके लिए लिखी गई है आपको ये जानकारी देने के लिए कि आपके सब-कोंशेस दिमाग में इतनी ताकत है जितना आप सोच भी नहीं सकते और इसकी जादुई ताकत से आपको वाकिफ कराना ही इस किताब का मकसद है ताकि आप इसका भरपूर फायदा उठा सके.


आपके अन्दर एक खज़ाना मौजूद है एक 75 साल की विधवा ने हमारे लेखक को ख़त लिखकर बताया कि वो दुबारा शादी करके घर बसाना चाहती है और खुश रहना चाहती है. उसने वही किया जैसा लेखक ने उसे करने को बोला था. वे औरत खुद को बार-बार याद दिलाती रहती थी कि वो एक खुशहाल शादीशुदा औरत है और अपने पति से बहुत प्यार करती है. और आखिर में एक दिन वो एक बड़े फार्मासिस्ट से मिली और उनसे प्यार कर बैठी. आज दोनों शादीशुदा है और खुश है. आपके अन्दर असल में एक पूरी सोने की खान है जो आपका सब कोंशेस माइंड है. बस अगर आप इसे कण्ट्रोल करके अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना सीख जाए तो क्या बात है !


आप जब किसी टेस्ट से पहले खुद को ये यकीन दिलाते रहते है कि आप फेल हो जायेंगे या फिर कोई चीज़ आपको नहीं मिलेगी तो दरअसल आप अपने ही दिमाग को ऐसा करने के लिए मजबूर कर रहे होते है. आप अपने दिमाग की सुपर पॉवर को गलत आइडिया दे रहे होते है कि आप ये नहीं कर सकते या वो नहीं कर सकते. मगर ऐसा कभी मत कीजिये कभी भी अपने दिमाग में नेगेटिव आईडीया मत आने दे बल्कि पूरे जोश के साथ दोहराते रहे, विश्वास रखे, और उम्मीद भी और फिर आप देख्नेगे कि आपके सब कोंशेस ही आपके सारे सवालो का जवाब बन जाएगा.


अध्याय 2: आपका दिमाग कैसे काम करता है।


एक बूड़ी औरत को यकीन हो चला था कि उसकी याददाश्त चली जाएगी मगर उसने अपने दिमाग को यही यकीन दिलाये रखा कि ऐसा कुछ भी नहीं होगा. बल्कि वे खुद को यकीन दिलाती रही कि उसकी याददाश्त दिन-ब-दिन बढती जा रही है. अब ये उसका मज़बूत विश्वास ही था कि सच में उसके साथ ऐसा ही हुआ. हमारे दिमाग का कोंशेस और सब कोंशेस हिस्सा एक दुसरे से अलग होने के बावजूद आपस में जुड़े हुए है. जो कुछ आप सोचते है वो अपने कोंशेस मांइड वाले लेवल से सोचते है और जो भी आप करते है छोटी से छोटी चीज़ वे आपके सब-कोंशेस लेवल को अफेक्ट करती है।


हालांकि ये समझना ज़रूरी है कि सब- कोंशेस और कोंशेस लेवल दोनों अलग-अलग नहीं है बल्कि एक ही दिमाग के दो अलग लेवल है. कोंशेस माइंड वो है जो सोच-विचार करता है और सब कोंशेस माइंड आपकी हर सोच पर विश्वास करके उसे अपना लेता है. जो कुछ भी आप सोचते है और करते है उस पर सब कोंशेस माइंड पूरी तरह यकीन करता है. उदाहरण के लिए हिप्नोसिस के पीछे सिर्फ एक वजह ये है कि आपका सब कोंशेस माइंड इस पर यकीन करता है और फिर आपसे जो कहा जाता है उसे आपका कोंशेस माइंड बिना किसी जिद के उसे मानने लगता है. फिर आप चाहे सही या गलत जो भी विचार रखते है उसे ये बेहिचक अपनाने लगता है. तो याद रखिये कि आप अपनी कश्ती के खुद ही मालिक है, सारा कंट्रोल आपके हाथो में है तो सोच समझ कर चुने अच्छा चुने और अपनी खुशियाँ चुने.


अध्याय 3: आपके सब-कोंशेस दिमाग के काम करने की जादुई तगात।

एक स्कॉच सर्जन, डॉक्टर जेम्स एस्टिले ने कुल 400 ओपरेशन किये. तब तक एनेस्तीथीसिया की खोज नहीं हुई थी जिस से वो अपने पेसेन्ट को बेहोश कर सके। तो उन्होंने आखिर ये किया कैसे ? अपने मरीजों को मेंटल एनेस्थीसिया देकर. वे उन्हें पूरी तरह यकीन दिला देते थे कि ओपरेशन में उन्हें किसी भी तरह का दर्द नहीं होगा और ना ही कोई इन्फेक्शन. उनके ओपरेशन सफल हुआ करते थे और उनका मोर्टलिटी रेट यानी पेसेन्ट को को मारने का रेट भी बहुत कम था सिर्फ 2 या 3% ही अपने मरीजो का ओपरेशन करने से पहले वे उनके सब-कोशेस माइंड को हिप्नोटिक करके उनके कानो में बोलते थे" तुम्हे कुछ नहीं होगा, तुम ठीक हो जाओगे तुम स्वस्थ हो"।


आपका सब-कोंशेस दिमाग आपका सब कुछ कण्ट्रोल करता है, आपके खून का बहाव, आपका digestion और आपके thoughts. एक बार अगर आप इसकी ताकत समझ ले तो इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर सकते है. जब आप नेगेटिव सोचते है तो वे आपकी डिसट्रकटिव इमोशन होती है जिसे अपने दिमाग से निकालना बेहद ज़रूरी हो जाता है. वर्ना आपकी बॉडी में उल्सर्स, हार्ट प्रोब्लेम्स, एंजाईटी या मेंटल इलनेस जैसे प्रोब्लेम्स होना शुरू हो जायेंगी. अपने दिमाग में उठने वाले हर ख्याल पर गौर करे क्योंकि वही फिर आपके एक्शन बनने लगते है क्योंकि जब भी आप सोचते है जो कुछ सोचते है उसे आपका सब-कोंशेस माइंड रीएक्शन देने लगता है. तो जब भी आप सोये उससे पहले मन में एक इरादा करे, एक टार्गेट चुने और खुद से ही कहे कि आप उसे पूरा करना चाहते है. आप कुछ भी सोच सकते है. अपनी अच्छी सेहत, पैसा या फिर लोगो के साथ अपने रिश्ते के बारे में भी. पोज़िटिव विचारों को आने दे अपने दिमाग को प्रोग्राम करते रहे और फिर इसके Miracles क्या होंगे ये आप सोच भी नहीं सकते है।


अध्याय 4 और 5 मेंटल हीलिंग के पुराने और नये तरीके।


1910 का एक मशहूर किस्सा है. एक आदमी को टंग पैरालिसिस हुआ यानि उसकी जीभ को लकवा मार गया. उन दिनों इसका कोई भी इलाज नही था. वो डॉक्टर के पास गया तो उसने उसकी जबान में एक थर्मामीटर रखकर कहा कि ये एक बिलकुल नया इंस्ट्रूमेंट है जिससे उसकी जीभ ठीक हो जायेगी. और सच में कुछ ही मिनटों बाद उसकी जीभ ठीक हो गयी थी और वो उसे हिला-डुला पा रहा था. बहुत से एक्सपेरिमेंट में हिप्नोसिस किये गए लोगो को आसानी से ये यकीन करा दिया जाता है कि उन्हें कोई ख़ास बिमारी है और फिर वे लोग सच में उसी बीमारी के सिम्पटम्स दिखाने लगते है. क्योंकि उनका सब-कोंशेस दिमाग कही हुई बातो पर यकीन कर लेता है इसमें इतनी ताकत होती है कि वे उसी तरीके से एक्ट भी करने लगता है. ये अपोजिट भी काम करता है जब किसी मरीज़ के सब-कोंशेस दिमाग को यकीन दिलाया जाता है कि वो ठीक हो रहा है. तब ऐसा लगता है कि वो कभी बीमारी का शिकार था ही नहीं. आपके शरीर पर कोई असर तब तक नहीं होगा जब तक आपका सब-कोंशेस माइंड ऐसा करने को ना बोले हमेशा अपने सब - कोंशेस दिमाग की ताकत को याद रखे. ना जाने आपके जीवन मे इसकी बदौलत कब क्या चमत्कार हो जाए इसलिए कोई भी मौका मिस न करे।


आज हम सब अपने सब कोंशेस माइंड की पॉवर से वाकिफ है मगर हममें से बहुत से लोग इसका सही इस्तेमाल करना नहीं जानते है. उन्हें ये पता नहीं होता कि इसकी ताकत से कैसे अपनी जिंदगी को बदला जा सकता है. और ऐसा करने के लिए सबसे पहले तो ये जाने कि आपको क्या चीज़ हील करती है और फिर उसे अपने सब कोशेस माइंड को गाइड करने में इस्तेमाल करे. दिमाग में कोई एक प्लान बनाये, उसे काम करता हुआ देखे, फिर बुरे या नेगेटिव ख्याल ना आने दे क्योंकि ऐसा करना बेवकूफी होगी. और आखिरी बात ये कि प्रे करे और अपनी दुवाओ पर यकीन रखे।


अध्याय 6: मेंटल हीलिंग की प्रेक्टिकल टेक्निक :


जब गोल्डन गेट ब्रिज बना तो इंजीनियरिंग कंपनी के पास एक प्लान था. इस प्लान में पहली बार (stresses and strains) स्ट्रेस और स्ट्रेंस की बात कही गयी थी जो ब्रिज पर पड़ सकता था. तब उन्होंने एक मजबूती पूरी तरह से आईडियल ब्रिज के बारे में सोचा और उसे प्रेक्टिकली टेस्ट किया गया. ये सारे स्टेप्स आर्डर में किये गए और कोई भी स्टेप पहले या बाद में नहीं अपनाया गया वर्ना ब्रिज पूरी तरह नाकामयाब रहता।


जिस तरह हमारी दुआए सुनी जाती है वे भी कुछ इसी तरह है. जो हमें मिलता है ना पहले ना बाद में बिलकुल सही वक्त पर ही मिलता है. कुछ चीज़े पहले होनी होती है तो कुछ बाद में. इनमे से सबसे पहली टेक्निक है पास ओवर टेक्निक. सिंपल तरीके से अपने विचारो और इच्छाओ को अपने सब कोंशेस माइंड में रखते जाए ताकि आप किसी भी तरह की सिकनेस दूर कर पाए. जैसे कि कोई छोटी सी लड़की जिसका गला ख़राब है। और बुरी तरह खास रही है वो अगर खुद से मज़बूत इरादे से कहे कि मेरी बीमारी जा रही है, ये दूर हो रही है" तो घंटे भर बाद ही सच में वो ठीक महसूस करने लगेगी.


दूसरी सिंपल टेक्निक है विजुएलाइजेशन टेक्निक. आप विजुएलाइज करके, अपने दिमाग में तस्वीर रच कर ऐसा कर सकते है. जो आप चाहते है उसे हरदम ख्यालो में रखे. आप अपने फोन या लेपटोप पर उसकी वालपेपर लगा कर भी ऐसा कर सकते है या फिर एक ड्रीम बोर्ड भी बना सकते है. या अपने सपने की फोटो कार्डबोर्ड में लगाकर रखे और रोज़ उसे देखे. आखिर में आती है स्लीपिंग टेक्निक जिसमे जब आप सो रहे होते है तो आपकी बॉडी का एफर्ट और स्ट्रेस कम होता है। उस वक्त आपका सब-कोंशेस एक्टिव हो जाता है aur आपके विचार और भी बेहतर ढंग से एब्ज़ोर्ब कर लेता है जिससे आपके दिमाग और शरीर को अपनी चाही गयी चीज़ हासिल करने में मदद मिलती है. इसलिए ऑटो-सजेशन और विजुएलाइज के लिए सोने से बिलकुल पहले का टाइम सबसे बढ़िया रहता है.


अध्याय 7: सब-कोंशेस दिमाग की आदत लाइफवार्ड है।


लेखक (Robert Louis Stevenson) रोबर्ट लुईस स्टीवनसन हर रात सोने से पहले कुछ करते थे. वे सोने से पहले अपने सब कोंशेस माइंड को उन सारी कहानियों से भर देते थे जो उन्हें लिखनी होती थी. और इस तरह वे कहते है कि उनके सब-कोंशेस माइंड की डीप पॉवर उन्हें एक बढ़िया कहानी पूरी तरह तैयार करके देती है जिसे बाद में वे लिख लेते थे. उनकी इस बात से पता चलता है कि हमारी सब-कोंशेस ताकत कितनी जबर्दस्त होती है. ज़्यादातर बच्चे हेल्दी और स्टोंग पैदा होते है, ये बहुत आम बात है मगर बीमार पड़ना और कमज़ोर होना नार्मल नहीं है क्योंकि ये लाइफ स्ट्रीम के खिलाफ है. सेल्फ- प्रीज़रवेशन हम इंसानों की सबसे स्ट्रोंग इंस्टिक्ट होती है.


फ्रेड्ररेक एलियस एंड्रयूज एक ऐसा लड़का था जिसे पोटस की बिमारी थी जिसे स्पाइन का ट्यूबरक्लूसीस भी कहा जाता है. अपने बीमारी के दौरान वो प्राथना किया करता था कि वो ठीक हो जाएगा और उसकी प्रेयर्स काम आई और वो सच में ठीक होकर एक तन्दुरुस्त इंसान बन गया. सोने से पहले वो उसी स्लीपिंग टेक्निक मेथड का इस्तेमाल किया करता था जिसके बारे में आपको पहले बताया गया था और ये तरीका काम आया. हर ग्यारह महीने में आपका शरीर खुद को रीन्यू करता है. अपने नेगेटिव विचारों को पोजिटिव में बदलिए क्योंकि यही स्ट्रीम ऑफ़ लाइफ है कि हम हेल्दी रहे, स्ट्रोंग बने और बिना किसी नेगेटिविटी, डर, एन्जाईटी और जलन की भावना से दूर रहे क्योंकि ये आपको बहुत सी बीमारियों का शिकार बनाती है तो इन सबसे बचने के लिए हमेशा पोजिटिव सोचे.


अध्याय 8: जो रिजल्ट आप चाहते है उन्हें कैसे पाया जाए।


एक बार एक मकान मालिक था जो फरनेस रीपेयरमेन से इस बात पर लड़ रहा था क्योंकि वो एक बायलर को ठीक करने के दो सौ डॉलर मांग रहा था. मकान मालिक ने कहा कि ये बहुत ज्यादा रकम है इस पर रीपेयरमेन ने जवाब दिया कि वो मिसिंग पीस के सिर्फ 5 डॉलर ही मांग रहा है बाकी के 195 डॉलर तो वो अपनी इस काम की नॉलेज होने की फीस ले रहा है. ठीक इसी तरह आपका सब-कोंशेस माइंड भी बहुत होशियार है जिसमे पास आपके शरीर, मन और आत्मा की हर तकलीफ और दुःख दर्द करने के अनेक तरीके है. हमारे फेल होने का एक ज़रूरी वजह होती है कि हमारे अन्दर मोटिवेशन और कांफिडेंस की कमी होती है. क्योंकि जब लोग ध्यान लगाकर कोई प्राथर्ना कर रहे होते है तो कई बार उन्हें उस पर उतना गहरा यकीन नहीं होता जितना कि होना चाहिए. उनके मन में नेगेटिव विचार चलते रहते है और यही वजह है उन्हें अपनी प्राथर्ना का जवाब नहीं मिलता. इसलिए अपने कोंशेस और सब-कोंशेस के बीच कोंफ्लिक्ट दूर करने के लिए सोने से पहले स्लीपिंग टेक्निक का इस्तेमाल करे. अपने सपनों को पूरा होता हुआ देखे बार-बार.


अध्याय 9 और 10 अपने सब कोंशेस की पॉवर को पैसे और अपने अमीर होने के लिए कैसे इस्तेमाल करे:


लेखक का एक दोस्त सालाना 75,000$ कमाता है यानी लगभग 55 लाख रुपये. वो एक बार दुनिया घूमने के लिए नौ महीने की लम्बी छुट्टी लेकर एक क्रूज़ पर गया. उसने खूब पैसे उड़ाए, मज़े किये और जब वो वापस काम पर लौटा तो उसने कुछ महसूस किया कि उनके कई साथी जो उनसे बिजनेस के बारे मे ज्यादा जानते थे, और ईवन बेहतर काम कर सकते थे। लेकिन वो सारे उनसे छोटे पोजिशन में ही रह गये थे और उनसे कम सेलरी लेते थे। ऐसा क्यो था क्योकि उन सब को ना तो अपने सब कोंशेस की पॉवर के बारे में ना तो कोई नॉलेज थी और ना ही कोई इंटरेस्ट और इसलिए उनके कोई बड़े सपने भी नहीं थे. ऐसे लोग एक तरह से क्रियेटिविटी से भी कोसो दूर होते है.


सच तो ये है कि कोई भी रातो-रात अमीर नहीं बनता सिर्फ सोचने भर से. इसके लिए आपको सब-कोंशेस माइंड में कुछ नए आइडिया सोचने होंगे, इसे मोटिवेट करना पड़ेगा. तभी तो ये आपको अमीर बनने में मदद कर पायेगा. इसे मोटिवेशन देते रहे कि आप अमीर है, आप प्रॉफिट कमा रहे है और आपका सब कोंशेस जो नए विचार आपको देगा उन पर काम करना शुरू कर दे. जो आप कहे उसे पर पूरी तरह यकीन करे क्योंकि आपका सब कोंस तभी उन आईडिया को एक्सेप्ट करेगा जब आप अपने कोंशेस माइंड में भी उन्हें एक्सेप्ट करेंगे.


अगर आपको ज्यादा पैसे कमाने की चाहत नहीं है तो फेल होने की राह में यही पहला कदम होगा | सबसे पहले तो ये विचार दिलो-दिमाग से निकाल फेंके कि पैसा सब बुराई की जड़ है. क्योंकि जब आप इसे बुराई मानकर नफरत ही करेंगे तो भला इसे कैसे अपनी तरफ अटरेक्ट कर सकते है. पैसे से नफरत करेंगे तो आपके हाथ कुछ नहीं लगने वाला इसके बदले पैसे को अपना सबसे बड़ा दोस्त समझकर इसे प्यार करे. अपने अमीर होने पर यकीन रखे. जो लोग पैसे की बुराई करते है अक्सर वही किसी ना किसी फिनेंशियल परेशानी से गुज़र रहे होते है. जो ऐसा सोचता है उसके दोस्त जब उससे ज्यादा कमाते है और आगे निकल चुके होते है तो ऐसे लोग जलभुन कर ख़ाक हो जाते है, उनका दिमाग नेगेटिव विचारों से भर जाता है. जिस चीज़ के लिए वो प्रे कर रहे होते है अब उसी को कोसते रहते है. पैसे की ताकत बड़ी है मगर इसे भगवान् ना बनाये. पैसा तो बस सफल होने की एक निशानी है असली खजाना तो आपके दिमाग में छुपा है जो आपके विचार है इसलिए पैसे की कभी भी बुराई ना करे.


अध्याय 11 और 12 : आपका सब- कोंशेस माइंड आपकी सफलता का साथी है और देखिये किस तरह साइंटिस्ट इसका इस्तेमाल करते है :


सफल होने के लिए तीन खास स्टेप्स है :

स्टेप 1: अपने पसंद की चीज़े करे जिनसे आपको ख़ुशी मिलती हो, अगर आपको पता नहीं कि वो क्या है तो उसे जानने के लिए पूरे दिल से प्राथर्ना करे.

स्टेप 2: किसी एक ख़ास चीज़ में महारत हासिल करे. जो आपको पसंद हो उसके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी रखे. जैसे कि, मान लो आपको डेंटिस्ट का काम पसंद है तो इसकी किसी खास ब्रांच में स्पेशलिस्ट बन जाए जैसे एनडोडॉटिक्स या ओरल सर्जरी या किसी और चीज़ में.

स्टेप 3: जो भी आपको पंसद हो वो सिर्फ आप तक ना सिमित रहे, सिर्फ आप ही नहीं बल्कि बाकी लोगो के भी काम आये. अपनी पसंद से दुसरो का भी भला करे तो बेहतर होगा.

इन सब स्टेप्स को अपनाते वक्त अपने सब कोंशेस की पॉवर को कभी ना भूले. बहुत से साइंटिस्ट इस बात को जानते और मानते थे. एडिसन, मार्कोनी, आइनस्टाइन और बाकी बहुत से साइंटिस्ट अपने सब कोंशेस की आवाज सुनते थे और इसका उन्हें बहुत फायदा भी हुआ. बेहद कामयाब इलेक्ट्रिकल साइंटिस्ट टेस्ला को जब भी कोई आईडिया आता था तो वो अपने ख्यालो में ही उसका इन्वेंशन कर लेते थे. वो जानते थे कि अपने सब कोंशेस का इस्तेमाल करके वो जो चाहे वो बना सकते है. उनका दिमाग उस पॉइंट पर पहुँच चूका था कि किसी भी डीजायन के इन्वेंशन होने से पहले ही उनके दिमाग को उस डीजायन का डिफेक्ट भी नज़र आ जाता था. इसलिए इन्वेंट करने से पहले ही वे डीजायन इस तरह बनाते थे कि उसमें कोई डिफेक्ट ना रहे जिससे उनका पैसा और वक्त बर्बाद होने से बच जाता था.


अध्याय 13, 14 और 15: आपका सब-कोंशेस और नींद, मेरिटल प्रोब्लेम्स और खुशियाँ:


एक ऐसी टेक्निक है जिसे मै पर्सनली तब अपनाता हूँ जब अगले दिन कुझे कोई काम होता है और मुझे मन में ये डर रहता है कि मै टाइम पर उठ नहीं पाऊंगा. तो मै दिमाग में सोचता रहता हूँ और खुद को यकीन दिलाता हूँ कि सुबह मै टाइम पर उठ जाऊँगा. मै तब तक इस बारे में सोचता रहता हूँ जब तक मेरे सब - कोंशेस माइंड ये बात पूरी तरह बैठ नहीं जाती. और फिर दुसरे दिन मै एकदम टाइम पर ही उठता हूँ. और ये टेक्निक आजतक फेल नहीं हुई, एक बार भी नहीं. ये बहुत सिंपल टेक्निक है इसमें आपको कोई अलार्म भी नहीं चाहिए हालांकि मै फिर भी अलार्म सेट करके रखता हूँ मगर हमेशा अलार्म बजने से पहले ही मै उठ जाता हूँ जिससे पता चलता है कि सब-कोंशेस माइंड में कितनी पॉवर है.


गाइडेंस का मतलब हमेशा किसी चीज़ से या पैसे की मदद से नहीं होता और ज़रूरी नहीं कि जब आप जागे हुए हो तभी आपको गाइडेंस मिल सकती है, कई बार आपके सपने भी आपको गाइडेंस देते है. अपने सब-कोंशेस की पॉवर को कभी अनदेखा ना करे. इससे ना सिर्फ आपकी हेल्थ पर बुरा असर पड़ सकता है बल्कि आपकी शादीशुदा जिंदगी पर भी किसी के साथ जिंदगी भर का सफ़र निभाने के लिए आपका रिश्ता स्प्रिचुअल होना भी ज़रूरी है. जब आप किसी से मुहब्बत किये बगैर सिर्फ पैसे, पोजीशन या अपने ईगो के लिए शादी करते है तो ऐसा रिश्ता कभी सच्चा नहीं होता. ऐसे रिश्ते लम्बे समय तक नहीं टिक पाते है. शादी का बंधन किसी भी चीज़ से ज्यादा स्प्रिचुअल होना चाहिए जहाँ दोनों पार्टनर के दिल एक साथ धडकते हो, जहाँ वे एक होकर जिंदगी के सफ़र में कदम रख सके.


आजकल लोगो का मानना है कि शादी हर प्रॉब्लम का जवाब है. लेकिन असल में ऐसा नहीं है. किसी को अपनाने से पहले आपको इसके लिए पूरी तरह तैयार होना पड़ेगा. अगर आप खुश नहीं है तो अपने पार्टनर को कैसे खुश रख पायेंगे. अपने पार्टनर से ये उम्मीद मत कीजिये कि वे आपको हर ख़ुशी देगा. खुद को खुश रखना आपकी जिम्मेदारी है ना कि किसी और की. अपने सब कोशेस को यकीन दिलाये कि आप अधूरे नहीं है, अपने आप में पूरे है. तभी आप किसी और से प्यार कर पायेंगे और शादी की जिम्मेदारी उठा पाएंगे.


अपनी शादीशुदा जिंदगी में गलतियों को दोहराना एक बहुत बड़ी निशानी है कि आपके मन में नेगेटिव विचार भरे हुए है. आपका सब-कोंशेस माइंड भी इन्ही नेगेटिव विचारों को अपना रहा है. अगर गलती हो गयी है तो उसे स्वीकार करके आगे बड जाए. अपने साथी और अपनी शादी में यकीन रखे ताकि आपका सब-कोंशेस भी यही माने हमेशा एक बात याद रखे कि शादी शुदा जिंदगी में परेशानियां आना बेहद आम बात है और इसके लिए एक्सपर्ट की सलाह लेने में कोई बुराई नहीं है. जब आपको दांत में दर्द होता है तो क्या आप इंजीनियर के पास जाते है ? नहीं ना. तो आपकी शादी भी आपके दांत के दर्द से कम ज़रूरी मसला नहीं है. जब भी कोई परेशानी आये तो अपने रिश्ते को बचाने के लिए एक्सपर्ट की राय ज़रूर ले. अपने पार्टनर और एक्सपर्ट के अलावा किसी तीसरे के साथ कभी भी अपनी मेरिटल पॉब्लेम डिस्कस ना करे.


आपकी खुशियाँ सिर्फ आपके हाथ में है. अगर आप यही सोचते रहेंगे कि आपकी शादी टूटने की कगार पर है तो जानते है क्या होगा? एक दिन ये सच में टूट सकता है. क्योंकि आप ऐसा सोचते है तो आपके सब- कोंस को भी यही यकीन होने लगता है. जब आप खुशियों की जगह नेगेटिव सोचंगे तो खुशियाँ कहाँ से पायेंगे ? अब सवाल है कि खुशियाँ कैसे चुनी जाये इसके लिए आपको रोज़ सुबह उठकर खुद से ही दोहराना है कि आपकी जिंदगी उपरवाले की दी हुई है और इसका कण्ट्रोल उसके हाथ में है और वो जो आपके लिय चुनेगा सबसे बढ़िया होगा. जो कुछ भी होगा एकदम बढ़िया होगा और आप हमेशा खुश रहेंगे।

अध्याय 16, 17, 18 और 19: आपका सब-कोंशेस माइंड और इंसानी रिश्ते, माफ़ करना, मेंटल ब्लोक्स और डर:

Sigmund Freud (सिगमंड फ्राईड), psychoanalysis (साइकोऐनालिसिस) के ऑसट्रेयन फाउन्डर कहते है कि जब किसी की अंदर प्यार नहीं होता है तो उसकी आत्मा धीरे-धीरे मर जाती है. यही बात गुडविल, रेस्पेक्ट और अंडरस्टेंडिंग के साथ भी है। क्योंकि जब आप दिल में नफरत पालते है तो अपनी आत्मा और दिमाग को किसी कैदी की तरह हमेशा के लिए बाँध लेते है.

जितना हो सके सबका भला सोचिये और कोशिश करे कि किसी को भी नुकसान ना पहुंचे. नफरत करने वाला इंसान का हाल वही है जो ज़हर पीता है और सोचता है कि उसे कुछ नहीं होगा. ये पागलपन है क्यों है ना ? तो आप क्यों दुसरो को धोखा देते हो, हर्ट करते हो, उन्हें दुःख देते हो जब आपको पता है कि ऐसा करने से आपके दिमाग में भी ज़हर भर जायेगा, आपका खुद का नुक्सान होगा. लोगो को रेस्पेक्ट दो और उनसे हमेशा अच्छे से पेश आओ जैसा आप खुद के लिए चाहते हो वैसा व्यवहार दुसरो से करो. आप दुसरो के बारे में क्या सोचते है ये सिर्फ आपके हाथ में है, औरो के नहीं. जब आपको कोई तंग करने की कोशिश करता है तो ये आपके हाथ में है कि आप क्या रीएक्शन देंगे, दुसरो की हरकतों से आप क्या महसूस करते है ये भी सिर्फ आपके हाथ में है.

अब चाहे आप उस बात से चिढ कर पूरा दिन खराब कर ले या फिर उनकी बातो को इग्नोर करना सीख जाए. उन्हें माफ़ करना सीख जाए. लोगो को माफ़ करना दरअसल दिमाग के लिए नेगेटिव विचारों के खिलाफ एक एंटी-डॉट की तरह काम करता है. जब आप लोगो को माफ़ करते है तो आपकी आत्मा एक शान्ति और सुकून से भर जाती है. और एक तरह से लोगो को माफ़ करके आप लाइफ को पेबैक भी करते है क्योंकि जिंदगी हमेशा आपको मौके देती है. जब कभी गलती से आपकी ऊँगली कट जाती है या पैर पर चोट लग जाती है तो आपका सब-कोशेस भी कुछ इसी तरह आपको माफ़ करता है, उस चोट को हील करके.

एक आदमी था जो दिन रात इतनी मेहनत करता था कि एक दिन उसे हार्ट प्रॉब्लम हो गयी उस आदमी ने कभी मुश्किल से ही अपने बच्चो के साथ वक्त बिताया था. हमारे लेखक ने उससे बात की. उसने उस आदमी को समझाया कि उसके ऐसा करने की वजह यही है कि उसे अपने बच्चो को वक्त ना देने का दुःख अंदर ही अंदर खाए जा रहा था और दिन रात कड़ी मेहनत करके वो एक तरह से खुद को सजा दे रहा था. उसे खुद को माफ़ करना सीखन होगा तभी वो खुश रह पायेगा.

हम इंसान आदत से लाचार होते है. बुरी आदत और अच्छी आदत के बीच सिर्फ एक चुनाव का फर्क होता है. आप क्या चुनते है ये आपकी मर्जी है चाहे तो आप बुरी आदत अपनाए या अच्छी सब आपके हाथ में है. बुरी आदत को दूर करने के लिए उसे इग्नोर ना करे. एडमिट करे कि वो आपकी बुरी आदत है और उसे दूर करना है. बहुत से शराबी जिंदगी भर शराब नहीं छोड़ पाते क्योंकि वे मानते ही नहीं कि वे शराबी है. उन्हें शर्म आती है ये मानने में, पछतावा होता है और उनके ईगो को ठेस पहुँचती है और नतीजा ये कि वे कभी भी इससे छुटकारा नहीं पा सकते.

कोई भी आदत अपनाने के लिए पहले खुद को तैयार करना होगा. जब आप इस पॉइंट पर आ जाये कि आपको अपनी कोई बुरी आदत छोडनी ही छोडनी है तो खुद की पीठ थपथपाये क्योंकि आपने आधा किला फतह कर लिया है. अपने सब कोंशेस को कंट्रोल करने की राह में पहला रोड़ा है आपका डर. इसे दूर करने के लिए आप वही कीजिये जिसे करने से आपको सबसे ज्यादा डर लगता है. एक बार एक लेडी एक ऑडीशन देने पहुंची. हालांकि अपने स्टेज फोबिया की वजह से वो तीन बार पहले फेल हो चुकी थी. उसकी आवाज़ में जादू था मगर उसके नेगेटिव ख्याल उसके सब-कोंशेस पर जमे हुए थे और इसीलिए हर बार स्टेज पर जाने के ख्याल से ही वो डर जाती थी.

उसने इसका जो इलाज निकाला वो बेमिशाल था. वो खुद को दिन में तीन बार कमरे में बंद कर लेती थी. एक चेयर पर बैठकर रीलेक्स होकर वो अपनी आँखे बंद कर लेती थी. फिर वो खुद में दोहराया करती कि उसके पास गज़ब की आवाज़ है जिसकी बदौलत वो किसी का भी दिल जीत सकती है. वो खुद से दस-दस बार कहती थी कि उसे स्टेज पर डर लगता. जिस दिन उसका ऑडीशन था उसके एक रात सोने से पहले उसने ये टेक्निक दोहराई और कमाल की बात है कि ये काम कर गई. वो ऑडीशन देने के लिए स्टेज पर चढ़ी, बहुत ही ख़ूबसूरती से गाया और लोगो पर अपनी आवाज़ का जादू चला दिया !


अध्याय 20 : जवाँ-दिल कैसे बने रहे हमेशा


लेखक के एक पडोसी को रिटायमेंट इसलिए लेनी पड़ी क्योंकि वे 65 साल के हो गए थे. उस आदमी ने लेखक को कहा कि उसके लिए रिटायर्मेंट किंडरगारटेन से फर्स्ट ग्रेड में जाने जैसा है. उसके लिए ये जिंदगी और विजडम की राह में एक और कदम रखने जैसा है. उसका सोचना कितना सही है. हमे उम्र को इसी तरह लेना चाहिए. उम्र का मतलब सिर्फ सालो का पड़ाव तय करना नहीं है। बल्कि अनुभवों और समझदारी के अलग-अलग पडावो से गुजरना है. और यही मरते दम तक चलाना चाहिए कि हम जिंदगी का भरपूर फायदा उठाते रहे. 65 से 95 साल की उम्र के बहुत से साइंटिस्ट ने यही किया है, उन्होंने जिंदगी को भरपूर जिया, अनुभव लिए और बहुत कुछ सीखा.


जिन्हें मरने से, बूडा होने से डर लगता है उनके अक्सर ऑर्गन फेल हो जाते है वे उम्र के नेचुरल प्रोसेस को समझना नहीं चाहते इसलिए मरने से डरते है. जब डर उनपर हावी हो जाता है तो उनके सब- कोंशेस में नेगेटिव विचार जमा होने लगते है जो अपने साथ बहुत सी बिमारियां लाते है. दोस्तो ये बुक Joseph Murphy ने लिखी है और इसे पबलिश किया है अमेजिंग रीडस ने और इसका साला क्रेडिट उन्ही को जाता है। हमारा इस समरी को बनाने का मकसद सिर्फ इतना ही है कि हम लिसनर को मोटीवेट कर सके ये बुक खरीदने के लिये ।


फाइनली अगर आप इस समरी के एन्ड तक पहुंच गए है तो Congratulation बहुत ही कम लोग होते है जो नॉलेज के ऊपर टाइम इन्वेस्ट करते है वार्ना आप कही और भी तो टाइम वेस्ट कर सकते थे.



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