thumbnail

Adolf Hitler Biography Hindi (एडोल्फ हिटलर जीवन परिचय हिन्दी में)


Buy Now

 

Adolf Hitler Biography Hindi (एडोल्फ हिटलर जीवन परिचय हिन्दी में)

हिटलर का नाम सुनते है एक ऐसे आदमी की याद आती है जिसकी सनक और जाति प्रेम ने ना जाने कितने मासूमो की जान ली,कितनो को अपने घर से बेघर होकर भागना पड़ा. वो एक ऐसा तानाशाह था जिसने दुनिया में सिर्फ नफरत का जहर फैलाया, जिसने इंसानों को उनकी जाति और कल्चर के बेस पर बाँटने की कोशिश की. जेविश कम्यूनिटी का सबसे बड़ा दुश्मन जिसके वहशीपन का सबूत है नाज़ी कॉस्ट्रेशन कैम्पस जहाँ हैवानियत की सारी हदे पार की गयी थी. मॉडर्न टाइम के ऐसे खूंखार लीडर की लाइफ स्टोरी पढकर हमे यही सीखने को मिलता है दुनिया नफरत से नहीं बल्कि इंसानियत और प्यार से चलती है.



ये बुक किस किसको पढनी चाहिए?


हर वो इन्सान जो ग्रेट डिक्टेटर अडोल्फ हिटलर की लाइफ के बारे में जानना चाहता है उसे ये बुक पढके देखनी चाहिए. एडोल्फ हिटलर दुनिया का महान डिक्टेटर था. इसमें कोई शक नहीं कि वो एक इन्फ्लुएंशल पर्सनेलिटी का मालिक था जिसने जेर्मनी के लोगो को आर्यन रेस का बताकर उन्हें अपने सुपीरियर होने का एहसास दिलाया था. लेकिन हिटलर की सनक और जिद ने लाखो लोगो का कत्लेआम किया, होलोकास्ट बनाये और टॉर्चर करने के लिए उन्हें नाज़ी कैम्प में डाल दिया था.


इस बुक के ऑथर कौन है?


इस बुक के ऑधर खुद हिटलर है. वो एक जर्मन पोलिटिशियन और नाजी लीडर था. वो 20 अप्रैल 1889 ऑस्टिया में पैदा हुआ था जो तब ऑस्ट्रिया हंगरी का पार्ट था. उसकी ऑटो बायोग्राफी मियन कम्फ 1925 में पब्लिश हुई थी. इस बुक के आलावा हिटलर की मौत के बाद उसकी कई सारी स्पीचेस भी छपी. वो एक बड़ा ही इन्फ्लुयेंश्ल स्पीकर था जो लाखो लोगो को इंस्पायर करके अपनी बात मानने पर मजबूर कर देता था. 30 अप्रैल, 1945 में नाजियो की हार के बाद उसने खुद को अपनी ही रिवोल्वर से गोली मारकर आत्महत्या कर ली थी।


इंट्रोडक्शन (Introduction)


अडोल्फ़ हिटलर कौन है? आपने शायद हिटलर के बारे में बुक्स या इंटरनेट पर पढ़ा हो. गैस चैम्बर्स, कॉन्स्ट्रेशन कैम्पस और होलोकोस्ट की स्टोरी तो हम सब जानते है. माइन कैप्फ़ में आप जानेंगे कि हिटलर कौन था, कैसा था और क्या उसकी सोच थी. ये बुक आपको बताएगी कि हिटलर का बचपन कैसे गुज़रा, उसके सपने क्या थे


और उसका पैसन क्या था. आप जानेंगे वो कौन से थोट्स और आईडियाज थे जिन्होंने हिटलर को वर्ल्ड का मोस्ट पॉवरफुल इन्सान बनाया. कैसे उसने हज़ारो सोल्जेर्स को इन्फ्लुएंश करके दुनिया में दहशत फैला दी थी. कुछ लोग मानते है कि वो एक पागल और संनकी इन्सान था, तो कुछ बोलते थे कि वो एक जीनियस और करिश्मेटिक इन्सान था. लेकिन इस बुक को पढकर आपको खुद समझ आ जायेगा कि वो असल में कैसा इन्सान था क्योंकि ये बुक हिटलर ने खुद लिखी है. ये एक ऐसे इन्सान की स्टोरी है जिसने दुनिया के लाखो लोगो की लाइफ चेंज कर दी थी.


(मेरे पेरेंट्स के घर में)

इन द हाउस ऑफ़ माई पेरेंट्स  In the House of My Parents


मै बरनी (Branau) टाउन में पैदा हुआ था जो जर्मनी और ऑस्ट्रिया के बॉर्डर पर है. इसे मै प्योर लक समझता हूँ. मुझे लगता है कि ये मेरी जेनरेशन की डयूटी है कि हम इन दोनो जर्मन स्टेट्स को किसी भी हाल में एक साथ मिला दे. ऑस्ट्रिया को जेर्मनी में आना ही होगा क्योंकि हमारा खून एक है. और जेर्मनी को अपने बेटी को एक साथ रखना ही होगा. मेरे पेरेंट्स वैसे तो बवारैयन (Bavarian) है मगर असल में वो ऑस्ट्रियन है. मेरे फादर एक डिवोटेड सिविल सर्वेट है, वो एक कस्टम ऑफिशियल है. और मेरी मदर एक हाउसवाइफ. मुझे ब्रानाऊ की ज्यादा बाते याद नहीं है क्योंकि मेरे पैदा होने के कुछ टाइम बाद ही मेरे फादर पस्सु (Passau ) ट्रांसफर हो गया था जोकि जेर्मनी में आता था. मेरे ग्रैंड फादर गरीब फार्मर थे, यही वजह थी कि मेरे फादर शुरू से ही खुद पे डिपेंडेट रहे. वो काफी हार्ड वर्किंग भी थे और अपने बुढ़ापे तक हमेशा काम करते रहे. 13 की उम्र में वो घर से भागकर विएना चले गए थे. जहाँ उन्होंने पैसे कमाने के कई तरीके सीखे. फिर वो शहर चले आए. 17 साल की उम्र में उन्होंने सिविल सर्विस एक्जाम् पास किया. उनका गवर्नमेंट जॉब करने का सपना पूरा हुआ.


बचपन में उन्होंने कसम खाई थी कि वो तब तक अपने होमटाउन नहीं लौटेंगे जब तक कि वो कुछ बन ना जाए. और उन्होंने ऐसा ही किया. 56 की उम्र में जब वो रिटायर हुए तो उन्हें घर पे खाली बैठना पंसद नहीं आता था. तो उन्होंने एक फ़ार्म खरीदा और उसकी देखभाल करने लगे. इसी फ़ार्म में मेरा बचपन गुज़रा था. मै बड़ा शरारती था, सारा दिन यहाँ से वहां भागता रहता था. मेरी मां सोचती थी कि मै बाहर कम और घर पे ज्यादा रहूँ. मेरी पब्लिक स्पीकिंग स्किल शुरू से अच्छी थी. मेरी अपने क्लासमेट्स से आर्ग्युमेंट होती तो मै ही जीतता था. मेरे फादर की अपनी एक लाइब्रेरी थी जहाँ पर मैंने 1870-1871 की फ्रांको जर्मन वार पर कई सारी बुक्स पढ़ी ये बुक्स मेरी फेवरेट थी. इनके अंदर की डिटेल्ड इलस्ट्रेशन पढना मुझे बड़ा पसंद था और तभी से मुझे मिल्ट्री और बॉर से रिलेटेड हर चीज़ अच्छी लगने लगी थी. मेरे फादर चाहते थे कि मै उनके जैसे एक सिविल सर्वेंट बनू.


मुझे बड़े होकर कौन से हाई स्कूल जाना है इस बारे में हमारी खूब बहस होती थी. लेकिन वो अपने डिसीजन पर अड़े थे. उन्हें लगता था मैं वही करूँ जो उन्होंने अपनी लाइफ में किया. जितना वो मुझे सिविल सर्विस जॉब के लिए पुश करते उतना ही मै उस डायरेक्शन से दूर भागता. एक दिन मैंने उन्हें बोल दिया कि मुझे आर्टिस्ट बनना है, मैं पेंटर बनूँगा. मुझे ड्राइंग का शौक था इसलिए मै इस फील्ड में अपनी स्किल्स इम्प्रूव करना चाहता था. तो मैंने अपने फादर को बोला कि मैं आर्ट में करियर बनाऊंगा, उन्हें सुनकर बहुत गुस्सा आया. जब तक मैं जिंदा हूँ तुम्हे आर्टिस्ट कभी नहीं बनने दूंगा" उन्होंने कहा.


मुझे पता था मेरे फादर बड़े जिद्दी है मगर मै भी कौन सा कम था. उन्होंने मेरा एडमिशन रियलस्कुले (Realschule) में करा दिया. जो सब्जेक्ट्स मुझे पंसद थे उनमे मेरे अच्छे ग्रेड्स आते और जो पसंद नहीं थे उसमे पूअर मार्क्स मिलते. यानी मेरे रिपोर्ट कार्ड में कहीं पर एक्स्लिलेंट और कहीं पर इनएडीकेट लिखा होता. मगर हाँ, हिस्ट्री और जियोग्राफी दोनों मेरे फेवरेट सब्जेक्ट्स है और इनमे मेरे पूरी क्लास में सबसे ज्यादा मार्क्स आते है. फिर मेरी लाइफ में वो मोड़ आया जिसने मुझे केयरफ्री बॉय से एक माइंडफुल यंग मेन बना दिया था, ये तब हुआ जब मेरे फादर की डेथ हुई, तब मै 13 साल का था.


दो साल बाद मेरे मदर भी चल बसी थी. मै आर्ट एकेडमी में जाकर एक आर्टिस्ट बनने के सपने देख रहा था लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंज़ूर था. मै अब अनाथ था, मुझे अपने ही दम पे जीना था. तो मै भी विएना चला गया जैसे मेरे फादर 50 साल पहले गए थे. मैं भी उनकी तरह खुद को प्रूव करना चाहता था. लेकिन सिविल सर्वेंट तो मै बिलकुल भी नहीं बनना चाहता था.


इयर्स ऑफ़ स्टडी एंड सफरिंग इन विएना

( Years of Study and Suffering in Vienna)


स्कूल ऑफ़ पेंटिंग एकेडमी में मैंने एंट्रेंस एक्जाम दिया. मुझे लगा मेरी पेंटिंग्स सबसे अच्छी है मगर मै बुरी तरह रिजेक्ट हुआ. मुझ पर जैसे बिजली गिर पड़ी. मेरे भूखे मरने की नौबत आ गयी थी. मैं स्माल पेंटर और लेबरर का काम करने लगा जिससे मुझे दो वक्त का खाना मिल जाता था. अपने फ्री टाइम में मै बुक्स पढता था. कोई बुक पसंद आती तो खाने के पैसे बचा कर मै किताब लेता था. जो भी हो, किताबे मेरा पैशन थी. मैंने किताबो से बहुत कुछ सीखा. सिटी लाइफ में दो चीज़े ऐसी थी जिसने मेरी आँखे खोली और वो थे जेविश और मासिस्ट्स लोग मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ये लोग जर्मन पब्लिक के बीच क्या कर रहे है. जितना मैं इन लोगो को देखता उतना ही मुझे उनसे नफरत होती थी.


जेविश लोग खुद को "चूजन वन" बोलते थे लेकिन ये लोग अंदर बाहर दोनों तरफ से मैले थे, जेविश लोगो को मैं देखते ही पहचान सकता हूँ. विएना की सडको पर जेविश भरे पड़े है. ये लोग गंदे कपडे पहनते है और इनसे अजीब सी स्मेल आती है. इन्हें देखते ही मुझे उल्टी आने लगती है. मै जेविश कल्चर के बारे में जानता हूँ, इन लोगो के आर्ट, लिटरेचर और थिएटर के बारे में जानता हूँ और मुझे ये समझ आया कि जेविश कल्चर एक बीमारी है जो जर्मन लोगो को इन्फेक्ट कर सकता है. और ये बिमारी मिडल एज के ब्लैक प्लेग से कम नहीं है. ये लोग इंसानियत के नाम पे धब्बा है.


इनका लिटरेचर कचरा है. इनका आर्ट बहुत ही घटिया है. और इनके थिएटर में बेवकूफी झलकती है और फिर भी ये लोग दिन व दिन बढ़ते ही जा रहे है. मै एक बिल्डिंग वर्कर का काम कर रहा था. वहां पर ट्रेड यूनियन के लोगो से मेरी अक्सर बहस हो जाती थी. ये लोग खुद को एम्प्लोईज का चैंपियन बोलते थे लेकिन ये लोग सिर्फ अपनी जेब भरते थे. और तभी मुझे पता चला कि ये यूनियन लीडर्स, ये सोशल डेमोक्रेट्स सारे जेविश है. मै कोई भी सोशल डेमोक्राफ्ट पढ़ सकता हूँ, इनमे ऑथर और पब्लिशर के सरनेम कुछ इस तरह होते है, एलेनबोगेन, डेविड, एडलर, ऑस्टरलिज़ वगैरह. ये लोग मर्क्सिस्म की बाते फैलाते हैं.


मैं जानता हूँ कि ये मार्किस्ट लोग और ये सडको पे दंगा-फसाद करने वाले सब के सब जेविश है. गुस्से और नफरत से मेरे तनबदन में आग लग गई. खुद को "चोजन पीपल" बोलने वाले इन लोगो की हिम्मत कैसे हुई कि कार्ल मार्क्स की बाते करके हमारे शहर में नफरत फैलाए? इनकी इतनी हिम्मत कि बाकियों को भी गवर्नमेंट के खिलाफ भड़का के काम करने से मना करे? मैं तो इस बात पे यकीन करता हूँ कि हम जर्मन लोग स्पेशल है और पॉवरफुल है, मै पर्सनेलिटी की वैल्यू में यकीन रखता हूँ. कुछ लोग राज करने के लिए पैदा हुए है और बाकि लोग उन्हें फोलो करने और उनकी बात मानने के लिए. और दुनिया को सही ढंग से चलाने का यही तरीका है लेकिन ये मार्किस्ट इस आर्डर को डिस्ट्रॉय करने की कोशिश कर रहे है जिससे काफी नुकसान होने वाला है.


इससे काफी गड़बड़ हो सकती है. मार्किस्ट हम जैसे प्रिविलेज्ड लोगो का हक छीन कर कॉमन लोगो के हाथ में देना चाहते हैं. ये लोग हमारे कल्चर, हमारी जाति और नेशनलिटी मिलावट करना चाहते है. मर्क्सिस्म ही वो तरीका है जिससे जेविश लोग दुनिया में राज करना चाहते है. ये योजन लोग खुद को सुपीरियर प्रूव करना चाहते है. मै खुद को अपने कल्चर के लोगो को जेविश लोगो से बचाना चाहता हूँ और इसलिए मुझे लगता है कि मैं एक तरह से गॉड की इच्छा को पूरी कर रहा हूँ. 


म्यूनिख (Munich )


मै 1912 में विएना से म्यूनिख चला आया. वॉर से पहले वाले दिन मेरी लाइफ के सबसे खुशनुमा दिन थे. म्यूनिख काफी डिफरेंट सिटी है. ये शहर जर्मन आर्ट से भरा पड़ा है, इस शहर से मुझे प्यार हो गया है. म्यूनिख से अच्छी जगह मैंने आज तक नहीं देखी. इस सिटी का डायलेक्ट मेरे दिल के बड़े करीब है. यहाँ मेरे जैसे बहुत से लोग बवेरिया से आए है. इन लोगो के साथ मेरा उठना बैठना है. इनसे मिलकर अपने पेरेंट्स और बचपन की यादे ताज़ा हो जाती है. म्यूनिख सिर्फ एक शहर नहीं है ये पॉवर और आर्ट का संगम है.


 

द वर्ल्ड वार (The World War)


1914 के हिस्टोरिकल इवेंट्स लोगो पर ज़बरन नहीं थोपे गए थे. इन फैक्ट हम बोल सकते है कि फर्स्ट वर्ल्ड वार पब्लिक की ही चॉइस थी. उस टाइम पर लोग किसी भी तरह अनसर्टेनिटी से छुटकारा चाहते थे. सवाल ये नहीं था कि कौन जीतेगा, ऑस्ट्रिया या सर्बिया. सवाल था कि क्या हम वाकई में एक जर्मन नेशन बना पायेंगे. दो मिलियन सोल्जेर्स मरते दम तक झंडे की हिफाजत करने को तैयार थे. मै अपने घुटनों पे गिर के हेवन की तरफ देख रहा था. मुझे इतनी ख़ुशी हुई कि बयान नहीं कर सकता कि मै इस वक्त में पैदा हुआ हूँ.


लोगो के बीच हमारे नेशन के स्टेट अफेयर्स को लेकर बड़ी अनसनिटी थी. लोगो में एक स्ट्रोंग अर्ज थी कि ऐसा स्ट्रगल हो जिससे सब कुछ हमेशा के लिए बदल ए. और इसके लिए ऑस्ट्रिया सर्बिया का पीसफुल रेजोल्यूशन काफी नहीं था. आर्कड्यूक फ्रेंकिस फर्डीनांड (Archduke Francis Ferdinand ) के मर्डर की खबर म्यूनिख में वाइल्ड फायर की तरह फ़ैल गयी थी और मुझे तभी श्योर हो गया कि अब लड़ाई छिड़ेगी. अब ये सिर्फ ऑस्ट्रिया और सर्बिया के बीच का मामला नहीं है बल्कि जेर्मनी के सेल्फ प्राइड की लड़ाई बन चुकी है.


ये वार हमारे नेशन का फ्यूचर बदल कर रख देगी. अगर जर्मनी जीतता है तो ये दुनिया का मोस्ट पॉवरफुल नेशन बन जायेगा. इसलिए अब हर जर्मनी की सिक्योरिटी और पहचान दांव पे लगी थी. मै अपने देश के लिए अपने एन्थूयाज्म को प्रूव करना चाहता था. सिर्फ बातो में नहीं बल्कि एक्शन से. मैंने हिज़ मजेस्टी को एक पेटीशन लिखा कि मुझे बवेरियन आर्मी ज्वाइन करने की परमिशन दी जाए. और अगले दिन ही लैटर का जवाब पाकर मै खुश हो गया. लैटर खोलते टाइम मेरे हाथ काँप रहे थे. मुझे अप्रूवल मिल गयी थी. तुरंत मुझे बवेरियन बैक्स में एंट्री मिल गयी. मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. ये मेरी लाइफ का ग्रेटेस्ट टाइम था.


मैं मिलिट्री ट्यूनिक पहनी जो मुझे अगले 6 सालो तक पहननी होगी. बड़ी दमदार आवाज़ में मैंने नेशनल एंथम गाया. आज मुझे अपनी कंट्री के लिए कुछ कर दिखाने का मौका मिला था. फिर एक रात बेहद ठंड थी जब मैंने अपने कामरेड्स के साथ फ्लान्डेर्स (Flanders ) के लिए मार्च किया. "जर्मनी, जर्मनी सबसे उपर, सारी दुनिया में सबसे उपर". हम जोर-जोर से नारे लगाते जा रहे थे. गनफायर का साउंड हवा में गूँजने लगा. हम टीनएजर्स की तरह निकले थे और चार दिन बाद हम मर्द बनकर म्यूनिख लौटे.


द रेवोल्यूशन ( The Revolution)


सितम्बर 1916 की बात है, मैं सोममे के बैटल में था (Battle of Somme) हालत क्या था मै बता नहीं सकता. ऐसा लग रहा था जैसे हम नर्क में हो. हफ्तों तक ड्रमफायर लगातार जारी रही. लेकिन जर्मन सोल्जेर्स ने हार नहीं मानी थी. कभी ऐसे भी मौके आते थे जब हमे पीछे हटना पड़ता था लेकिन हम खुद को आगे बढ़ने का हौसला देते रहे. हमारी जर्मन आर्मी काफी स्ट्रोंग थी. अक्टूबर 1916 की बात है, में लड़ाई में बुरी तरह घायल हो गया था. मुझे फ्रंट से हटाकर वापस जर्मनी भेज दिया गया. मुझे अपना देश छोड़े दो साल हो गए थे. हम सब घायल सोल्जेर्स फिर से अपने वतन लौटकर खुश थे. लेकिन जो मुसीबत सर पे थी उसका किसी को अंदाजा नहीं था. ट्रीटमेंट की वजह से मुझे होस्पिटल में रहना पड़ा. होस्पिटल के मुलायम बेड पे लेटे-लेटे नर्सों की आवाज़ सुनना मुझे बड़ा अजीब लग रहा था. कहाँ लड़ाई का मैदान और कहाँ ये माहौल, जमीन आसमान का फर्क था. जब मैं थोडा चलने फिरने लायक हुआ तो परमिशन लेकर मैं बर्लिन चला गया. बर्लिन में बुरा हाल था, चारो तरफ बदहाली फैली थी. पूरा शहर भूख से तडफ रहा था और म्यूनिख की तो बर्लिन से भी बुरी हालत थी. मुझे वहां पर रीप्लेसमेंट बटालियन ज्वाइन करने को बोला गया था. लेकिन यहाँ आकर मैंने क्या देखा? ये वो शहर था ही नहीं जिससे मुझे प्यार था. हर तरफ बहुआए और गालियाँ. हमारे बेरेक्स में मेरे साथी सोल्जेर्स गुस्से से भरे थे. सीनियर सोल्जेर्स जरा जरा सी बात पे हमे पनिश कर देते थे जबकि वो खुद कभी बैटलफील्ड में नहीं गए थे.


लेकिन मेरा सारा ध्यान तो जेविश लोगो पर था जो शहर के ऑफिसों में भरे हुए थे. सारे के सारे क्लेर्क्स जेविश थे यानी जो क्लर्क था वो पक्का जेविश था. इनसे छुटकारा मिलना मुश्किल था क्योंकि ये लोग इंसान नहीं लीच थे जो लोगो का खून पीते थे. जेविश लोग वार सप्लाईज बेच कर अमीर बन रहे थे. लड़ाई जितनी लंबी होगी इनका उतना ही फायदा होगा. ये लोग गन्स और एम्यूनेशंस सप्लाई करते थे. इन्हें कमज़ोर करने का एक ही सोल्यूशन था कि हमे इकोनॉमी अपने कण्ट्रोल में करनी होगी. प्रूरशियन और बावेरियंस एक दुसरे से फाईट करने में बीजी थे और ये लोग पर्दे के पीछे से तमाशा देख रहे थे.


ये लोग इतने पॉवरफुल और अमीर थे कि बावेरिया और शिया दोनों को बर्बाद कर सकते है. मार्च 1917 आते-आते मेरी फुल रिकवरी हो चुकी थी. अब मै एक बार फिर से जर्मनी के लिए फाईट करने को पूरी तरह रेडी था. ये नवंबर 1918 की बात है जब फाइनली लड़ाई स्टॉप हुई. उस वक्त मै हॉस्पिटल में था. मेरी आँख में चोट आई थी. एक पास्टर हमे रेवोल्यूशन के बारे में बताने आया. लड़ाई थम चुकी थी. और इसी के साथ मोनार्ची का भी खात्मा हो चुका था. जर्मनी अब एक रीपब्लिक कंट्री है. मुझे काफी गहरा सदमा लगा. अपनी मदर की डेथ के बाद में आज तक नहीं रोया था मगर उस नवम्बर मै रोया. हमारी सारी मेहनत, हमारी मेहनत, इतनी मुश्किले जो हमने फेन्स की थी हमारे कामरेड्स की कुर्बानी सब वेस्ट चला गया था, सब मिटटी में मिल गया था. कैसर विलियम ॥ (Kaiser William II) ने मार्किस्ट के साथ मिलकर एक एग्रीमेंट साइन किया. वो पूरशिया के लास्ट एम्परर थे. मार्किस्ट की जीत हुई थी. अब मै और फाईट नहीं कर सकता था इसलिए मैंने पोलिटिक्स ज्वाइन करने का डिसीजन लिया. ये मेरे पोलिटिकल करियर की शुरुवात थी. लेकिन मुझे उस टाइम की किसी भी पार्टी में इंटरेस्ट नहीं था क्योंकि मैं उनकी आडियोलोजी नहीं मानता था. बल्कि मै खुद को एक नेशनल सोशलिस्ट मानता था. और यही मेरा उसूल था कि मुझे अपने लोगो और अपने फादरलैंड के लिए जीना और मरना है. यानी हमे अपनी कम्यूनिटी को बचाने के लिए हर हाल में लड़ना ही होगा और अपने बच्चों को एक बैटर फ्यूचर प्रोवाइड करना होगा ताकि हमारे खून की प्योरीटी बनी रहे. इसका ये मतलब भी है कि हमे अपने फादरलैंड की आजादी की हिफाजत करनी है क्योंकि अगर हमारा देश आज़ाद रहेगा तभी उस मिशन में कामयाब हो सकते है जो उपरवाले ने हमे दिया है.


और इस पर्पज की खातिर हमें हर ख्याल को Every action and every thought must be grounded on this purpose. और इस पर्पज की खातिर हमें हर ख्याल को Action को तब्दील करना पडेगा । 1919 में मैंने एक कोर्स अटेंड किया जो सोल्जेर्स के लिए होता था. हमे यही आर्डर मिला था जिसमे लिखा था कि हर सोल्जर को सिविक थिंकिंग के बेसिक्स पता होने चाहिए. एक दिन, एक पार्टीसिपेंट जो जेविश लोगो की बड़ी तरफदारी करता था, उनके फेवर में कुछ बोलने लगा. मुझसे रहा नहीं गया, मैंने उठकर उसे जवाब दिया, ज्यादातर लोग मेरी बात से एग्री थे. वो सब बड़े ध्यान से मेरी स्पीच सुन रहे थे. इसके बाद मुझे आर्मी में एजुकेशनल ऑफिसर बना दिया गया. मै पैशन और एन्थूयाज्म से भर गया ये नहीं जॉब मुझे बड़ी पंसद आ रही थी. फाइनली, मुझे हज़ारो लोगो के सामने बोलने का मौका मिल रहा था. क्योंकि मै यंग था, मुझे मालूम था कि मेरे अंदर एक स्किल है, मैं लोगो को इन्फ्लुयेश कर सकता हूँ. इस टाइम मैंने खुद को प्रूव करके दिखा दिया था. मेरी आवाज़ इतनी स्ट्रोंग है कि कमरे के कोने-कोने से गूंजती है. मुझे बेहद ख़ुशी थी कि अपने इस गिफ्ट के थ्रू मै वो कर सकता हूँ जिसकी मै मिलिट्री में सबसे ज्यादा वैल्यू करता हूँ. मैंने हज़ारो लोगो को सर्विस में लौटने के लिए एंकरेज किया था. मेरी बातो से मेरे देश के सोल्जेर्स इंस्पायर किया कि हम अपनी ड्यूटी करे और अपने फादरलैंड को सर्व करे. मै अपने जैसी थिंकिंग वाले दुसरे कामरेड्स से मिला. मैंने कई लोगो को डिस्प्लीन सिखाया है. मैंने देश भर से लोगो को इस ग्रेट को ज्वाइन करने के लिए इंस्पायर किया है और हमारे इस मूवमेंट को नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टी के तौर पे जाना जाता है.


नेशन एंड रेस (Nation and Race )


कुछ ऐसे सच होते है जिनपर अक्सर लोग ध्यान नहीं देते, ऐसे सच जो हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में भूल जाते है. जैसे कि नेचर ने स्पीसीज जो डिफरेंट कैटेगरीज में डिवाइड किया है. एक जानवर अपने जाति वाले के साथ ही मेटिंग करता है, बच्चे पैदा करता है. चूहा चूहे को मेट करता है, शेर शेर को.


लेकिन अगर डिफरेंट स्पीसीज के बीच क्रोस ब्रीडिंग होगी तो कमज़ोर बच्चे पैदा होंगे. थ्योरीटीकली बोले तो अगर एक शेपहर्ड डॉग को शीप से क्रोस कराते है तो जो बच्चे पैदा होंगे वो शीप से तो स्ट्रोंग होंगे लेकिन एक डॉग के हिसाब से कमज़ोर होंगे.


इसलिए नेचर ने सबके लिए बेस्ट अरेंजमेंट किया है ताकि प्योरिटी ऑफ़ रेस मेंटेन रहे तभी तो कुत्ता कुत्ते की तरफ अट्रेक्ट होता है और बकरी बकरी की तरफ. सेम स्पीसेज़ के साथ मेटिंग सिस्टम से नेचर एक बेलेंस मेंटेन रखती है. तभी तो कुत्ते का बच्चा कुत्ते जैसा और बकरी का बच्चा बकरी जैसा दीखता है. इसलिए बात जब इंटेलीजेन्स और स्ट्रेंग्थ और शक्लोसूरत की हो तो डिफरेंस साफ़-साफ नजर आता है. तो ओब्विप्स है कि एक शेपहर्ड डॉग शीप से ताकतवर होगा.


यही सेम प्रिंसिपल हम इंसानों पर भी अप्लाई होता है. महान आर्यन रेस क्यों खत्म हो गयी थी. क्योंकि इन्होने अपने से कम लेवल के लोगो से सम्बंध बनाए. नार्थ अमेरिकन लैटिन अमेरिकन्स से सुपीरियर है क्योंकि इन लोगो ने दूसरी जाति वालो से क्रोस ब्रीडिंग नहीं की. नार्थ अमेरिकन्स जेर्मनी के ही मूल निवासी है. इनकी इंटेलीजेन्स और ताकत सिर्फ इसीलिए मेंटेन है क्योंकि इन्होने अपने ब्लड को अभी तक प्योर रखा है. और दूसरी तरफ लैटिन लोग है जिन्होंने सेंट्रल और साउथ अमेरिका में बाहर की कम्यूनिटी से शादियाँ करके मिक्स ब्रीड पैदा की है. लैटिन ब्लड इन्फिरीयेरिटी से भरा है. आप खुद देख लो कि नार्थ अमेरिका लैटिन अमेरिका से कितना पॉवरफुल है और ये सब प्योरिटी ऑफ़ रेस की वजह से ही पॉसिबल है.


इन फैक्ट जितने भी ग्रेट कल्चर हुए, सब ब्लड मिक्सिंग की वजह से बर्बाद हो गए है. इन्फीरियर रेस के ब्लड मिक्स होने से इनकी क्रिएटीविटी, विजन, टेलेंट सब खत्म हो गया. मेरे ख्याल से इंसानियत को तीन ग्रुप में बांटा जा सकता है. फर्स्ट, जो कल्चर के फाउन्डर है. सेकंड जो उस कल्चर को मेंटेन रखते है और थर्ड जो उसके डिस्ट्रॉयर है. और सिर्फ आर्यन्स ही फर्स्ट ग्रुप में आते है. आर्यन रेस ही सारे सिवीलाइजेशन्स की फाउन्डेशन है. इन्होने ही ह्यूमन प्रोग्रेस के बिल्डिंग स्टोन यानी नींव रखी थी. आर्यन्स ने प्लान बनाए, बाकि लोगो ने उन्हें एक्जीक्यूट किया. अमेरिका और योरोप की अचीवमेंट चाहे साइंस में हो या टेक्नोलोजी में, सब कुछ आर्यन्स की ही देन है.



द राइट ऑफ़ एमरजेंसी डिफेन्स 

(The Right of Emergency Defense) 


1918 और 1923 में हिस्ट्री रीपीट हुई. 1918 में गवर्नमेंट ने डिसाइड किया कि मार्किस्ट को हमेशा के लिए खत्म नहीं करना है क्योंकि इसकी वजह से जेर्मनी को कीमत चुकानी पड़ी थी. 1923 में जर्मनी में मार्किज्म को खत्म करने की बहुत ज्यादा ज़रूरत आन पड़ी थी. ये लोग सिवा खूनी और गद्दार के और और कुछ नहीं है. आप सिर्फ बुजुर्वा (bourgeoisies) लोगो को ही बेवकूफ बना सकते हो कि मार्किस्ट कंट्री की प्रोग्रेस में अपना कोंट्रीब्यूशन देंगे. ये लोग जेविश है और 1918 की लड़ाई में 2 मिलियन सोल्जेर्स की मौत के जिम्मेदार है. और इसके बावजूद ये लोग सरकार में ऊंची पोजीशन हथियाना चाहते है.


फर्स्ट वर्ल्ड वार में जर्मन सोल्जेर्स और जर्मन वर्कर्स मार्किस्ट लीडर्स की साजिश का शिकार हुए थे. वार के बाद इन मार्किस्टो ने हमारे फादरलैंड पे कब्ज़ा जमा लिया था. जेर्मनी के बेटो ने इसलिए अपनी जान की कुर्बानी नहीं दी कि ये गद्दार जेविश आकर हम पे हुकूमत करे, ये 15,000 हिब्रू लोग जो हद दर्जे के बेईमान है, इन्हें तो 1914 में ही गैस चैम्बर्स में डाल कर मार देना चाहिए था ताकि 1918 की बार के सोल्जेर्स आज जिंदा होते और उन्हें वो मिलता जिसके लिए वो लड़े थे. इन वर्कर्स और सोल्जेर्स की जान इन "सो काल्ड चोजन पीपल" से कई ज्यादा कीमती है.


लेकिन जर्मनी के बुजुर्वा ग्रुप ने ये सब होने दिया. स्टेट्समेनशिप के नाम पर इन्होने इन हिब्रू गद्दारों के लिए पॉवरफुल बनने के सारे रास्ते खोल दिए है. वो भी तब जब जेर्मनी के लाखो वफादार बैटलफील्ड में जान दे रहे है. लेकिन हमे ये गलती रीपीट नहीं करनी है. 1923 में ज़रूरत है कि हम इन मार्क्सवादियों को हमेशा हमेशा के लिए मिटा दें. सिर्फ दुआओं से देश नहीं बचता. पैसिव रेजिस्टेंस सिर्फ कुछ टाइम तक चलेगा. डिसप्यूट सेटल करने के लिए वॉरफेयर जैसी कोई चीज़ नहीं है. देश को बचाने का सिर्फ एक ही सच्चा और इफेक्टिव तरीका है और वो है मिलिट्री फ़ोर्स का. नंवबर 1923 में रीपब्लीक ने नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स की पार्टी को खत्म करने का आर्डर दिया.


मेम्बर्स को सख्त हिदायत मिली थी कि दुबारा कभी कोई मीटिंग ना रखी जाए. लेकिन जैसा कि अब नवम्बर 1926 में जब मैं इस बुक को खत्म कर रहा हूँ, हमारी नाज़ी पार्टी पहले से ज्यादा स्ट्रोंग और पॉवरफुल हुई है. राईट आईडियाज को फैलने से कोई नहीं रोक सकता. हम नाज़ी लोग अपनी प्योर विल, प्योर स्पिरिट को फैलाते रहेंगे. वैल्यू ऑफ़ पर्सनेलिटी और रेस ही हमारी पार्टी का कोर है. बस एक बार हमे इस रेशियल जहर का इलाज़ कर लेने दो फिर सारी दुनिया देखेगी कि जर्मन्स इस दुनिया में कैसे राज़ करते है. हम नाज़ी अपने फादरलैंड और अपने लोगो को बचाने के लिए कुछ भी करेंगे, किसी भी हद तक जायेंगे. जर्मनी, जर्मनी सबसे ऊपर, दुनिया में सबसे उपर,


कनक्ल्यूजन (Conclusion)


आपने इस बुक में अडोल्फ़ हिटलर के बारे में पढ़ा, वोकैसा था, क्या सोचता था इस बारे में पढ़ा. हिटलर अपनी जाति को बाकियों से प्योर मानता था, वो कट्टर मार्क्सवादी विचारों का इन्सान था. लेकिन वो बातो से ज्यादा एक्शन में बिलिव करता था. डिप्लोमेसी उसकी नजरो में कायरता की निशानी थी. आज हम डिजिटल एज में जी रहे है. दुनिया के अलग-अलग कोनो में रहने वाले लोग एक दुसरे से कनेक्टेड है. हम चाहे किसी भी रंग, जाति या कल्चर के हो, अंदर से तो हम सब इंसान है और यही हमारी सबसे बड़ी पहचान है.


हम सब अपनी फेमिली, अपने करीबी लोगो से प्यार करते है, उन्हें प्रोटेक्ट करना चाहते है. हम सब अपने सपने पूरे होते देखना चाहते है और खुश रहना चाहते है. इसलिए आज ज़रूरत इस बात की है कि हमारे अंदर एम्पेथी हो, हम दूसरो का पेन फील कर सके और उनके पॉइंट ऑफ़ व्यू से समझने की कोशिश करे तो आपके ख्याल से क्या आपकी लाइफ को बैटर बना सकता है. गुस्सा और क्लोज़ माइंडनेस या काइंडनेस और अंडरस्टैंडिंग ? तो आप अपनी लाइफ में क्या चाहते है? नफरत या प्यार और कम्पेशन? चॉइस आपकी है.


Welcome And Thanks 


फाइनली अगर आप इस समरी के एन्ड तक पहुंच गए है तो Congratulation बहुत ही कम लोग होते है जो नॉलेज के ऊपर टाइम इन्वेस्ट करते है वार्ना आप कही और भी तो टाइम वेस्ट कर सकते थे.
thumbnail

Apj Abdul Kalam Biography In Hindi। (एपीजे अब्दुल कलाम बायोग्राफी हिन्दी में)


Buy Now

 


Apj Abdul Kalam Biography In Hindi
Missile Man Biography

एपीजे अब्दुल कलाम का बायोग्राफी हिन्दी में

About This Post 

अगर आप एपीजे अब्दुल कलाम के बारे में और ज़्यादा जानना चाहते हैं, तो ये पोस्ट आपके लिए है. वो एक मेहनती स्टूडेंट, समर्पित मिसाइल साइंटिस्ट और बहुत पसंद किये जाने वाले लीडर थे. ये कहानी आपको, तमिलनाडु में उनके बचपन से लेकर DRDO और ISRO में उनके इम्पोर्टेन्ट कंट्रीब्यूशन तक की जर्नी के बारे में बताएगी. इस बुक में आप एरोस्पेस के बारे में कई बातें जानेंगे. आप इंडिया के मिसाइल मैन कहे जाने वाले एपीजे से लाइफ के इम्पोर्टेन्ट लेसंस भी सीखेगे।
 

1. यह बुक किसे पढनी चाहिये। 

स्टूडेंट्स, टीचर्स, जो साइंटिस्ट बनना चाहते हैं, जो सिविल सर्वेट बनना चाहते हैं

2. आँथर के बारे में।

एपीजे अब्दुल कलाम मिसाइल साइंटिस्ट और भारत के पूर्व प्रेजिडेंट हैं. उन्हें सब प्यार से मिसाइल मैन कहते हैं. अरुण तिवारी एक प्रोफेसर और मिसाइल साइंटिस्ट हैं. उन्होंने डीआरडीओ में कलाम के साथ काम किया है. साथ में, उन्होंने 5 बुक्स लिखीं हैं.

Wings of fire 


मैं एक गहरा कुंआ हूँ इस ज़मीन पर बेशुमार लड़के लड़कियों के लिए कि उनकी प्यास बुझाता रहूँ. उसकी बेपनाह रहमत उसी तरह ज़रें ज़रें पर बरसती है जैसे कुंवा सबकी प्यास बुझाता है. इतनी सी कहानी है मेरी, जैनुलाब्दीन और आशिअम्मा के बेटे की कहानी, उस लड़के की कहानी जो अखबारे बेचकर अपने भाई की मदद करता था. उस शागिर्द की कहानी जिसकी परवरिश शिव सुब्र्यमानियम अय्यर और आना दोरायिसोलोमन ने की. उस विद्यार्थी की कहानी जिसे पेंडुले मास्टर ने तालीम दी, एम्. जी. के. मेनन और प्रोफेसर साराभाई ने इंजीनियर की पहचान दी. जो नाकामियों और मुश्किलों में पलकर सायिन्स्दान बना और उस रहनुमा की कहानी जिसके साथ चलने वाले बेशुमार काबिल और हुनरमंद लोगों की टीम थी.

मेरी कहानी मेरे साथ ख़त्म हो जायेगी क्योंकि दुनियावी मायनों में मेरे पास कोई पूँजी नहीं है, मैंने कुछ हासिल नहीं किया, जमा नहीं किया, मेरे पास कुछ नहीं और कोई नहीं है मेरा ना बेटा, ना बेटी ना परिवार. मे दुसरो के लिए मिसाल नहीं बनना चाहता लेकिन शायद कुछ पढने वालो को प्रेणना मिले कि अंतिम सुख रूह और आत्मा की तस्कीन है, खुदा की रहमत है, उनकी वरासत है. मेरे परदादा अवुल, मेरे दादा फ़कीर और मेरे वालिद जेनालुब्दीन का खानदानी सिलसिला अब्दुल कलाम पर ख़त्म हो जाएगा लेकीन खुदा की रहमत कभी ख़त्म नहीं होगी क्योंकि वो अमर है, लाफ़ानी है. मै शहर रामेश्वरम के एक मिडिल क्लास तमिल खानदान में पैदा हुआ. मेरे अब्बा जेनाब्लुदीन के पास ना तालीम थी ना दौलत लेकिन इन मजबूरियों के बावजूद एक दानाई थी उनके पास.

एक हौसला था और मेरी माँ जैसी मददगार थी आशींअम्मा और उनकी कई औलादों में एक मैं भी था बुलंद कामिन माँ बाप का एक छोटा सा कदवाला मामूली शक्ल सूरत वाला लड़का. अपने पुश्तैनी मकान में रहते थे हम जो कभी बीसवी सदी में बना था. काफी बड़ा और वसील मकान था, रामेश्वरम की मस्जिद स्ट्रीट में. मेरे अब्बा हर तरह के ऐशो आराम से दूर रहते थे मगर ज़रूरियत की तमाम चीज़े मुयस्सर थी. सच तो ये है कि मेरा बचपन बड़ा महफूज़ था दिमागी तौर पर भी और ज़ज्बाती तौर पर भी. मटीरियली और इमोशनली. रामेश्वर का मशहूर शिव मंदिर हमारे घर से सिर्फ दस मिनट की दूरी पर था. हमारे इलाके में ज्यादा आबादी मुसलमानों की थी फिर भी काफी हिन्दू घराने थे जो बड़े इत्तेफाक से पड़ोस में रहते थे. हमारे इलाके में एक बड़ी पुरानी मस्जिद थी जहाँ मेरे अब्बा मुझे हर शाम नमाज़ पढने के लिए ले जाया करते थे. रामेश्वरम मंदिर के बड़े पुरोहित बक्षी लक्ष्मण शाश्त्री मेरे अब्बा के पक्के दोस्त थे. अपने बचपन की आंकी हुई यादो में एक याद ये भी थी की अपने अपने रिवायती लिबासो में बेठे हुए वो दोनों कैसे रूहानी मसलो पर देर देर तक बाते करते रहते थे.

मेरे अब्बा मुश्किल से मुश्किल रूहानी मामलो को भी तमिल की आम जबान में बयान कर लिया करते थे. एक बार मुझसे कहा था" जब आफत आये तो आफत की वजह समझने की कोशिश करो, मुश्किल हमेशा खुद को परखने का मौका देती है'

मैंने हमेशा अपनी साईंस और टेक्नोलोजी में अब्बा के उसुलूँ पर चलने की कोशिश की है. मै इस बात पर यकीन रखता हूँ की हमसे ऊपर भी एक आला ताकत है, एक महान शक्ति है जो हमें मुसीबत, मायूसी और नाकामियों से निकाल कर सच्चाई के मुकाम तक पहुचाती है. मैं करीब छह बरस का था जब अब्बा ने एक लकड़ी की कश्ती बनाने का फैसला किया जिसमे वो यात्रियों को रामेश्वरम से धनुषकोटि का दौरा करा सके. ले जाए और वापस ले आये. वे समुन्दर के साहिल पर लकडिया बिछाकर कश्ती का काम किया करते थे एक और हमारे रिश्तेदार के साथ अहमद जलालुदीन, बाद में उनका निकाह मेरी आपा जोहरा के साथ हुआ. अहमद जलालुदीन हालाँकि मुझसे पंद्रह साल बड़े थे फिर भी हमारी दोस्ती आपस में जम गयी थी. हम दोनों ही शाम लम्बी सैर पर निकल जाया करते थे. मस्जिद गली से निकलकर हमारा पहला पड़ाव शिव मंदिर हुआ करता था, जिसके गिर्द हम उतनी ही श्रधा से परिकर्मा करते जितनी श्रधा से बाहर से आये हुए यात्री. जलालुदीन ज्यादा पढ़ लिख नहीं सके उनके घर की हालत की वजह से लेकिन मैं जिस ज़माने की बात कर रहा हूँ, उन दिनों हमारे इलाके में सिर्फ एक वही शख्स था जो अंग्रेजी लिखना जानता था.

जलालुदीन हमेशा तालीमयाफ्ता और पढ़े लिखे लोगो के बारे में बाते करते थे. और एक शख्स जिसने बचपन में मुझे बहुत मुद्दफिक किया वो मेरा कजिन था, मेरा चचेरा भाई शमसुदीन और उसके पास रामेश्वरम में अखबारों का ठेका था और सब काम अकेले ही किया करता था. हर सुबह अखबार रामेश्वरम रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से पहुचता था. सन 1939 में दूसरी आलमगीर जंग शुरू हुई, द सेकंड वर्ड वार, उस वक्त मै आठ साल का था. हिन्दुस्तान को एह्तियादी फौज के साथ शामिल होना पड़ा और एक इमरजेंसी जैसे हालात पैदा हो गए थे. सिर्फ पहली दुर्घटना ये हुई कि रामेश्वरम स्टेशन पर ट्रेन का रुकना कैंसिल कर दिया गया और अखबारों का गठ्ठा अब रामेश्वरम और धनुषकोटी के बीच से गुज़रनेवाली सड़क पर चलती ट्रेन से फेंक दिया जाता. शमसुदीन को मजबूरन एक मददगार रखना पड़ा जो अखबारों के गठ्ठे सड़क से जमा कर सके, वो मौका मुझे मिला और शमसुदीन मेरी पहली आमदनी की वजह बना.


हर बच्चा जो पैदा होता है वो कुछ समाजी और आर्थिक हालात से ज़रूर बशरमान होता है और कुछ अपने ज़ज्बाती माहौल से भी और उसी तरह उसकी तबियत होती है. मुझमे दयानतदारी और सेल्फ डिसपीलीन अपने अब्बा से वरासत में मिला था और माँ से अच्छाई पर यकीन करना और रहमदिली लेकिन जलालुदीन शम्शुदीन की वजह से जो असर मुझ पर पड़ा उससे मेरा बचपन ही महज़ अलग नहीं हुआ बल्कि आईंदा जिंदगी पर भी उसका बहुत बड़ा असर पड़ा. फिर जंग ख़त्म हो गयी और हिन्दुस्तान की आज़ादी बिलकुल यकीनी हो गयी. मैंने अब्बा से रामेश्वरम छोड़ने की इजाज़त चाही. मै डिस्ट्रिक्ट हेडक्वार्टर रामनाथपुरम जाकर पढना चाहता था. शम्शुदीन और जलालुदीन मेरे साथ रामनाथपुरम तक गए, मुझे स्वार्ट्स हाई स्कूल में दाखिला कराने के लिए. ना जाने क्यों वो नया माहौल मुझे रास नहीं आया. रामनाथपुरम बड़ा मशहूर शहर था और करीब पचास हज़ार की आबादी थी लेकिन रामेश्वरम का सुकून और इत्मीनान कहीं नहीं था. घर बहुत याद आता था और घर लौटने का कोई मौका मै छोड़ता नहीं था.

स्वार्ट्स हाई स्कूल में दाखिले के बाद एक पंद्रह साला लड़के के तमाम शौक जो हो सकते थे, मेरे अन्दर जाग उठे थे. मेरे टीचर अन्ना दोराई सोलोमन बेहतरीन रहबर थे, गाईड उस नौजवान के लिए जिसके सामने जिन्दगी की बेसुमार मुमकीनात खुलने वाली थी. रामनाथपुरम के उस अरसा-ए-कायम में उनसे मेरा रिश्ता उस्ताद शागिर्द या गुरु शिष्य से भी आगे निकल गया. अन्ना दोराई कहा करते थे" जिंदगी में कामयाब होने और नतीजे पाने के लिए तीन चीजों पर काबू पाना बहुत ज़रूरी है, ख्वाहिश यकीन और उम्मीद अन्ना दोराई जो बाद में रेवेरेंट हो गए, कहा करते थे" इससे पहले की मै चाहू कुछ हो जाए, उससे पहले मेरे अन्दर उसकी पूरी शिद्दत से ख्वाहिश हो और यकीन हो कि वो होगा." मैं अपनी जिंदगी से अगर मिसाल दूँ तो मुझे बचपन से ही आसमान के इसरार और परिंदों की परवाज़ हमेशा हैरान करती थी, फेसिनेट करती थी. सम्नुदर में कुंजो और बगुलों को ऊँची उड़ाने लगाते देखता था तो उड़ने को जी चाहता था. मै एक सादा सा गाँव का लड़का तो था मगर मुझे यकीन था की एक दिन मै उन कुंजो की तरह बुलंद उड़ान लगाकर बुलंदी पर पहुचुंगा.

और हकीकत ये है की रामेश्वरम से उड़ने वाला मै पहला लड़का था. स्वार्ट्स स्कूल में तालीम हासिल करते करते मेरे अन्दर खुद एतमादी बस चुकी थी और मुझे यकीन था मै ज़रूर कामयाबी हासिल करूंगा. मै तालीम आगे जारी रखूँगा, उसमे कोई दूसरा ख्याल नहीं था. सन 1950 में मै इंटर मीडिएट पढने के लिए सेंट जोसेफ कोलेज त्रिची में दाखिल हो गया. जब बी. एस. सी डिग्री करने के लिए मैंने सेंट जोसेफ कोलेज में एडमिशन लिया तो हायर एजुकेशन के माने सितने ही जानता था. ये नहीं जानता था कि हायर एजुकेशन के लिए कुछ और भी हो सकता है, ना ये जानता था कि साईंस पढके फ्यूचर के लिए और क्या हासिल हो सकता है. बी.एस.सी पास करने के बाद ही जान पाया कि फिजिक्स मेरा सब्जेक्ट नहीं था. अपने ख्वाब को पूरा करने के लिए मुझे इंजीनियरिंग में जाना चाहिए था मगर पता नहीं क्यों कुछ लोगो का ऐसा ख्याल है कि साईंस आदमी को खुदा से मुल्कर कर देती है लेकिन मेरे लिए तो साईस एतमाद, विश्वास और रूहानी तस्कीन की वजह रही है.

किसी तरह मैं एम आई टी यानी मद्रास इंजीयरिंग और टेक्नोलोजी के उमीद्वारो की लिस्ट में तो आ गया लेकिन उसका दाखिला बहुत महंगा था कम से कम एक हज़ार रुपयों की ज़रुरत थी और मेरे अब्बा के पास इतने पैसे नहीं थे. उस वक्त मेरी अक्का, मेरी आपा जोहरा ने अपने सोने के कड़े और चेन बेचकर मेरी फीस का इतेजाम किया. उसकी उम्मीद और यकीन देखकर मै पसीज गया. एमाईटी में सबसे ज्यादा मज़ा आया. वहाँ दो हवाई जहाज रखे देखकर, जो उड़ान से बरी कर दिए गए थे एक अजीब सा खिंचाव महसूस होता था. और जब बाकि लड़के हॉस्टल चले जाते थे, मैं घंटा डेढ़ घंटा उनके पास बैठा रहता था. फर्स्ट इयर मुक्कमल होने के •बाद जब मुझे अपने ज्यादा खशूशी मज़मून चुनने थे तो मैंने फ़ौरन एरोनोटिकल इंजीयरिंग का चुनाव किया. एम आई टी की तालीम के दौरान मुझे तीन टीचर्स ने बहुत मुद्दसर किया. प्रोफ. के. ए.वी. मेंडेलीन, प्रोफ. स्पोंडर, प्रोफ. नरसिम्हाराव. प्रोफ. स्पोंडर टेक्नीकल एरो डायनामिक सिखाते थे.

मेकेनिकल इंजीयरिंग में दाखिले से पहले ही मैंने उनसे सलाह ली थी. उन्होंने मुझे समझाया था कि " मुस्तकबिल का फैसला करने से पहले मुस्तकबिल की मुमकिनियत के बारे में नहीं सोचना चाहिए बल्कि सोचना चाहिए एक अच्छी बुनियाद के लिए और अपने रुझान और रिश्तियात के बारे में कि उनमे कितनी शिद्दत है, एप्टीटपुड और इन्सिपिरेशन में कितनी इन्टेन्सिटी है. मैं खुद भी होने वाले इंजीनियर स्टूडेंट्स से ये कहना चाहता हूँ कि जब वे अपने स्पेशलाइजेशन का चुनाव करे तो देखना होगा कि उनमे कितना शौक है कितना उत्साह और लगन है उस शौक में जाने के लिए. प्रोफ. के. ए. वी. मेंडेलींन ने मुझे एरो स्ट्रक्चर डिजाइन सिखाया और उसका तंजिया भी. विश्लेषण और एनालिसिस भी वे बड़े खुशदिल और दोस्त टीचर थे और हर साल कोई ना कोई नया तरीका, नया नजरिया लेकर आते थे. प्रोफ. नरसिंहाराव मेथमेटीशियन थे, वे एरो डायनामिक्स की थ्योरी सिखाया करते थे. उनकी क्लास में शामिल होकर मुझे मेथमेटिक्स फिजिक्स बाकी तमाम सब्जेक्ट से ज्यादा अच्छा लगने लगा.

एम आई टी से मै बेंगलोर के हिन्दुस्तान एरोनोटिकल लिमिटेड में बतौर ट्रेनी दाखिल हो गया. एचएएल से जब मै एरोनोटीकल इंजीयरिंग में ग्रेजुएट बनकर निकला तो जिंदगी ने दो मौके मेरे सामने खड़े कर दिए. दोनों मेरी परवाज़ के देरीना ख्वाब को पूरा कर सकते थे. एक मौका था एयरफोर्स का दूसरा मिनिस्ट्री ऑफ़ डिफेन्स में डायरेक्टरेट ऑफ़ टेक्नीकल डेवलपमेंट और प्रोडक्शन का. मैंने दोनों में अर्जी भेज दी और बावक्त दोनों से इंटरव्यू का बुलावा आ गया. एयरफोर्स के लिए मुझे देहरादून बुलाया गया था और डिफेन्स के लिए दिल्ली. मेरे दोनों मुकाम दो हज़ार किलोमीटर के फासले पर थे और ये पहला मौका था मेरा अपने वसील और विराट वतन को देखने का. खिड़की पर बैठा हुआ मै इस देश की सरजमीं को पावों के नीचे से बहता हुआ देख कर हैरान था कि उत्तर की सफ़र करते हुए एक ही मुल्क का लैंडस्केप कैसे बदल जाता है. मै एक हफ्ता दिल्ली में ठहरा डिफेन्स मिनिस्ट्री का इंटरव्यू दिया. इंटरव्यू अच्छा हुआ था वहां से मैं देहरादून गया एयरफोर्स सिलेक्शन बोर्ड के इंटरव्यू के लिए. पच्चीस उमीद्वारो में मैं नवें नंबर पर आया. मेरा दिल बैठ गया.

बहुत मायूस हुआ और कई दिन तक अफ़सोस रहा कि एयरफोर्स में जाने का मौका मेरे हाथ से निकल गया. मै ऋषिकेश चला गया, दिल पे ये बोझ लेकर कि आने वाले दिन बड़े सख्त होंगे. गंगा में स्नान किया और फिर चलता हुआ पास की पहाड़ी में शिवानन्द आश्रम तक पहुच गया. स्वामी शिवानन्द से भेंट हुई. देखने में बिलकुल गौतम बुद्ध लगते थे. सफ़ेद दूधियाँ धोती और पावों में लकड़ी की खड़ाऊ उनकी बच्चो सी मासूम मुस्कान और सादादिल देखकर बहुत प्रभावित हुआ. मैंने बताया उन्हें कि कैसे इंडियन एयरफोर्स में भारती होने से रह गया और मेरी कितनी शदीद ख्वाहिश थी आसमानों में उड़ने की, परवाज़ करने की. वो मुस्कुरा दिए और बोले " ख्वाहिश अगर दिलो जान से निकली हो तो वो पवित्र होती है और उसमे अगर शिद्दत हो तो उसमे कमाल की एक इलेक्ट्रो मेग्नेटिक एनर्जी होती है. एक बर्की मकनती सी ताकत होती है. दिमाग जब सोता है तो वो एनर्जी रात की ख़ामोशी में बाहर निकल जाती है और सुबह कायनात, ब्रह्माण्ड सितारों की गति रफ़्तार को अपने साथ समेट कर दिमाग में वापस लौट आती है. इसलिए जो सोचा है उसकी सृष्टि अवश्य है. वो बख्ति होगा तुम विश्वास करो इस अजली बंधन पर, इस वचन पर कि सूरज फिर लौटेगा. बहार फिर से आएगी. मै दिल्ली लौट आया.

डिफेन्स में अपने इंटरव्यू का नतीजा दरयाफ्त किया. जवाब में मुझे अपोइंटमेंट लैटर थमा दिया गया. और अगले दिन से सीनियर साइंटिफिक अस्सिस्टेंट मुकर्रर कर दिया गया ढाई सौ रूपये के महीना तनख्वाह पर. तीन साल गुजर गए. उन्ही दिनों बंगलोर में एरोनोटिकल डेवलपमेंट एश्टेबिलिश्मेंटADE का नया महकमा खुला और मुझे वहां पोस्ट कर दिया गया. बेंगलोर कानपुर से बिलकुल मुक्तलिफ़ शहर था. मै अपने डायरेक्टरेट का पहला साल वहाँ गुज़ार चूका था. दरअसल हमारे देश में अजीब सा तरीका है, अजीब सा ढंग है अपने लोगो को हद दर्ज़ा तक निचोड़ लेने का, जो हमारे लोगो को इन्तेहापसंद बना देता है. शायद इसलिए कि सदियों से देश ने गैर मुल्को की तहजीबो के जख्म खाए है और उन्हें अपने दामन में जगह दी है. अलग अलग हुक्मरानों से वफ़ा करते करते हम अपनी हैसियत, अपनी इफ्तेदा खो बैठे है. बल्कि हमने एक और ही खूबी पैदा कर ली है कि एक ही वक्त में रहमदिल भी है और बेरहम भी, हसाज़ भी है और बेहिस भी जितने गहरे है उतने ही सतही. ऊपर से देखो तो हम बड़े खुशरंग और खूबरू नज़र आते है लेकिन कोई गौर से देखे तो हम अपने हुक्मरानों की बेढब नक़ल से ज्यादा और कुछ नहीं है.

मैंने कानपुर में कल्ले में दबाये हुए पान वाले नवाब वाजिद अली शाह के नकलची बहुत देखे और बेंगलोर में फिरंगियों के अंदाज़ में कुत्ते की ज़ंजीर थामे टहलते हुए साहिबो की कमी नहीं थी. बेंगलोर में रहते हुए मै रामेश्वरम के गहरे सुकून और शांत वातावरण के लिए तरसता था. पहले साल तो ADE में कोई ज्यादा काम नहीं था. एक प्रोजेक्ट टीम बनायी थी कि तीन सालो में एक स्वदेशी होवर क्राफ्ट तैयार करे और जो वक्त से पहले तैयार हो गया. उसका नाम रखा गया शिव की सवारी के आधार पर उसका डिजाइन हमारी उम्मीद से ज्यादा अच्छा था लेकिन मै सख्त मायूस हुआ जब आपसी कंट्रोवर्सी के बिना पर सारा प्रोजेक्ट बला-ए-ताक पर रख दिया गया, बंद कर दिया गया. प्रोफ. एम्. जी. के. मेनन टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च के डायरेक्टर एक दिन अचानक हमारी जांच पड़ताल को आ पहुंचे. नंदी का जिक्र निकला, मुझसे पूछताछ करते हुए उन्होंने ख्वाहिश जाहिर की एक दस मिनट की उड़ान के लिए. उसके हफ्ता बाद की बात थी मुझे इन्स्कोसपर से बुलावा आ गया.

मैं मुंबई चला गया इंटरव्यू देने मेरा इंटरव्यू लेने वालो में विक्रम साराभाई, एम्. जी. के मेनन के अलावा मिस्टर सराफ थे जो उस वक्त एटॉमिक एनर्जी कमीशन के डेपुटी सेक्रेटरी के ओहदे पर थे. डाक्टर साराभाई की गरमजोशी ने पहली ही मुलाकत में मेरा दिल मोह लिया. अगले ही दिन मुझे खबर मिली कि मै चुन लिया गया. मुझे इन्कोस्पर में राकेट इंजीनियर की हैसियत से शामिल कर लिया गया था. सन 1962 में देरेना हिस्से में कहीं इन्कोस्पर ने थुम्बा में इक्वेटोरियल राकेट लांच स्टेशन बनाने का फैसला किया. थुम्बा केरल में त्रिवेंद्रम से परे दूर दराज़ के एक उंघते से गाँव का नाम है. हिन्दुस्तान में ये मॉडर्न राकेट बेस्ड रिसर्च की एक दबी सी इफ्तेदा थी, एक हलकी सी शुरुवात थी. उसके फ़ौरन बाद ही मुझे छेह महीने के लिए अमेरिका भेज दिया गया. नासा में राकेट लौन्चिंग की ट्रेनिंग के लिए. जाने से पहले मैं थोडा सा वक्त निकाल कर रामेश्वरम गया. मेरे अब्बा मेरी इस कामयाबी के लिए बहुत खुश हुए और मुझे उसी मस्जिद में ले जाकर शुक्राने की नमाज़ अदा की.


नासा लेंगले रिसर्च सेंटर वर्जीनिया में मैंने अपने काम की शुरुवात की. बाद में गोडार्ड फ्लाई स्पेस सेंटर मेरीलैंड चला गया. मै अपना इम्प्रेशन अमेरिकन के बारे में बेंजामिन फ्रेंक्लिन के इस जुमले से बयान कर सकता हूँ "जिन बातों से तकलीफ होती है उनसे तालीम भी मिलती है" हिन्दुस्तानी तंजीमो में यहाँ की ओगनिज़ेशन में एक बड़ी मुश्किल है. जो ऊपर है वो बड़े मगरूर है. अपने से छोटो की, जूनियर और सबोर्डिनेट की राय लेना अपनी हदके समझते है. कोई भी शख्स अपनी खूबी दिखा नहीं सकता अगर आप उसे मलामत ही करते रहे. उसूल और पाबन्दी, पाबन्दी और सख्ती, सख्ती और जुल्म के बीच की लाइन बड़ी महीन है, बारीक है. उसकी पहचान बहुत ज़रूरी है. मै जैसे ही नासा से लौटा फ़ौरन बाद ही हिन्दुस्तान का पहला राकेट लांच वाकया हुआ. 21नवम्बर 1963, वो साउन्डिंग राकेट था, नाम अपाचे नाइकी. नाइकी अपाचे की कामयाबी के बाद प्रोफ साराभाई ने अपनी आरजू, अपने ख्वाब का इज़हार किया. एक इंडियन सेटेलाईट लांच व्हीकल ISLV का सपना हिन्दुस्तानी राकेट का सपना 20वी सदी का ख्वाब भी कहा जा सकता है जो टीपू सुलतान ने देखा था. टीपू सुलतान की फौज में 27 ब्रिगेड थे जो कुशहूंस कहलाते थे और हर एक ब्रिगेड में एक दस्ता था राकेटमेन का जो साथ रहता था और जुक्स कहलाता था. जब टीपू सुलतान मारा गया तो अंग्रेजो ने 700 राकेट और 900 राकेट के सब- सिस्टम बरामद किये.

1799 में तिरुनेलवेली की जंग के बाद वो रॉकेट्स विलियम कांगेरी ने इंग्लैंड भिजवा दिए जांच पड़ताल के लिए. उसकी तकनीक समझने के लिए जिसे आज की साइंस जुबान में हम रिवर्स इंजीयरिंग कहते हैं. टीपू सुलतान की मौत के बाद उस ख्वाब की भी मौत हो गयी कम से कम डेढ़ सौ साल के लिए. पंडित जवाहरलाल नेहरु की बदौलत वो रोकेटरी का ख्याल फिर एक बार हिन्दुस्तान में जिंदा हुआ. प्रोफ. साराभाई ने उस ख्वाब को हकीकत बनाने की जिम्मेदारी अपने सर ली. बहुत से तंगनज़र लोगो को एतराज़ था इस बात से कि इस मुल्क में जहाँ कौम को दो वक्त की रोटी नसीब नहीं होती वहां इस स्पेस उड़ानों को इन खयालाई तहरीको को क्यों तरजीह दी जा रही है. लेकिन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू और साराभाई के नज़रिए में किसी किस्म का मुबारता नहीं था. उनके नज़रिए बिलकुल साफ़ थे कि अगर दुनिया के मुल्को में, दुनिया के मसलो में हिस्सा लेना है, शिरकत करनी है हिन्दुस्तान को कोई हैसियत हासिल करनी है तो साइंस और टेक्नोलोजी की तरक्की, खुद मुख्तारी और सेल्फ रिलाएंस ज़रूरी है और उनका मकसद ताकत का मुजाहिरा बिलकुल नहीं था.

सहज पके सो मीठा होए, थुम्बा में दो राकेट सहज पके और कामयाब हुए एक रोहिनी और दूसरा मेनिका. अगला साल लगा ही था जब प्रोफ. साराभाई ने मुझे दिल्ली बुला भेजा एक मीटिंग थी और मीटिंग में ग्रुप कैप्टेन वी. एस. नारायणन से मेरा तार्रुफ़ कराया गया जो एयर हेडक्वार्टर से थे. प्रोफ. साराभाई ने RATO तैयार करने का इरादा ज़ाहिर किया. राकेट असिस्टेंट टेक ऑफ जो एक मिलिट्री एयरक्राफ्ट की मदद से उड़ाया जा सके बड़ी छोटी सी जगह में. शाम तक ये खबर भी आम हो गयी कि हिन्दुस्तान एक खुद शाफ़्ट मिलिट्री एयरक्राफ्ट तैयार कर रहा है और मै उस प्रोजेक्ट का मुख्तार हूँ, जिम्मेदार हूँ. मैं कई तरह के जज्बात से भर गया. खुश भी था, शुक्रगुजार भी, खुशकिस्मत भी और एक एहसास हुआ तकनील का, फुलफिलमेंट का 19वी सदी के एक शायर की ये शेर बहुत याद आये "हर दिन के लिए हमेशा तैयार रहो, हर दिन को एक तरही में लो जब ओखली में हो तो बर्दाश्त करो, जब दश्ता हो तो वार करो.

RATO पे काम करते हुए दो अहम् वाक्यात हुए. पहला तो ये था कि अपने देश में पहली बार स्पेस रिसर्च का दस साला प्रोग्राम तैयार हुआ जिसके ओथेर थे प्रोफ. साराभाई. मेरे लिए वो एक रूमानी मेनिफेस्टो था जैसे स्पेस से इश्क करने वाले किसी शायर की रूमानी नज़्म हो, जैसे कोई अपने देश के आसमान से इश्क करने लगा हो. और दूसरा वाकया, मिनिस्ट्री ऑफ़ डिफेन्स में मिसाइल पैनल का तैयार होना. नारायणन और मैं हम दोनों उस पैनल के मेम्बर थे. उस वक्त तक भविष्य की आने वाली SLV सेटेलाईट लांच वेहिकल का नाक-नक्शा भी तैयार हो चूका था. प्रोफ. साराभाई अपने देरीना ख्वाब की ताबीर देने के लिए कुछ और साथियों का चुनाव कर चुके थे. मै खुद को खुशकिस्मत समझता हूँ, मुझे उस प्रोजेक्ट का लीडर चुना गया. उस पर प्रोफ. साराभाई ने मुझे एक और जिम्मेदारी भी सौंपी कि लांच की चौथी स्टेज़ में ही डिसाइड करू. ये मामुल था, मेरा अल्क था कि हर मिसाइल पैनल की मीटिंग के बाद मैं जाकर प्रोफ. साराभाई को पूरी तफसील, पूरी रिपोर्ट देता था. दिल्ली में ऐसे ही एक मीटिंग के बाद 23 दिसंबर 1971 को मै त्रिवेंद्रम लौट रहा था और उस दिन थुम्बा में प्रोफ. साराभाई SLV का मुआयना करने गए हुए थे. दिल्ली एअरपोर्ट के लौंज़ से मैंने उन्हें फोन किया, पैनल मीटिंग की तफसील बताई. प्रोफ. साराभाई ने कहा कि मैत्रिवेंद्रम एअरपोर्ट पर उनका इंतज़ार करूँ, मै जब त्रिवेंद्रम पहुंचा तो फिज़ा में एक मातम छाया हुआ था, मुझे खबर दी गयी कि प्रोफ. साराभाई नहीं रहे. चंद घंटो पहले दिल का दौरा पड़ने से उनका इन्तेकाल हो गया. मै थर्रा कर रह गया. चंद घंटे पहले ही तो मैंने उनसे बात की थी. मेरे लिए वो बहुत बड़ा सदमा था. प्रोफ. साराभाई मेरी नज़र में इंडियन साइंस के राष्ट्रपिता थे, जैसे महात्मा गाँधी है. उन्होंने अपनी टीम से रहनुमा पैदा किये और खुद अमल से उनके लिए मिसाल साबित हुए.


कुछ अरसा प्रोफ. एम्. जी. के. मेनन ने स्पेस रिसर्च का काम संभाला. बिल आखिर प्रोफ. सतीश धवन को इंडियन स्पेस रिसर्च ओर्गेनाइजेशन ISRO की जिम्मेदारी सौंप दी गयी. थुम्बा का पूरा काम्प्लेक्स बड़े पैमाने पर एक स्पेस सेंटर बना दिया गया और विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर VSSC का नाम दिया गया. जिसने वो सेंटर कायम किया था उसी के नाम से उस जगह की श्रधांजलि पेश की गयी. मशहूर मेटीरियोलिजिस्ट डॉ. ब्रह्म प्रकाश VSSC के पहले डायरेक्टर मुकरर्र हुए. कोई भी शख्स अपनी जिम्मेदारी में तभी कामयाब हो सकता है अगर वो बा- रसूख हो, मोतबर हो और अपने फैसलों के लिए उसे सही हद तक आजादी हो शायद निजी जिंदगी में भी तस्लील का यही एक रास्ता है. आजादी और जिम्मेवारी एक साथ हो तभी वो तस्कीन और ख़ुशी का बायिस हो सकती है और ज़ाती आज़ादी हासिल करने के लिए मै दो रास्ते तजवीर कर सकता था जो मैंने इख्तियार किये. पहला तो ये कि अपनी तालीम और तबरियत को बढावा दो. इल्म, नॉलेज बड़ा करामाती हथियार है, बहुत काम आता है. इल्म जितना ज्यादा होगा उतनी ज्यादा आजादी के हक़दार होंगे. इल्म वो पूँजी है जो कोई छीन नहीं सकता, इनकी रहनुमाई तभी मुमकिन है अगर आपकी जानकारी मुक्कमल हो, अपटूडेट हो. कामयाब रहनुमा बनने के लिए ज़रूरी है कि दिन का काम जब ख़त्म हो आप पिछले काम का जायजा ले, अगले दिन के काम की तैयारी करे. दूसरा तरीका ये है कि अपने काम को अपना फ़न समझो, गर्व समझो और ज़रुरत भी है कि अपने अन्दर की शक्ति की सही जानकारी हो. जो करो उस पर यकीन रखो, ये जिस पर यकीन हो वही करो वर्ना दुसरो के ईमान का शिकार बनते रहोगे. SLV प्रोजेक्ट के पहले तीन सालो में साईस के बहुत से नए नए इसरार खुले पर अहिस्ता आहिस्ता साईस और टेक्नोलोजी का फर्क समझ आने लगा | रिसर्च और डेवलपमेंट का फासला पता चलने लगा | किसी भी इजाद में गलतियां होना लाजिमी है लेकिन हर गलती कामयाबी की तरफ एक और कदम उठाती है । इस और सीड़ी बन जाती है। किसी भी तखलीक की तरह SLV की तखलीक भी कई दर्दनाक लम्हों से गुजरी | एक रोज़ जब मै और मेरे तमाम साथी अपने कामो में पूरी तरह डूबे हुए थे मेरे घर से एक मौत की इत्तला पहुची | मेरे दोस्त और मेरे हमदर्द मेरे बह्नोई जलालुद्दीन का इन्तेकाल हो गया था। कुछ देर के लिए तो मैं सुन्न होक रह गया, मेरी आँखों में अँधेरा छा गया | थोड़ी देर बाद जब अपने चौगिरदे का एहसास हुआ, मैंने महसूस किया कि जैसे मेरी हस्ती का एक हिस्सा मर गया था। रात के रात बसों में सफ़र करता हुआ अगली सुबह मै रामेश्वरम पहुचा |

जोहरा को क्या तसल्ली देता और क्या सब्र देता अपनी भांजी महबूबा को जो रो रोकर हलकान हो रही थी, मेरी आँखों के सोते पहले ही सूख चुके थे। थुम्बा लौटकर बहुत दिनों तक सारा काम काज, सारी मसरूफियत बेमानी लगने लगी | बहुत दिनों तक बहुत मलाल लगा, सब बेमानी लगता था। प्रो. धवन देर देर तक हौसला देते थे, कहते थे, "SLV पर जैसे जैसे काम आगे बढ़ेगा, मुझे सब्र महसूस होगा और ये मायूसी कम होते होते गुज़र जायेगी

1976 में मेरे अब्बा जेनुलाब्दीन 102 साल की उम्र में वही रामेश्वरम में इन्तेकाल फरमा गए । 15 पोते पोतियाँ छोड़ कर गए थे पीछे और एक पड़पोता | दुनियावी तौर पर वो सिर्फ एक और बुजुर्ग की मौत थी, कोई बड़ा मातम नहीं हुआ, झंडा नहीं उतारा गया, ना अखबारों में स्याह हाशिये दिए गए। ना सियासतदान थे वो ना विद्वान कोई, ना कोई बड़े सरमाया दार, एक सीधे सादे इंसान थे फ़रिश्ता शिफत और हर एक उस बात की वजह थे जो दानाई और पारसाई की राह दिखाती है। मैं बहुत देर तक अपनी माँ के पास बैठा रहा चुपचाप और जब उठा थुम्बा लौटने के लिए तो उसने रुंधे गले से दुआए दी मुझे |

SLV 3 आपाचे रॉकेट जो फ्रांस से उडाई जाने वाली थी, अचानक कुछ मुश्किलों का शिकार हो गयी | मुझे फ़ौरन फ्रांस जाना पड़ा। मै रवाना होने ही वाला था कि मेरी माँ की मौत की खबर पहुची, एक के बाद एक पूरी तीन मौते हो गयी मेरे घर में, उस वक्त मुझे अपने काम में पूरे ध्यान की ज़रुरत थी |

सौर फीसदी लगन से काम करने की ख्वाहिश किसी और लगन की गुंजाईश नहीं छोडती | मुकल्माती और पूरी लगन से SLV 3 का ख्वाब 1979 के दरमियान में जाकर पूरा हुआ | हमने SLV3 की परवाज का दिन 10 अगस्त 1979 तय किया। 23 मीटर लम्बा चार स्टेजेस का ये राकेट 17 टन का वजन लेकर 7 बजकर 58 मिनट में बड़ी कजादाई से उड़ा और खला की तरफ रवाना हुआ।

पहली स्टेज हर तरह से पुख्ता निकली और बड़े आराम से राकेट दूसरी स्टेज में चला गया हम दम्खुद रह गए. सांस रुकी बैठी थी. हमारे बरसो का ख्वाब आसमान की तरफ सफ़र कर रहा था। अचानक हमारे ख्वाब में दरार आयी, हमारा सुकून टूटा, हमारी खमोशी टूटी | दूसरी स्टेज काबू से बाहर होने लगी थी। तीन सौ सत्रह सेकंड बाद परवाज टूट गयी मेरी मेहनत और उम्मीद चौथी स्टेज को साथ लेकर तमाम मलबा हरिकोटा से 560 किलोमीटर दूर समुन्दर में जाकर गिरा | इस हादसे से हम सबको सख्त सदमा पहुचा, मै गमो गुस्से से भर गया | निचुड़ गया बिलकुल जिस्मानी तौर पर भी और जेहानी तौर पर भी मै सीधा अपने कमरे में गया और बिस्तर पर धंस गया |

मैंने अपने कंधे पर एक दिलासे का हाथ महसूस किया तो आँख खोली | दुपहर ढल चुकी थी शाम करीब थी | डा. ब्रह्म प्रकाश मेरे सिरहाने बैठे थे। उनकी इस हमदर्दी ने छू लिया मुझे, मै उदास था, मायूस था लेकिन अकेला नहीं था | हर शख्स तकनीकी जमातफरीकी और बहस मुबाहिसे के बाद मुतमईन हो चूका था लेकिन मुझे इत्मीनान ना आया | मै मुसलसल और बैचेन रहा, मै बेसाख्ता खड़ा हो गया और एतराफ किया प्रो. धवन के सामने "सर मेरे साथियो को नाकामयाबी की वजह दरयाफ्त हो जाने की वजह से इत्मीनान हो गया है लेकिन मै उसे काफी नहीं समझता, इस मिशन में डायरेक्टरेट की हैसियत से इस गलती को भी मैं अपनी जिम्मेवारी समझता हूँ | SLV 3 की नाकामयाबी की जिम्मेदारी मेरी है।

साईंस का काम कमाल दर्जा उत्साह भी देता है, ख़ुशी भी और उतनी गहरी मायूसी भी | इस तरह के वाक्यात सोच सोच के मै दिल को ढाढस देता रहा | ये ख्याल के इंसान चाँद पर उतर सकता है, ये सबसे पहले एक रुसी साइंटिस्ट ने सोचा था | उसे हकीकत बनाने में 40 साल गुज़र गए जब अमेरिका ने उसे पूरा किया | प्रोफ. चन्द्रशेखर ने चंद्रशेखर लिमिट का आविष्कार किया था 1930 में जब केम्ब्रिज में पढ रहे थे लेकिन पचास साल बाद उन्हें उसी डिस्कवरी पर नोबेल प्राईज़ मिला | अपनी सेटेल लांच वीहिकल से आदमी को चाँद पर उतारने से पहले कितनी सारी नाकामियों से गुज़रे होंगे | पहाड़ की चोटी पर उतरने से पहाड़ पर चढने का तजुर्बा नहीं मिलता। जिंदगी पहाड़ की चडानो पर मिलत हा चोटी पर नहीं चढानों पर ही तजुर्बे मिलते है और जिंदगी मंजती है और टेक्नोलोजी तरक्की करती है | चोटी पर पहुचने की कोशिश में ही चढानों का इल्म हासिल होता है। मैं एक एक कदम चलता रहा, चढता रहा चोटी की तरफ |

SLV 3 की उड़ान से 30 घंटा पहले 17 जुलाई 1980 के दिन अखबारों की सुर्खिया तरह तरह की राय और अंदाज से भरी हुई थी | ज़्यादातर रिपोर्टर ने पहली PSLV की याद दिलाई थी कि किस तरह रॉकेट फेल हो गया और उसका मलबा समुन्द्र में जा गिरा था | कुछ लोगो ने तो उसे देश की दूसरी खामियों का जिक्र करते हुए भी उसे SLV 3 से जोड़ दिया था | मै जानता था कि अगले दिन का नतीजा हमारे फ्यूचर के स्पेस प्रोग्राम का फैसला करने वाला है। मुख़्तसर ये कि सारे कौम की नज़रे हम पर गड़ी हुई थी। 18 जुलाई 1980 सुबह 8 बजकर तीन मिनट पर हिन्दुस्तान का पहला सेटेलाईट लांच व्हीकल उड़ा | मैने रोहिणी सेटेलाईट का तमाम डेटा कम्प्यूटर पर जांचा, अगले दो मिनट के अन्दर अन्दर रोहिणी अन्तरिक्ष में था | उस तमाम शोरगुल के बीच मैंने अपनी जिंदगी के सबसे अहम् अलफ़ाज़ अदा किये "मै मिशन डायरेक्टर बोल रहा हूँ, एक ज़रूरी खबर सुनने को तैयार रहो, चौथी स्टेज की कामयाबी के साथ रोहिणी सेटेलाईट को लेकर अन्तरिक्ष में दाखिल कर रही है"

ब्लाक से बाहर आया तो मेरे साथियों ने मुझे कंधो पर उठा लिया और नारे लगाते हुए जुलूस निकला | सारी कौम में एक जोश की लहर दौड़ गयी, हिन्दुस्तान उस चंद कौमो में शामिल हो गया था जिनके पास सेटेलाईट लांच की काबिलियत थी, हमारे कौम का एक बड़ा ख्वाब पूरा हुआ था, हमारे इतिहास का एक नया वाक्फ खुला, एक नया चेप्टर | प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने मुबारकबाद का तार भेजा और सबसे ज्यादा हिंस्दुस्तान के सायिन्स्दान खुश थे कि ये पूरी कोशिश स्वदेशी थी, हमारी अपनी थी।

मै कुछ मिले जुले जज़्बात से गुज़र रहा था, मै खुश था कि पिछली दो दहायियों से जिस कोशिश में था बिल आखिर उसमें कामयाब हुआ लेकिन उदास था | जिन लोगो की बदौलत मै यहाँ पंहुचा था वो लोग मेरे साथ नहीं थे मेरे अब्बा, मेरे बहोई जलालुदीन और प्रोफ. साराभाई |

SLV 3 की कामयाबी के महीने भर के अन्दर ही प्रोफ. धवन का फोन आया एक दिन और दिल्ली बुलाया प्रधान मंत्री से मिलने के लिए मेरी एक छोटी सी उलझन थी कपड़ो को लेकर हमेशा से ही बड़े आमियाना से कपडे पहनता हूँ और पांवो में चप्पल या स्लीपर्स कह लो । प्रधान मंत्री को मिलने जैसा वो लिबास नहीं था मेरे लिए तो नहीं, उनके एहतराम के लिए सुना तो प्रोफ. धवन बोले कपड़ो की फ़िक्र मत करो, तुमने जो शानदार कामयाबी पहन रखी है वो काफी है"

रिपब्लिक डे 1981 मेरे लिए एक बड़ी खुशखबरी लेकर आया कि मुझे पद्म भूषन से नवाज़ा गया है। मैंने अपने कमरे को बिस्मिल्लाह खान की शहनाई से भर लिया । शहनाई की गूँज मुझे कहीं और ही ले गयी, मै रामेश्वरम में पहुच गया | माँ के गले लगा, अब्बा ने मेरे बालो को उँगलियों से सहलाया और मेरा दोस्त मेरा रफीक जलालुदीन मस्जिद में मेरे इनाम का एलान कर रहा था | मेरी बहन जोहरा ने मीठा बनाया घर में | बक्शी लक्ष्मण शास्त्री ने मेरे माथे पर तिलक लगाया और फादर सोलोमन ने मेरे हाथ में सलीब लेकर दुआ पड़ी और प्रोफ. साराभाई को देखा। उनके चेहरे पर मुस्कराहट थी, फन था जो पौधा वो लगाकर गए थे अब पूरा पेड़ बन चूका था जिसके फल हिन्दुस्तान की अवाम तक पहुँच रहे थे ।

पहली जून 1982 को मैंने डिफेन्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरटरी DRDL की जिम्मेदारी संभाल ली | उस वक्त के डिफेन्स मिनिस्टर श्री आर वेंकटरमण ने जब मशविरा दिया कि बजाय दरजा व दरजा मिसाईल तैयार करने के हमें मुक्कमल अपनी मिसाईल तैयार करने का प्रोग्राम बनाना चाहिए तो हमें अपने कानो पर यकीन नहीं आया और देखते ही देखते वो प्रोजेक्ट बन जिसके नतीजे आईंदा बहुत दूर तक पहुचे | हर प्रोजेक्ट का नाम हिन्दुस्तान की खुद मुख्तारी, सेल्फ रिलायंस का सुबूत था | सरफेस टू सरफेस मिसाईल का नाम पृथ्वी रखा गया, टेक्टिकल कोर व्हीकल को त्रिशूल का नाम दिया गया, सरफेस तो एयर डिफेन्स सिस्टम आकाश कहलाया | एंटी टैंक मिसाईल के प्रोजेक्ट को नाग के नाम से पुकारा गया और मेरे देरीना ख्वाब रेक्स को यानि रिएक्स्पेरिमेंट लांच व्हीकल को मैंने अग्नि का नाम दिया |

मिसाईल टेक्नोलोजी का हुनर दुनिया की कुछ चुनी हुई कौमो के पास ही था, वो बड़े ताज्जुब से हमारी तरफ देख रहे थे कि हम क्या करने जा रहे हैं और कैसे करेंगे। हम एक मीटिंग में बैठे हुए अपने मकसद को पूरा करने के लिए 1984 की निशानदेही कर रहे थे जब डा. ब्रह्म प्रकाश की मौत की खबर आई। मेरे लिए तो वो एक और सदमा था। पहली SLV की नाकामयाबी के वक्त जिस तरह उन्होंने ढाढस दी थ मुझे, वो याद करके मैं और ज्यादा ग़मगीन हो गया। प्रोफ. साराभाई अगर VSSC के निर्माता थे, बनाने वाले थे तो प्रोफ. ब्रह्म प्रकाश उसके आमिल थे, एक्जिक्युटर थे | उनकी विनम्रता ने मुझे बड़ी हद तक नम्र कर दिया और मैने अपनी तुन्जमिजाजी पर काफी हद तक काबू कर लिया | उनकी हलीमी सिर्फ अपनी खूबियों तक ही महदूद नहीं थी बल्कि अपने से छोटो को इज्ज़त देना भी उनकी आदत में शामिल था। उनके बर्ताव और सुलूक में बात नज़र आ जाती थी कि कोई भी शख्स खामियों से खाली नहीं है। यहाँ तक कि अफसर भी, लीडर भी, रहनुमा भी, वो बहुत बड़े दानेशर थे, एक कमजोर शरीर के अन्दर उनमे बच्चों सी मासूमियत थी | मुझे हमेशा वो साईंसदानो में संत नज़र आते थे |

पृथ्वी का काम अपनी तकमील को पहुँच रहा था जब हम 1988 में दाखिल हुए। 25 फरवरी 1988 को सुबह 11 बजकर 23 मिनट पर पृथ्वी की पहली परवाज वाकिब हुई | हमारे मुल्क में वो एक ऐतिहासिक मौका था | पृथ्वी सिर्फ एक सरफेस टू सरफेस मिसाईल ही नहीं बल्कि आईदा आने वाली तमाम किस्म की मिसाईल का बुनियादी नक्शा भी था, फ्यूचर का मोड्यूल था वो | पृथ्वी ने हमारे आस पड़ोस के मुल्को को दहला दिया मगरबी यानी वेस्टर्न मुल्को को पहले तो हैरत हुई फिर गुस्से का इज़हार किया और पाबन्दी लगा दी इंडिया के लिए कि वो ऐसी कोई चीज़ बाहर के मुल्को से ना खरीद सके जो उनके मिसाईल प्रोग्राम में इस्तेमाल हो सकती हो या काम आ सकती हो। मिसाईल की ईजाद ने, हिन्दुस्तान की खुद मुख्तारी ने दुनिया के तमाम तरक्की याफ्ता मुल्को को परेशान कर दिया। अग्नि की टीम में 580 से ज्यादा साईसदान शामिल थे। अग्नि की परवाज 20 अप्रेल 1989 तय पायी गई |

लांच की तमाम तैयारियां मुक्कमल हो चुकी थी और फिर हिफाज़त के लिए ये फैसला किया गया था कि लांच के वक्त आस पास के तमाम गावं खाली करा दिए जाए। अखबार और मीडिया ने इस खबर को बहुत उछाला | 20 अप्रैल पहुचते पहुचते तमाम मुल्क की नज़रे हम पर टिकी हुई थी। दुसरे मुल्को का दबाव बड रहा था कि हम इस तजुर्बे को मुल्तवी कर दे या खारिज कर दे लेकिन सरकार मज़बूत दिवार की तरह हमारे पीछे खड़ी रही और किसी तरह हमें पीछे नहीं हटने दिया | परवाज़ से सिर्फ 14 सेकेण्ड पहले हमें कम्प्यूटर ने रुकने का इशारा किया। किसी एक पुर्जे में कोई खामी थी, वो फ़ौरन ठीक कर दी गयी | लेकिन उसी वक्त डाउन रे स्टेशन ने रुकने का हुक्म दिया | चंद सेकेंड्स में कई रूकावटे सामने आ गयी, अब परवाज़ मुल्तवी कर दी गयी । अखबारात ने आस्तीने चढ़ा ली | हर बयानात में अपनी अपनी तरह की वजूहात निकाल ली | कार्टूनिस्ट सुधीर लाल ने एक कार्टून शाया किया जिसमे एक खरीददार कुछ सामान दुकानदार को वापिस करते हुए कह रहा था " अग्नि की तरह वो भी नहीं चली" एक कार्टून में दिखाया गया कि साईंसदान कह रहा है" सब ठीक था, स्विच बटन नहीं चला"

हिन्दुस्तान टाईम्स के एक कार्टून में एक नेता रिपोर्टर को समझा रहा था " डरने की कोई बात नहीं, ये बड़ी अमन पसंद अहिंसा की मिसाईल है जिससे कोई मरेगा नहीं" करीब दस रोज़ दिन रात काम चला मिसाईल की दुरुस्ती पर और आखिरकार साईंसदानो ने एक नयी तारीख तय की अग्नि की परवाज़ के लिए मगर फिर वही हुआ | 10 सेकेंड्स पहले कम्प्यूटर ने रुकावट का इशारा किया, पता चला कि एक पुर्जा काम नहीं कर रहा है। परवाज़ फिर मुल्तवी कर दी गयी ऐसी बात किसी भी साईस तजुर्बे में होना आम बात थी, गैर मुल्को में भी बहुत बार होता है लेकिन उम्मीद से भरी हुई कौम हमारी मुश्किल समझने को तैयार नहीं थी। हिन्दू अख़बार में केशव का एक कार्टून छपा जिसमे एक देहाती कुछ नोट गिनते वलत कह रहा था " मिसाईल के वक्त गाँव से हट जाने का मुवावजा मिला है, दो चार बार और तजुर्बा मुल्तवी हुआ तो फिर पक्का घर बनवा लूंगा | अमूल बटर ने अपने होर्डिंग पर लिखा कि "अग्नि को ईंधन के लिए हमारे बटर की ज़रूरत है।

अग्नि की मरम्मत का काम जारी रहा। आखिरकार एक बार फिर 22 मई की तारीख अग्नि की परवाज़ के लिए तय पायी | उसकी पिछली रात डा. अरुणाचलम, जर्नल के. एन. सिंह और मे डिफेन्स मिनिस्टर के. सी. पन्त के साथ चहलकदमी कर रहे थे। पूरे चाँद की रात थी, हाई टाईड का वक्त था और लहरे गरज गरज कर ख़ुदा की अजबल का नाम ले रही थी। कल अग्नि की परवाज कामयाब होगी कि नहीं बार बार यही सवाल हमारे दिमाग में गूँज रहा था |

डिफेंस मिनिस्टर ने एक लम्बी ख़ामोशी को तोड़ते हुए पूछा " कलाम कल अग्नि की कामयाबी मनाने के लिए क्या चाहते हो तुम?" मै क्या चाहता था ? क्या था जो नहीं था मेरे पास ? अपनी ख़ुशी के इज़हार के लिए मुझे क्या करना चाहिए ? और अचानक मुझे जवाब मिल गया । "हम एक लाख पेड़ो की कोंपले लगायेंगे" मैंने कहा और उनके चेहरे पर रौनक आ गयी "तुम अपनी अग्नि के लिए धरती माँ का आशीर्वाद चाहते हो" वे बोले, कल यही होगा" उन्होंने पेशनगोई की | अगले दिन सुबह 7 बजकर 10 मिनट पर अग्नि लांच हुई। कदम कदम सही निकला, मिसाईल ने जैसे टेक्स बुक याद कर ली हो, जैसे सबक याद कर लिया था | हर सवाल का सही जवाब मिल रहा था। लगता था जैसे एक लम्बे खौफनाक ख्वाब के बाद एक खूबसूरत सुबह ने आँख खोली हो ।

पांच साल की मशक्कत के बाद हम इस लांच पेड पर पहुचे थे | इसके पीछे पांच लम्बे सालो की नाकामी, कोशिशे, और इम्तिहान खडे थे । इस कोशिश को रोक देने के लिए हिन्दुस्तान ने हर तरह के दबाव बर्दाश्त किये थे। लेकिन हमने कर दिखाया जो करना था | मेरी जिंदगी का सबसे कीमती लम्हा था वो मुट्ठीभर सेकेंड्स | 600 सेकेंड्स की वो परवाज़ जिसने हमारी बरसो की थकान दूर कर दी, बरसो की मेहनत को कामयाबी का तिलक लगाया | उस रात मैंने अपनी डायरी में लिखा " अग्नि को इस नज़र से मत देखो, ये सिर्फ ऊपर उठने का साधन नहीं है, ना शक्ति की नुमाईश है, अग्नि एक लौ है जो हर हिन्दुस्तानी के दिल में जल रही है। इसे सिर्फ एक मिसाईल मत समझो, ये कौम के माथे पर चमकता हुआ आग का एक सुनहरी तिलक है"।

1990 के रिपब्लिक डे पर देश ने अग्नि व् मिसाईल प्रोग्राम की कामयाबी का जश्न मनाया | मुझे पद्म विभूषण से नवाज़ा गया और डा. अरुणाचलम को भी । दस साल पहले पद्म भूषन की यादे एक बार फिर हरी हो गयी | रहन-सहन अभी भी मेरा वैसा ही था जैसा तब था |

10 बाय 12 का एक कमरा किताबो से भरा हुआ और कुछ ज़रूरत का फर्नीचर जो किराए पर लिया था | फर्क इतना ही था कि तब ये कमरा त्रिवेंद्रम में था अब हैदराबाद में वेटर मेरा नाश्ता लेकर आया, इडली और छांछ और आँखों में एक खामोश मुस्कुराहट मुबारकबाद की मै अपने हम वतनो की इस नवाजिश से छलक गया | मै जानता हूँ कि बहुत से साइंसदान और इंजीनियर मौका मिलते ही वतन छोड़कर दुसरे देशो में चले जाते है ज्यादा रुपया कमाने के लिए, ज्यादा आमदनी के लिए लेकिन ये आदर, इज्जत और मुहब्बत क्या कमा सकते है जो उन्हें अपने वतन से मिलती है ।

15 अक्टूबर 1991 को मै 60 साल का हो गया | मुझे अपनी रिटायरमेंट का इंतज़ार था, चाहता था कि गरीब बच्चो के लिए एक स्कूल खोलू | ये वो दिन थे जब मैंने सोचा कि अपनी जिंदगी के तजुर्बे, मुसाहिदे और वो तमाम बाते कलमबंद करूँ जो दुसरो के काम आ सके | एक तरह से अपनी उमरी लिखू, अपनी जीवनी | मेरे ख्याल से मेरे वतन के नौजवानों को एक साफ़ नज़रिए और एक दिशा की ज़रुरत है तभी ये इरादा किया कि उन तमाम लोगो का जिक्र करूँ जिनकी बदौलत मै ये बन सका जो मै हूँ | मकसद ये नहीं था कि मैं बड़े बड़े लोगो के नाम लूँ बल्कि ये कि कोई भी शख्स कितना भी छोटा क्यों ना हो उसे हौसला नहीं छोड़ना चाहिए |

मसले, मुश्किलें जिंदगी का हिस्सा है और तकलीफे कामयाबी की सच्चाई | जैसा कहा है किसी ने कि" खुदा ने ये वादा नहीं किया कि आसमान हमेशा नीला ही रहेगा, जिंदगी भर फूलों से भरी राहे ही मिलेंगी, खुदा ने ये वादा नहीं किया कि सूरज है तो बादल नहीं होंगे, ख़ुशी है तो गम नहीं, सुकून है तो दर्द नहीं होगा | मुझे ऐसा कोई गुमान नहीं कि मेरी जिंदगी सबके लिए एक मिसाल बने मगर ये हो सकता है कि कोई मायूस बच्चा किसी गुमनाम सी जगह पर जो समाज के किसी माजूर से हिस्से से ताल्लुक रखता हो, ये पढ़े और उसे चैन मिले, ये पढ़े और उसकी उम्मीद रोशन हो जाए । हो सकता है कि ये कुछ बच्चो को नाउम्मीदी से बाहर ले आये और जिसे वो मजबूरी समझते है वो मजबूरी ना लगे | उन्हें यकीन रहे कि वो जहाँ भी है, खुदा उनके साथ है | काश हर हिन्दुस्तानी के दिल में जलती हुई लौ को पर लग जाए और उस लौ की परवाज़ से सारा आसमाँ रोशन हो जाए ।

Elon Musk Biography In Hindi.      Read Now 



thumbnail

Elon Musk- Biography in Hindi। दुनिया के सबसे अमीर इंसान की कहानी


Buy Now

 


Elon Musk- Biography in Hindi।

दुनिया के सबसे अमीर इंसान की कहानी

About This Post 

स्पेस एक्स और टेस्ला के को-फाउंडर एलन मस्क का नाम भला किसने नहीं सुना होगा. उनकी एक्स्ट्रा ओर्डीनेरी पर्सनेलिटी ने करोडो लोगो को इंस्पायर किया है और आज भी कर रहे है. उनकी बायोग्राफिकल बुक है एलन जो हमे उनकी लार्जेर देन लाइफ पर्सनेलिटी की झलक दिखाती है. इस बुक के थ्रू हमे उनकी लाइफ के स्ट्रगल, अचीवमेंट्स और गोल्स के बारे में जानने का मौका मिलता है. ये बुक काफी इंस्पिरेशनल है खासकर उन लोगो के लिए जो कभी हार नहीं मानते.


1. इस बुक से हम क्या सीखेंगे?


एक जीनियस बच्चा जिसका बचपन बड़े स्ट्रगल में गुज़रा, जो बचपन से ही राकेट बनाने का सपना देखता था और इसी सपने को पूरा करने के वो साऊथ अफ्रीका से यूनाइटेड स्टेट्स आया. एलन मस्क वो जीनियस था जो ना सिर्फ टेक्नोलोजिकल इनोवेशसं का एक्सपर्ट था बल्कि उसे इस दुनिया को बचाने की भी उतनी ही परवाह थी इसीलिए तो उसके माइंड में इलेक्टिकल कार और स्पेसशिप बनाने का आईडिया आया. एलन मस्क की ये बुक उनके चाहने वालो के लिए एक गिफ्ट की तरह है जिसके थ्रू उन्हें इस महान इनोवेटर की लाइफ के कई अनजाने पहलुओ को जानने का मौका मिलेगा.

2. ये बुक किस किसको पढनी चाहिए?


हर वो इंसान जो एलन मस्क की मैजिकल और इंस्पायरिंग स्टोरी जानने में इंट्रेस्टेड है, स्पेशली एंटरप्रेन्योर्स इस बुक से काफी कुछ लर्न कर सकते हैं, एलन मस्क ने कभी गिव अप नहीं किया और हर ग्रेट एंटरप्रेन्योर में यही क्वालिटी होती है.

3. इस बुक के ऑथर कौन है

राइटर एश्ली वांस ने एलन मस्क की बायोग्राफी' एलन मस्क, टेस्ला, स्पेस एक्स एंड क्वेस्ट फॉर अ फेंटास्टिक फ्यूचर " लिखी है. एश्ली वांस एक अमेरिकन बिजनेस कोलमनिस्ट और ऑथर है जिन्होंने कई सारी बुक्स लिखी है लेकिन एलन मस्क पर लिखी उनकी बायोग्राफी सबसे ज्यादा पोपुलर बुक्स में से एक है. 2015 में उन्होंने ब्लूम बर्ग के लिए एक वीडियो सीरीज हेल्लो वर्ल्ड राईट और होस्ट करनी शुरू की थी.

आध्याय 1-एलन की दुनिया 

साल 2000 में सिलिकोन वैली और सेन फ्रेंसिस्को डिप्रेशन में डूबे हुए थे क्योंकि इन्टरनेट का नशा उतरने लगा था। अब जमाना डॉट कॉम का था जिसके चलते वेंचर कैपिटलिस्ट किसी भी इन्वेस्ट में पैसा लगाने से कतरा रहे थे। इस दौर में सिलिकोन वैली के पास सिर्फ एक क्लीक एड्स का काम ही बचा था। ट्विटर और फेसबुक ने अभी-अभी पैर पसारने शुरू किये थे। कुछ लोगो का मानना था कि टेक्नोलोजी इंडस्ट्री अब ठंडी पड़ चुकी है।

एलन मस्क भी इसी डॉट कॉम मेनिया का एक हिस्सा थे। अपनी कॉलेज की पढ़ाई खत्म करने के बाद उन्होंने ज़िप 2 बनाया और $22 मिलियन कमाए । ज़िप 2 गूगल मैप्स की ही तरह का एक सॉफ्टवेयर था। कॉमपेक ने ज़िप 2 को 1999 में खरीदा था। मस्क ने इस कमाई को एक और स्टार्ट-अप X.com खोलने के लिए इन्वेस्ट किया जो बाद में पे-पाल बना। और फिर जब 2002 में ई-बे ने पे-पाल (Pay Pal) खरीदा तो मस्क पहले से ज्यादा अमीर हो गए।

मस्क सिलिकोन वैली के बजाए लॉस एंजेल्स में रहने चले गए थे, जहाँ पर उन्होंने टेस्ला, स्पेस एक्स और सोलर सिटी बनाई। उनकी कंपनीज़ ELECTRIC CARS, एरोस्पेस और सोलर इंडस्ट्रीज में लीड करती है। राकेट, इलेक्ट्रिक कार और सोलर पैनल बनाकर मस्क ने फ्यूचर को बदल कर रख दिया। एलन की दुनिया में रियलिटी और साइंस फिक्शन मिलकर एक हो गए है।

एलन मस्क बाकी टेक्नोलोजी मिलेनियर से हटकर है। उनका सोच विश्वव्यापी है। मस्क कहते है" अगर हम कभी ना खत्म होने वाली वाली एनर्जी का हल ढूंढ ले और मल्टी प्लानेटेरी स्पीसीज़ बनने की राह में तरक्की कर ले । तो ये वाकई में बहुत बढ़िया बात होगी" । आज मस्क कंपनी मे हज़ारो लोग काम करते है जिसका नेट वर्थ $10 बिलियन है।

अध्याय 2 अफ्रीका


मस्क के नाना जोशुआ हेल्डीमेन केनेडा से साउथ अफ्रीका तक खुद का जहाज उड़ाया करते थे। वे माइग्रेट होने के बाद अपने पूरे परिवार सहित हमेशा के लिए प्रेटोरिया में सेटल हो गए थे मगर कभी-कभी वे लोग नोर्वे, स्कॉट और आस्ट्रेलिया जाया करते थे।

मेये हेल्डीमेन (Maye Haldeman) और एरोल मस्क बचपन से ही एक दुसरे को चाहते थे। जब वे बड़े हुए तो दोनों ने शादी कर ली और उसके बाद जल्द ही एलन का जन्म हुआ। मस्क 28 जून, 1971 को पैदा हुए थे। उनके पिता एरोल मस्क एक सक्सेसफुल इंजीनियर थे वहीं माँ मेये (Maye) एक डाइटीशिएन थी। एलन के अलावा उनके दो बच्चे और थे, किम्बल और टोस्का।

एलन अभी सिर्फ 5 साल के ही थे जब उनकी काबिलियत दिखने लगी थी वे घंटो किताबो में डूबे रहते। “द लार्ड ऑफ़ द रिंग्स" और "द हिचहाइकर "स गाइड to गेलेक्सी' उनकी पसंदीदा किताबे थी। उनके पास एनसाइक्लोपीडीयया के दो बड़े सेट रखे थे जिन्हें वो तब पढ़ते जब पढने के लिए किताबे ख़त्म हो जाती थी मस्क परिवार एक खुशहाल परिवार था। प्रेटोरिया में उनके पास बहुत बड़ा घर था। मगर एलन जब आठ साल के हुए तो उनके माँ-बाप का तलाक हो गया था। वे और उनके भाई किम्बल अपने पिता के साथ रहने लगे। उनके पिता खुशमिजाज़ नहीं थे इसलिए एलन को कभी भी अपना बचपन खुशहाल नहीं लगा।

एलन जब 10 साल के थे जब उन्होंने पहली बार कंप्यूटर देखा। वे इसे देखकर इतने हैरान हुए कि उन्होंने अपने पिता से अपने लिए एक कंप्यूटर खरीदने की जिद की। और जब उनके पिता उनके लिए कंप्यूटर लेकर आये तो पूरे तीन दिनों में ELON ने बेसिक प्रोग्रमिंग सीख ली एलन अपने भाई किम्बल और कज़न पीटर, लेंडन और रस रिवे के बेहद करीब थे वे उनके साथ मिलकर होम मेड राकेट और एक्सप्लोसिव बनाया करते थे। उन सबको एक साथ लंबी ट्रेन ट्रिप्स पे जाना और डनजियंस और ड्रेगन्स खेलना भी बहुत पसंद था पर जब एलन स्कूल जाने लगे तो वहां उन्हें कुछ अलग ही अनुभव हुए। स्कूल में उन्हें अक्सर बुल्ली किया जाता था। एक बार उनके साथ ऐसा दर्दनाक हादसा हुआ जिससे उन्हें गहरा सदमा लगा एलन सीडीयों पर बैठे कुछ खा रहे थे जब एक लडके ने उन्हें पीछे से सर पर लात मारी और एक जोर का धक्का दिया। इस धक्के से एलन सीडीयों से गिर पड़े। उसके बाद उस लड़के ने उन पर मुक्को की बरसात शुरू कर दी। उन्हें इतनी चोट आई कि तुरंत उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा। खून से उनका बदन सन गया था। उन्हें पूरी तरह ठीक होने में पूरा एक हफ्ता लगा और उसके बाद ही वे स्कूल जाने लायक हुए। पूरे चार सालो तक एलन उसी खौफ के साए में जीते रहे। स्कूल का वो बदमाश गेंग बेवजह ही एलन को हर वक्त परेशान किया करता था। आखिरकार उन्होंने उन्हें अपना स्कूल बदलना पड़ा।

जब एलन 17 साल के हुए तो उन्होने साउथ अफ्रीका छोड़ कर जाने का मन बनाया। उन्हें लगता था कि अमेरिका में उन्हें अपने लिए बेहतर मौके मिल सकते है। साथ ही उन्हें सिलिकोन वैली भी पसंद थी जब उनके परिवार को केनेडा की सिटीजनशिप मिली तो एलन को निकल भागने का एक मौका मिल गया था।

अध्याय 3 केनेडा


केनेडा में अपने शुरुवाती दिनों में मस्क को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा जब वे घर से केनेडा जाने के लिए निकले तो उनके पास वहां रहने का कोई ठिकाना नहीं था। उन्होंने वहां अपने कुछ रिश्तेदारों को खोजा और किसी तरह रहने का बंदोबस्त किया। अपना 18वा जन्मदिन उन्होंने कुछ पड़ोसियों और रिश्तेदारों के साथ मनाया जिन्हें वे ठीक से जानते तक नहीं थे। इस दौरान मस्क ने कुछ ओड जॉब्स भी की जैसे कि सब्जिया वगैरह ले आना और लकडियाँ काटना। उनके भाई किम्बल भी बाद में उनके पास केनेडा आ गए।

साल 1989 में मस्क ने क्वीन्स युनिवेर्सिटी ओंटारियो (Queen's University Ontario) में दाखिला लिया जहाँ पर उनकी मुलाकात अपनी पहली पत्नी जस्टिन विल्सन से हुई पहली डेट के लिए जस्टिन ने उन्हें बहुत तरसाया था मगर मस्क भी कम जिद्दी नहीं थे। जस्टिन ने बाद में कहा कि " वो किसी को भी अपना दीवाना बना सकते है" ।

कॉलेज की पढ़ाई ने मस्क की जिंदगी में बहुत से बदलाव लाए। वे अभी भी स्पेस और एनर्जी की बाते किया करते थे जिसका उनके क्लासमेट मज़ाक उड़ाया करते। मस्क उन लोगो से मिले जिनसे उनके विचार मिलते थे। अपने खाली वक्त में वे कंप्यूटर ठीक किया करते जिससे उनकी कुछ एक्स्ट्रा कमाई हो जाती। वे अपने क्लास मेट्स को स्पेयर पार्ट भी बेचा करते थे।

दो साल बाद मस्क को स्कोलरशिप मिली। उन्होंने युनिवेर्सिटी ऑफ़ पेनेसिलेवेनिया से अपनी पढ़ाई जारी रखी वहां उन्होंने इकोनोमिक्स और फिजिक्स दोनों की पढाई की। पेनसिल्वेनिया युनिवेर्सिटी में मस्क लंच के दौरान अपने दोस्तों से फिजिक्स पर डिसकसन किया करते। उन्होंने और उनके खास दोस्त ने मिलकर एक घर किराए पर लिया। इस घर में वे वाइल्ड पार्टीज़ रखते और जो लोग पार्टी में आते उनसे $5 पर हेड के हिसाब पैसा वसूलते। मस्क अपनी क्लास के लिए कई दिलचस्प बिजनेस आडियाज़ भी सोचा करते उनका ऐसा ही एक आइडिया था" द इम्पोर्टेंस ऑफ़ बीइंग सोलर" यानी सोलर पॉवर का महत्त्व। उन्होंने दावा किया कि आने वाले समय में सोलर पॉवर टेक्नोलोजी के फील्ड में तेजी आएगी और बड़े-बड़े सोलर प्लांट सिस्टम लगाए जायेंगे। उन्होंने सोलर सेल्स और ऐसे कम्पाउंड के बारे में बताया जो पॉवर को ज्यादा से ज्यादा बड़ा सकते है। उन्होंने अल्ट्रा- केपेसिटर्स के बारे में भी एक पेपर लिखा था जिसमे बताया गया कि ये एक प्रकार की बेट्री सेल्स है जो बड़ी तादाद में एनेर्जी स्टोर कर सकती है। इन्हें रीचार्ज किया जा सकता है। और बाकी केपेसिटर्स के मुकाबले थे 100 गुना ज्यादा पॉवर दे सकती है। मस्क ने तभी इलेक्ट्रिक कार और रॉकेट्स के बारे में सोच लिया था।

उनके प्रोफेसर्स ने उनके इस लाजवाब एनालिसिस की तारीफ की थी। मस्क हर तरह की मुश्किल से मुश्किल फिजिक्स कॉन्सेप्ट्स का हल ढूंढ लेते थे। उन्हें ये भी मालूम होता था कि इससे अच्छा प्रॉफिट कैसे कमाया जाता है। कॉलेज खत्म होने के बाद उनके दिमाग में पहले वीडियोगेम्स बनाने का ख्याल आया। मगर मस्क अपने लिए एक ऐसा करियर चाहते थे जिससे वे पूरी दुनिया में एक बड़ा बदलाव ला सके।

वे अक्सर स्पेस, रीन्युयेब्ल एनर्जी और इन्टरनेट के सपने देखा करते थे। उन्हें यकीन था कि आने वाला कल इन्ही का होगा। भविष्य में एक बड़ा बदलाव आने वाला था और इसी में उनको प्रॉफिट दिख रहा था। सिलिकोन वैली फ़ोटोज़ शेयर करने में बीजी था और मस्क दुनिया को विनाश से बचाने की तैयारी कर रहे थे ।

अध्याय 4  एलन का पहला स्टार्ट-अप 


साल 1994 में किम्बल और एलन ने कई रोड ट्रिप्स साथ की। उन दोनों के दिमाग में इन्टरनेट के बिजनेस का आडिया था। फिर आखिरकार मस्क सिलिकोन वैली में बतौर इंटर्न काम करने लगे और जब उन्होंने स्कूल खत्म किया तो किम्बल के साथ मिलकर उन्होंने अपनी कम्पनी स्टार्ट की ज़िप 2 येल्लो पेजेस (yellow pages) का ऑनलाइन वेर्जन है। इसमें सभी बिजनेस एस्टब्लीशमेंट के मेप और उनकी जानकारी दी हुई है। एलन इसके लिए वेबसाइट कोडिंग करते थे और किम्बल उन साइट्स को बेचने का । किम्बल डोर-टू-डोर सेल किया करते थे। मगर ज्यादातर बिजनेसमेन को पता नहीं था कि ज़िप 2 आखिर है क्या? उन्हें कपनी कंपनी के लिए इन्वेस्टर ढूँढने में बहुत मशक्कत करनी पड़ी। आखिरकार एक Investor ने उनके काम में रूचि ली और $3 मिलियन का इन्वेस्ट किया।

ज़िप 2 ने न्यूजपेपर क्लासीफाइड एड देने शुरू किये। हालांकि कंपनी चल पड़ी और तरक्की करने लगी मगर एलन को मेनेजमेंट से निकाल दिया गया। वे अब चीफ टेक्नीकल ऑफिसर थे। ज़िप 2 का अब एक बड़ा सा ऑफिस था और कंपनी ने कोड्स की क्वालिटी बेहतर बनाने के लिए कई प्रोग्रामर्स भी रख लिए थे। साल 1998 में $300 मिलियन की डील के साथ zip-2 सिटी-सर्च के साथ मर्ज हो गयी जो कि पहले उनकी कम्पटीटर थी।

मस्क बर्दस का डॉट कॉम का आइडिया एक हकीकत में तब बदला जब 1999 में कॉम्पैक ने ज़िप-2 को खरीदा। मगर सब कुछ आसान नहीं था। एलन मस्क सीईओ बनना चाहते थे।

पे-पाल माफिया बॉस 
एक दशक बाद मस्क केनेडियन बैकपेकर से एक मल्टी मिलेनियर बन चुके थे वो भी सिर्फ 27 साल में वे कुल मिलाकर $ 22 मिलियन के मालिक थे। उनके पास अब एक बड़ा सा अपार्टमेंट, एक प्लेन और सपोर्ट कार थी। मस्क अपनी McLaren F7 में सिलिकोन वैली के चक्कर काटा करते।

जब वे इंटर्न कर रहे थे उनके दिमाग में इन्टरनेट बैंकिंग का ख्याल आया। उन्होंने इस बारे में अपने सीनियर्स के साथ डिस्कस किया मगर उन्हें ये आइडिया जमा नहीं। ये 1990 का वक्त था, लोग उन दिनों ऑनलाइन किताबे खरीदने से कतराते थे क्योंकि कोई भी अपना क्रेडिट कार्ड नंबर इन्टरनेट पर नहीं देना चाहता था। मस्क फिर भी अपने ऑनलाइन बैंक के आइडिया पर डटे रहे। अपने इस नए प्रोजेक्ट पर उन्होंने $12 मिलियन इन्वेस्ट किये। उन्होंने इस ऑनलाइन बैंकिंग साइट का नाम एक्स।कॉम (X.COM) रखा। उनके एक को-फाउन्डर ने कहा" यही वो खूबी है जो एलन को बाकियों से अलग करती है"। वे रिस्क लेकर अपनी जिम्मेदारी पर इतनी बड़ी रकम लगा रहे है और इस तरह की डील फायदा भी दे सकती है या फिर कंगाल भी कर सकती है। जिप-2 एक साफ-सुथरा सा प्रेक्टिल आइडिया था मगर X कॉम ने तो बैंकिंग इंडस्ट्री को बदल कर रख दिया। मस्क इस बिजनेस में सिर्फ अपने PASSION को लेकर उतरे थे। उन्हें लगता था कि बैंकर्स का तरीका बिलकुल गलत है। और वे उनसे बेहतर कुछ कर सकते है।

मस्क ने ज़िप 2 को एक फायदेमदं इन्वेस्ट के रूप में केपेटीलिस्ट के सामने पेश किया। लोगो को इसके बारे में यकीन दिलाने के लिए उन्होंने पॉवरफुल स्पीच दी और इंजीनियर्स को अपने साथ काम करने के लिए एनकरेज किया। एक्स.कॉम अब जायज रूप से फिनेंस सर्विस कंपनी बन गयी। इसमें बैंकिंग लाइसेस, म्यूचल फंड लाइसेंस और ऍफ़डीआइसी इंश्योरेंस (FDIC insurance) जैसी सुविधाए मौजूद थी। नवम्बर 1999 में साइट इन्टरनेट पर लाइव हुई मस्क उस दिन अपने ऑफिस में पूरे 48 घंटे तक रहे क्योंकि वे चीजों को अपने सामने ही स्मूदली चलते हुए देखना चाहते थे।

एक्स.कॉम ने एक क्रांतिकारी पेमेंट ईजाद किया जिसे पे-पाल नाम दिया गया। इसमें किसी को पैसे भेजने के लिए सिर्फ उसका ई-मेल एड्रेस ही काफी था। कुछ महीनों के अन्दर ही पे पाल को 200,000 क्लाइंट्स मिल गए। पैसे के लेन-देन का ये बड़ा आसान तरीका था जबकि Banks इसी प्रोसेस में कई दिन लगा देते थे। मार्च 2000 में एक्स।कॉम अपने कॉम्पीटीटर कोनफिनिटी के साथ मर्ज हो गयी। मस्क के पास अभी भी कंपनी के ज़्यादातर शेयर थे और कंपनी का नाम भी नहीं बदला गया। मगर फिर एक्स कॉम और कोनफिनिटी की अनबन होने लगी जिसकी वजह थी दोनों का अलग कल्चर और डीसीजन मेकिंग। Employees के एक ग्रुप ने मस्क को कंपनी से बाहर करने की प्लानिंग की। मस्क के बदले वे कोनफ़िनीटी के पीटर थियेल को सीईओ बनाना चाहते थे।

इस दौरान मस्क अपनी पत्नी जस्टिन के साथ हनीमून मना रहे थे। उन्हें जब इस बात का पता लगा तो उन्होंने कम्पनी को अपने फैसले पर दुबारा सोच-विचार करने की गुजारिश की। मगर तब तक बात हाथो से निकल चुकी थी। उन्हें पता चला कि कंपनी ने अपना फैसला ले चुकी थी। मस्क उस कंपनी में अपनी पॉवर खो बैठे थे जिसे उन्होंने ही शुरू किया था।

जून 2001 में एक्स.कॉम पे पाल के नाम से री-ब्रांड की गई। कंपनी एडवाइज़र के तौर पर मस्क की नौकरी सीक्योर थी। उन्होंने और पैसा इन्वेस्ट किया अपना स्टेक बडाकर वे पे-पाल के सबसे बड़े स्टेक होल्डर बन गए। इस वक्त तक उनका डॉट कॉम का बुखार अब उतरने लगा था। बाकी टेक कंपनीज बेचने की जल्दबाजी में लगी थी।

मस्क ने बोर्ड को offers ठुकराने के लिए मना लिया था। पे-पाल का एनुबल रेवेन्यू बड़कर $240 मिलियन हो चूका था। अब ये अपने पैरो पर मजबूती से खड़ी कंपनी बन चुकी थी जो अब पब्लिक हो सकती थी। और तभी 2002 में पे-पाल को ई-बे से $715 बिलियन का ऑफर मिला। ये एक बहुत बड़ा और शानदार ऑफर था। टैक्स काटने के बाद भी मस्क पूरे $180 मिलियन अपने पास रख सकते थे। पे-पाल डॉट कॉम बबल से बच निकला था। ये सब मस्क की बिजनेस इंस्टिंक्ट और टेक्नोलोजी ट्रेंड में उनकी कुशलता का नतीजा था। 19/11 के हमले के बावजूद कंपनी ने एक सक्सेसफुल आईपीओ (IPO) बनाया। भले ही टेक्नोलोजी इंडस्ट्री डाउन हो गयी मगर पे-पाल एक विनर बनकर उभरा।

अध्याय 5 स्पेस में चूहा 

जून 2001 में एलन मस्क जब अपने तीसवे साल में थे, वे और उनकी पत्नी सिलिकोन वैली छोड़कर लोस एंजेल्स शिफ्ट हो गए। उनका बनाया पे-पाल एक सफल प्रोजेक्ट रहा था। अब वे अपने सपने स्पेस ट्रेवल और राकेट शिप्स पर ध्यान दे सकते थे, और इसके लिए लोस एंजेल्स से बढ़कर कोई और बढ़िया जगह नहीं थी क्योंकि वहां का मौसम एरोनोटिक्स के लिहाज़ से अच्छा था। मस्क ने अपने जैसे ही कुछ लोग ढूंढ लिए। उन्होंने मार्स सोसाइटी नाम का एक ग्रुप भी ज्वाइन कर लिया था जो मार्स पर जीवन की संभावना तलाश रहा था। ट्रांसलाइफ नाम से इस ग्रुप का एक प्रोजेक्ट भी था ये एक कैप्सूल के आकार का बनने वाला था जो अर्थ के चक्कर लागाये। और इसके क्र्यू मेम्बर चूहे बनने वाले थे। मस्क ने $500,000 मार्स सोसाइटी और इसके प्रोजेक्ट के लिए दिए। उन्होंने सुझाव रखा कि ट्रांसलाइफ मिशन को मार्स तक ही एक्सटेंड करना चाहिए। एक दिन मस्क नासा की वेबसाईट ब्राउस कर रहे थे। उन्हें गहरी निराशा हुई क्योंकि मार्स एक्सप्लोरेशन का कहीं पर भी कोई एक्जेट शेड्यूल या पुख्ता प्लान नहीं दिया गया था।

मस्क ने एरोस्पेस पर कई किताबे पढ़ी। उन्होंने राकेटशिप को प्लान करने के लिए टेलेंटेड इंजीनियर्स को अपने साथ काम पर रखा। उन्होंने कम बजट वाले रॉकेट्स का परफोर्मेंस स्टडी किया उस वक्त के रॉकेट्स सिर्फ रसियन बनाते थे। बोईंग और लॉक हील बहुत ज्यादा महंगे थे और बड़े से बड़े सेटेलाइट्स उठा सकते थे। मस्क इनसे कुछ सस्ते रॉकेट्स बनाना चाहते थे जो रिसर्च और कमर्शियल इस्तेमाल के लायक हो । जब ई-बे ने पे-पाल खरीदा था तो मस्क ने इस डील से सौ मिलियन डॉलर की कमाई की थी। उन्होंने ये पैसा मार्स के लिए राकेट शिप बनाने में लगा दिया। जून 2002 में स्पेस एक्सप्लोरेशन टेक्नोलोजी बनाई गई। इसमें मस्क के साथ मार्स सोसाइटी के मेम्बर और लोस एंजेल्स के वे लोग भी जुड़े जो स्पेस एन्थ्युपास्टिक थे।

स्पेस एक्स (Space X) को लेकर मस्क बहुत एक्साइटेड थे। हालांकि इस दौरान उनके परिवार में एक दुखद घटना घट गयी। उनकी पत्नी जस्टिन ने एक बेटे को जन्म दिया था जिसका नाम नेवेडा एलेक्जेंडर मस्क रखा गया था। लेकिन 10 दिन के अंदर ही वो बच्चा चल बसा।

हुआ यूँ कि एक रात एलन और जस्टिन ने बच्चे को बिस्तर पर सुलाया। नेवेडा गहरी नीद में पीठ के बल सो गया था। जब कुछ देर बाद उसके पेरेन्टस उसे देखने गए तो उन्होंने पाया कि उसकी सांसे नहीं चल रही थी। डॉक्टरर्स इसे सडन इन्फेंट डेथ सिंड्रोम (sudden infant death syndrome) कहते है।

जब तक पेरामेडिक्स बुलाये गए दिमागी रूप से बच्चे की मौत हो चुकी थी उसके दिमाग में ऑक्सीजन की सप्लाई नहीं पहुँच पाई थी। उसे तीन दिन तक लाइफ सपोर्ट पर रखा गया। बच्चा जब मरा तो जस्टिन ने उसे अपनी बांहों में पकड़ रखा था। वो बुरी तरह रो रही थी। मगर एलन मस्क ने कहा कि वो इस बारे में कुछ नहीं कहना चाहते है।

जस्टिन को लगता था कि ये एलन मस्क का डिफेन्स मेकेनिस्म का तरीका है। जिसे उन्होंने बचपन से ही सीख लिया था। उसने कहा कि एलन सदमे में नहीं रह सकते। उनकी फितरत ही आगे बढ़ने की है। और मुझे लगता है कि ये ही उनके सरवाइव करने का तरीका है"। मस्क ने अपना सारा ध्यान स्पेस एक्स के राकेट लौंच में लगा दिया।

अगले 5 सालो में जस्टिन जुड़वाँ बच्चो को जन्म दिया और उसके बाद ट्रिप्लेट्स को मस्क ने कहा" मै इस बात पर यकीन नहीं रखता कि मुझे बेहद दुखद घटनाओं के बारे में बात करनी चाहिए। क्योंकि ये किसी भी तरह हमारे भविष्य को नहीं सुधारती। अगर आपके और बच्चे और जिम्मेदारियां है तो बीती बातो पर दुखी होने से आपका और आपके अपनों का कोई भला नहीं होने वाला" ।