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The 7 Habits Of Highly Effective People Book Summary In Hindi


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The 7 Habits Of Highly Effective People Book Summary In Hindi


About Book


एक हाइली इफेक्टिव आदमी कौन होता है? एक हाइली इफेक्टिव इंसान वो होता है जिसका केरेक्टर अच्छा हो. जिसके पास स्ट्रोंग वेल्यूज़ हो. क्या आपकी कभी अपने किसी रिश्तेदार या कलीग से खटपट हुई है ? किसी से ये उम्मीद रखना कि वे बदले, उससे पहले आपको खुद को बदलना होगा. क्या आपको लगता है कि आपमें खुद को इम्प्रूव करने की क्वालिटी है?

एक हाइली इफेक्टिव इंसान के दुसरे लोगो के साथ भी अच्छे रिलेशन होते है. वो अपने परिवार, रिश्तेदारों, दोस्तों, पड़ोसियों और कलीग्स के साथ मिलजुल कर रहता है. और एक अच्छा रिलेशन सालो साल तक चलता है.

एक हाइली इफेक्टिव इंसान कैसे बना जाए, ये आप इस किताब को पढ़कर सीख सकते है. जो भी आपकी जॉब हो, आप इस किताब से ये बात जान सकते है. जैसे कि अगर आप एक पेरेंट है तो अपने बच्चे के साथ अपना रिलेशनशिप और भी बेहतर बना सकते है. अगर आप एक बॉस है जो इस किताब में आपको ऐसे टिप्स मिलेंगे जिनसे आप और भी अच्छे लीडर बन पायेंगे. 

ये किताब किस के लिए है?


1) जो इफेक्टिव लोगो की सात आदतों को जानना चाहते है ? 
2) जो सिर्फ एक कॉमन ज़िन्दगी नहीं जीना चाहते बल्कि अपनी ज़िन्दगी में कुछ बड़ा करना चाहते हैं.

इस किताब के ऑथर कौन है ? 


स्टीवन कवी एक अमेरिकन ऑथर, बिजनेसमैन और एक बहुत अचे स्पीकर थे टाइम मैगजीन ने इन्हे टॉप 25 मोस्ट इन्फ्लुएंटीएल लोगो की लिस्ट में डाला है | स्टीवन कवी उटाह स्टेट यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर भी रहे है | इनकी किताब 7 हैबिट्स ऑफ़ हाइली इफेक्टिव पीपल एक बेस्ट सेलर रही है।


एक हाइली इफेक्टिव आदमी कौन होता है? एक हाइली इफेक्टिव इंसान वो होता है जिसका केरेक्टर अच्छा हो. जिसके पास स्ट्रोंग वेल्यूज़ हो. क्या आपकी कभी अपने किसी रिश्तेदार या कलीग से खटपट हुई है? किसी से ये उम्मीद रखना कि वे बदले, उससे पहले आपको खुद को बदलना होगा. क्या आपको लगता है कि आपमें खुद को इम्प्रूव करने की क्वालिटी है? एक हाइली इफेक्टिव इंसान के दुसरे लोगो के साथ भी अच्छे रिलेशन होते है. वो अपने परिवार, रिश्तेदारों, दोस्तों, पड़ोसियों और कलीग्स के साथ मिलजुल कर रहता है. और एक अच्छा रिलेशन सालो साल तक चलता है.


एक हाइली इफेक्टिव इंसान कैसे बना जाए, ये आप इस किताब को पढ़कर सीख सकते है. जो भी आपकी जॉब हो, आप इस किताब से ये बात जान सकते है. जैसे कि अगर आप एक पेरेंट है तो अपने बच्चे के साथ अपना रिलेशनशिप और भी बेहतर बना सकते है. अगर आप एक बॉस है जो इस किताब में आपको ऐसे टिप्स मिलेंगे जिनसे आप और भी अच्छे लीडर बन पायेंगे. जब आपका केरेक्टर अच्छा हो तो लोग भी आपसे नज़दीकी बढ़ाना चाहते है.


इसीलिए तो "द सेवेन हेबिट्स ऑफ़ हाइली इफेक्टिव पीपल" एक इंटरनेशनल बेस्ट सेलर है. ये किताब केरेक्टर इम्प्रूव करने में फोकस करती है. ज़्यादातर किताबे आपको इस बारे में किलेंगी कि दोस्त कैसे बनाये या लोगो को इम्प्रेस कैसे करे मगर सेवन हैबिट्स आपको सबसे पहले एक इफेक्टिव इंसान बनाने पर फोकस करती है. अगर आपकी पर्सेनिलिटी अच्छी है तो बेशक आप भी एक इफेक्टिव इंसान बन सकते है मगर वो बस थोड़े टाइम के लिए होगा. लोगो को जल्द ही पता चल जाएगा कि आपके हर काम के पीछे कोई मतलब, कोई मोटिव है. लेकिन अगर आपका केरेक्टर अच्छा है तो वो लाइफ टाइम तक आपके साथ रहेगा. आप अपने आस-पास के लोगो को इन्फ्लुएंस करते रहेंगे और आपको इसका पता भी नहीं चलेगा. लेकिन याद रखे कि आपको सबसे पहले अपने अन्दर से शुरू करना है. तो क्या आप तैयार है चेंज होने के लिय? क्या आज आप एक हाइली इफेक्टिव पर्सन बनेगे ?


हैबिट 1 (PROACTIVE) प्रोएक्टिव बने


प्रोएक्टिव बनने का मतलब क्या है ? साकोलोजिस्ट विक्टर फ्रेंकल कहते है "हमारे आस-पास जो भी कुछ होता है हम उसे बदल नहीं सकते" लेकिन हम इस पर कैसे रीस्पोंड करे ये हमारे हाथ में है. प्रोएक्टिव होने का मतलब होता है कि दुसरे लोग चाहे जो भी ओपिनियंस दे या जैसा भी उनका बेहेवियर हो हमें उससे अफेक्टेड नहीं होना है. जब लोग हमारे बारे में कुछ बुरा बोलते है तो कमी हमारे अंदर नहीं होती बल्कि उनमे होती है. जो नेगेटिव बात वो आपके बारे में बोलते है उनसे उनके खुद के नेगेटिव व्यू का पता चलता है कि वे दुनिया को किस नज़र से देखते है. प्रोएक्टिव होने का मतलब ये भी है कि आप किसी भी बुरी सिचुएशन से अफेक्ट ना हो. फिर चाहे मौसम खराब हो या ट्रेफिक लेकिन एक प्रोएक्टिव इंसान को कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

उसकी जिंदगी में बुरा वक्त या गरीबी आये मगर वो हर हाल में खुश रहेगा. एक प्रोएक्टिव इंसान बुरे से बुरे हालत में भी बगैर कोई कम्प्लेन किये अपना काम करता रहेगा. प्रोएक्टिव का उल्टा रीएक्टिव होता है. और जो लोग रीएक्टिव होते है वो अपने एन्वायरमेंट से बहुत जल्दी अफेक्ट हो जाते है. अगर उनके साथ कुछ बुरा होता है तो वो खुद भी नेगेटिव बन जाते है | एक बार लेखक स्टीफन कोवी जब सेक्रामेन्टो में एक लेक्चर दे रहे थे तब अचानक भीड़ में से एक औरत खड़ी हुई. वो बड़ी एक्साइटेड होकर कुछ बोल रही थी कि तभी उसकी नज़र लोगो पर पड़ी जो उसे घूर रहे थे. लोगो को ऐसे घूरते देखकर वो औरत वापस बैठ गई. अपना लेक्चर खत्म करने के बाद स्टीफन कोवी उस औरत के पास गए.

उन्हें मालूम पड़ा कि वो औरत दरअसल एक नर्स थी और एक बड़े बीमार पेशेंट की फुल टाइम देखभाल कर रही थी. उसका वो पेशंट हर टाइम उस पर चिल्लाता रहता था. उसकी नज़र में वो सब कुछ गलत करती थी. उसने कभी भी उस नर्स को थैंक यू तक नहीं बोला था. इन सब बातों की वजह से वो औरत बड़ी दुखी रहती थी. वो अपनी जॉब से बिलकुल भी खुश नहीं थी. उस दिन स्टीफन कोवी के लेक्चर का सब्जेक्ट भी प्रोएक्टीवीटी ही था. कोवी एक्सप्लेन कर रहे थे कि अगर तुम प्रोएक्टिव हो तो कोई भी चीज़ तुम्हे हर्ट नहीं कर सकती जब तक आप खुद ना चाहे तब तक कोई आपको दुखी नहीं कर सकता. ये लेक्चर सुनकर वो औरत एक्साइटेड हो गयी थी क्योंकि उसे पता चल गया था कि रिस्पोंड करना या ना करना उसके हाथ में है.

उसने कोवी को बताया" मैंने दुखी होना खुद चुना था मगर अब मुझे रिलायिज हो गया है कि दुखी या सुखी होना मेरे हाथ में है लेकिन अब किसी दुसरे इंसान का बिहेवियर मुझे कंट्रोल नहीं कर सकता. एक रिएकटिव इन्सान का मूड TV की तरह होता है जिसका रिमोट कन्ट्रोल दुनिया के हाथ में है। जब भी कोई चाहेगा वो उस रिएक्टिव इन्सान का मूड चेंच कर सकता है। लेकिन एक प्रोडक्टिव इन्सान वो है जिसने अपने मूड का रिमोट कन्ट्रोल अपने पास रखा है। एक प्रोडक्टिव इन्सान को कोई फर्क नही पडता कि दूसरा इन्सान उसके बारे में क्या सोच या बोल रहा है।

हैबिट 2

Begin with the end in mind 


आपकी लाइफ की सबसे ज़रूरी चीज़ क्या है? अपने माइंड में एंड को लेकर शुरुवात से हमारा मतलब है कि आपके सारे एक्शन आपकी वेल्यूज़, आपके पर्पज से मैच होने चाहिए. आपक फाईनल गोल / आपका डेस्टिनेशन पता होना चाहिए ताकि आपका हर स्टेप उसी तरफ जाए. हम कई बार बहुत सी प्रोब्लेम्स फेस करते है. हमें आये दिन किसी ना किसी चीज़ के लिए कंसर्न होना पड़ता है. और लाइफ में इतने चेलेन्जेस है कि हम कई बार भूल जाते है कि हमारे लिए सबसे ज़रूरी चीज़ क्या है. जैसे कि आपको अपने बच्चो का ध्यान रखना पड़ता है, उन्हें हर चीज़ प्रोवाइड करानी पड़ती है.

लेकिन आप इसके लिए इतना ज्यादा हार्ड वर्क करते है कि उनके साथ टाइम स्पेंड ही नहीं कर पाते. आप ये भूल जाते है कि मेटेरियल चीजों से ज्यादा उन्हें आपके प्यार और सपोर्ट की भी ज़रुरत है. अगर आप सच में अपने बच्चो से प्यार करते है तो उन्हें हर दिन शो कराये कि आप उन्हें कितना चाहते है. आपकी बातो और आपके एक्शन में उनके लिए प्यार झलकना चाहिए. और आपका यही बेहेवियर आपके पेरेंट्स और उन बाकी लोगो के साथ भी होना चाहिए जो आपकी लाइफ में बहुत मायने रखते है. बिगीन विद द एण्ड इन माईन्ड से मतलब है ये जानना कि आपके लिए सबसे वेल्युब्ल क्या है. वो आपके अपने लोग हो सकते है, या फिर आपके प्रिंसिपल जिन पर आपको पूरा यकीन है.

अगर आप कुछ ऐसा करते है जो आपके प्रिंसिपल से मैच नहीं करता तो आप एक इनइफेक्टिव इंसान बन रहे है.. मान लीजिये कि आप एक घर बना रहे है. मगर इसके लिए सबसे पहले आपको अपने दिमाग में प्लानिंग करनी पड़ेगी फिर जाकर आप टूल्स लेंगे. अगर आपके घर में बच्चे है तो आपके घर का हर कोना चाइल्ड फ्रेंडली होना चाहिये. अगर आप कुकिंग का शौक रखते है तो आपको अपनी किचन अपग्रेड रखनी पड़ेगी. तो किसी भी काम को शुरू करने से पहले उसका ब्लू प्रिंट आपके दिमाग में क्लियर होना चाहिए. अगर आपने अपना घर अच्छे से प्लान नहीं किया है तो इसे प्रोप्रली कन्सटरकट करना मुश्किल हो जाएगा. और लास्ट में आपको इसे रिपेयर कराने में फ़ालतू पैसे ही खर्च करने पढ़ेंगे.

लाइफ में हर चीज़ प्लानिंग मांगती है.. और इसी तरह एंड को माइंड में रखकर चलने की शुरुवात होती है. ये सोचे कि आपको सबसे पहले क्या करना है. और ये श्योर कर ले कि वो आपके वेल्यूज़ के साथ फिट हो सके. क्या आप सबसे ज्यादा आनेस्टी को वेल्यु करते है? या फिर आप रीस्पेक्ट की ज्यादा वेल्यु करते है ? इसी को ध्यान में रखते हुए अपने दिन की शुरुवात करे.. अपने वेल्यूज़ पर पूरा यकीन रखे. ताकि आपकी लाइफ में जो भी चेलेन्जेस आये आप अपने वेल्यूज़ के हिसाब से उन चेलेन्जेस को फेस कर सके.

हेबिट 3

सबसे पहले ज़रूरी चीज़े करे. 

सबसे पहले ज़रूरी कामो को करने का मतलब सिर्फ टाइम मेनेजमेंट से नहीं है. ये सेल्फ मेनेजमेंट भी है. इंसान होने के नाते हम सब सेल्फ अवेयर होते है. और यही चीज़ हमें सारी लिविंग थिंग्स में सुपीरियर बनाती है. क्योंकि सिर्फ हम इंसान ही खुद को इवेयुलेट कर सकते है और जब हमें लगता है कि हम कुछ गलत कर रहे है तो हम उसे चेंज कर सकते है. जब हमें बहुत से काम करने होते है तो सबसे पहले हमें अपनी प्रायोरिटीज़ सेट करनी चाहिए. कुछ लोगो प्लानर्स की हेल्प लेते है ताकि उन्हें याद रहे. कुछ लोग टू ड्डू लिस्ट और बोर्ड्स बनाते है ताकि उन्हें ज़रूरी काम याद रहे. लेकिन बावजूद इन सबके कई बार हम अपने बेहद ज़रूरी काम टाइम पर कम्प्लीट नहीं कर पाते है.

जब आपकी प्रायोरीटीज़ पूरी नहीं हो पाती तो सेल्फ • डिसिप्लिन आपकी प्रॉब्लम नहीं है. असली प्रॉब्लम ये है कि आपने अपनी प्रायोरीटीज़ को दिल दिमाग में बिठाया ही नहीं. आपने ये सोचा ही नहीं की ये आपकी टॉप प्रायोरीटीज़ क्यों है? क्यों ये आपके लिए इम्पोटेंट है ? सोचिये ज़रा इसके बारे में. ये आपको और ज्यादा मोटिवेट करेगा. "टाइम मेनेज करना चेलेंज नहीं है बल्कि खुद को मेनेज करना है" सबसे पहले ज़रूरी चीज़े करे " इस बात का मतलब है कि अपनी प्रायोरीटीज़ को पहले नम्बर पे रखे. इसका मतलब ये भी है कि ज़रुरत पड़ने पर आप "ना" बोलना सीखे. जब आपके पास करने के लिए ढेर सारा काम हो तो उन टास्क को ना बोल दीजिये जो आपकी प्रायोरीटीज़ का हिस्सा नहीं है.

एक्जाम्प्ल के लिए सेंड्रा को एक कम्युनिटी प्रोजेक्ट का चेयरमेन बनने को बोला गया. मगर उसके पास पहले से ही इम्पोटेंट टास्क थे मगर प्रेशर में आकर उसे हाँ बोलना पड़ा. सेंड्रा ने अपने पडोसी कोंनी को पूछा कि क्या वो भी इस प्रोजेक्ट को ज्वाइन करना चाहेगी. सेंड्रा की बात सुनकर कोनी ने कहा" सेंड्रा, ये प्रोजेक्ट काफी मजेदार लगता है... मगर कुछ रीजन्स से मैं इसमें पार्टिसिपेट नहीं कर पाऊँगी मगर सच में तुम्हारे इस इनविटेशन को मै एप्रिशिएट करती हूँ.

उसके बाद सेंड्रा को लगा कि जैसा कोनी ने किया उसे भी वही करना चाहिए था. वो भी तो पोलाईटली "ना" बोल सकती थी जब उसे चेयरमेन बनने के लिए बोला गया था. ये प्रोजेक्ट कम्यूनिटी के लिए अच्छा था मगर कोनी को अपनी टॉप प्रायोरीटीज़ मालूम थी इसलिए उसने ना बोला. उसके पास करने के लिए दुसरे ज़रूरी काम थे. और इसलिए उसने पोलाईटली ना बोलने की हिम्मत की. अगर आप अपनी प्रायोरीटीज अपने दिल और दिमाग में अच्छे से प्लान कर लेंगे तो आपके लिए बाकी चीजों को ना कहना आसान रहेगा. और आप अपने ज़रूरी कामो को आसानी से टाइम पर पूरा भी कर पायेंगे. सेल्फ डिस्प्लीन से ज्यादा ज़रूरी है कि आपके पास विल पॉवर हो जिससे आप ज़रूरी कामो को सबसे पहले निपटा सके.

हेबिट 4
थिंक विन विन 


विन विन एक ऐसा सोल्यूशन है जो आपको और उन लोगो को जिनसे आप इंटरेक्ट करते है, काफी बेनिफिट देगा. जब भी आपका अपनी फेमिली और कलीग्स के साथ कोई इस्यु होता है तो उसका कोई सोल्यूशन निकालना ही पड़ता है जिससे सबका भला हो. विन विन बेस्ट सोल्यूशन है. अगर कोई जीतता है और दूसरा हारता है तो इससे एक लम्बा और मज़बूत रिलेशन नहीं बन पायेगा. इमेजिन करो कि आपका अपने कलीग से डिसएग्रीमेंट हो जाता है तो आपको ये करना है कि जो भी प्रॉब्लम है उस पर खुलकर बात करनी है. उसका कोई ऐसा सोल्यूशन निकाले जो आप दोनों के लिए सही हो. लेकिन अपने कलीग को खुद पर हावी ना होने दे ना ही आप उस पर हावी हो. आप दोनों का रिश्ता बेलेंस होना चाहिए जिसमे दोनों की जीत हो.

इस तरह से आपके और आपके कलीग में को ओपरेशन रहेगा जिससे आप एक टीम की तरह काम कर सकते है. एक दुसरे के साथ कम्पटीट करने से ये कहीं ज्यादा अच्छा है. अब इमेजिन करे कि आप बॉस हो और अपने किसी एम्प्लोयी से आपका डिसएग्रीमेंट होता है। तो जाहिर सी बात है कि आपकी ही बात ऊपर रहेगी क्योंकि आपका एम्प्लोयी अपनी जॉब की वजह आपके सामने चुप ही रहेगा. एक बॉस होने के नाते आप बेशक आर्ग्युमेंट में उससे जीत जाए मगर लॉन्ग रन में देखे तो ये आपकी हार होगी. क्योंकि अपने एम्प्लोयीज़ को नीचा दिखाकर आप उन्हें मोटिवेट नहीं कर सकते. चो आपके लिए काम तो करेगा मगर मन मार के. तो कुल मिलाकर नुक्सान तो आपका ही हुआ.

कम्प्रोमाईज़ करना हमेशा अच्छा होता है फिर भले ही आप बॉस ही क्यों ना हो. आपके लिए यही अच्छा होगा कि आप अपनी पोजीशन का इस्तेमाल ना करे. अपने एम्प्लोयीज़ को खुश रखने में ही आपका ज्यादा फायदा है. अगर आप हमेशा विन विन सिचुएशन सेटल करते है तो आपके एम्प्लोयीज़ ज्यादा इफेक्टिव होंगे. और ये आपकी कंपनी के लिए भी फायदेमंद होगा, साथ ही आपको बार-बार लोगो को हायर करके उन्हें ट्रेन करने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी. विन विन सिचुएशन सिर्फ वर्क प्लेस पर ही अप्लाई नहीं होती. ये हर तरह के रिलेशनशिप में एप्लीकेबल है. जब भी आपके अपने पार्टनर, आपके बच्चों, दोस्त या पड़ोसियों के साथ डिसएग्रीमेंट हो तो विन विन सिचुएशन के बारे में सोचे... फिर आप देख्नेगे कि कैसे आपके हर रीलेशन में और भी ज्यादा प्यार और ट्रस्ट आएगा.

हैबिट 5


पहले खुद दुसरो को समझने की कोशिश करे फिर दुसरो से उम्मीद करे कि वे आपकी बात समझे क्या आपको याद है कि लास्ट बार कब किसी ने आपसे अपनी प्रॉब्लम शेयर की थी ? और क्या आपने उनकी बात सच में सुनी भी थी ? क्या आपने एडवाइस देने से पहले उनकी फीलिंग्स को समझा था ? पहले आप दुसरो को समझने की कोशश करे फिर उनसे उम्मीद करे कि वो आपकी बात समझे, ये अच्छे कम्युनिकेशन का यही तरीका है. हम अपनी राइटिंग, रीडिंग स्पीकिंग और लिसनिंग के ज़रिये कम्युनिकेट करते है. बचपन में हम लिखना, पढना और बोलना सीखने में सालो लगा देते है. लेकिन किसी की बात सही ढंग से सुनने के लिए ऐसी कोई ट्रेनिंग नहीं है. किसी के साथ कम्युनिकेट करने का सबसे बेस्ट तरीका ये है कि पहले हम ये समझने की कोशिश करे कि आखिर वे कहना क्या चाहते है.


गुड लिसनिंग वो होती है जब आप खुद को सामने वाले की सिचुएशन में रखकर सोचते है. तभी आप सही तरीके से समझ पायेंगे कि वो इंसान कहना क्या चाहता है. जब आप सुनते नहीं है तो आप उस इंसान की बात समझे बगैर रिप्लाई करने लगते है मगर जब आप समझने की कोशीश करते है तभी आपको पता चलता है कि वो इंसान असल में कैसा फील कर रहा है. और जब आप इस तरीके से किसी की बात सुनेंगे तभी जाकर उस इंसान को कोई अच्छी एडवाईस दे पायेंगे या उनकी सच में कोई हेल्प कर पायेंगे.

एक बार एक आदमी किसी ऑप्टोमेटरिस्ट के पास गया. उसको कुछ विजन की प्रॉब्लम हो गयी थी. उस आदमी ने ऑप्टोमेटरिस्टको बताया कि उसको क्लीयरली कुछ दिखाई नहीं दे रहा है. तो उस ऑप्टोमेटरिस्ट ने क्या किया कि उसने उस आदमी को अपना चश्मा दे दिया ऑप्टोमेटरिस्ट ने कहा " इन्हें पहनो, मैं पिछले 10 सालो से यही चश्मा पहनता आया हूँ और मुझे साफ़ दिखता है मेरे पास एक जोड़ी एक्स्ट्रा पेयर घर पे रखा है तो तुम ये वाले पहन लो". उस आदमी ने ऑप्टोमेटरिस्टकी बात मानकर वो चश्मा पहन लिए मगर कोई फायदा नहीं हुआ बल्कि उसे और भी धुंधला काशशा के बावजूद उस आप्टामटारस्ट के चश्मा पहन के उसे कुछ भी साफ नहीं दिख रहा था. अब ऑप्टोमेटरिस्ट ने उससे कहा कि वो पोजिटिव सोचे. इस पर उस आदमी ने जवाब दिया" ओके, अब भी मुझे पोजिटिवली कुछ साफ़ नहीं दिखाई दे रहा" ये बात सुनकर ऑप्टोमेटरिस्ट अपसेट हो गया. क्योंकि आखिरकार वो तो उस आदमी की बस मदद करना चाहता था. उसे लगा कि शायद वो आदमी झूठ बोल रहा है और अनग्रेटफुल है.

हम भी कई बार ठीक इसी तरह उस ऑप्टोमेटरिस्ट के जैसे ही बीहेव करते है. हम यही कहते रहते है कि "अगर मैं तुम्हारी जगह होता" या "मेरी बात मान के देखो" लेकिन हम कभी भी ये ट्राई नहीं करते कि वो आदमी वाकई में कैसा फील कर रहा है और इसका रिजल्ट ये निकलता है कि वो इंसान हम पर कभी यकीन नहीं करेगा. और ना ही कभी दुबारा हमारे पास अपनी प्रॉब्लम लेकर आएगा. अगर आप सच में किसी की हेल्प करना चाहते है तो सबसे पहले उन्हें समझने की कोशिश करे. ऐसा करके आप उनका ट्रस्ट जीत सकते हैं. और उन्हें यकीन हो जाएगा कि आपके एक्शन के पीछे कोई मोटिव नहीं नहीं बस हेल्प करने की इच्छा है. वो फिर वो भी आपको समझना शुरू कर देंगे.

हैबिट 6
सिनर्रजाइज़


सिनेर्जी का मतलब है "द होल इज ग्रेटर दन द सम आफ इटस पार्टस" "the whole is greater than the sum of its parts" यानि जब एक आदमी दुसरे की मदद करता है तो दोनों साथ मिलकर बहुत कुछ अक्म्प्लिश कर सकते है. जब एक टीम का मेम्बर दुसरे टीम मेम्बर के साथ मिल के काम करता है तो वो दोनो मिल कर अकेले इन्सान के मुकाबले बहुत ज्यादा अचीव कर सकते हैं। जब भी कोई नेचुरल डिजास्टर या कालामेटी जैसे आग, टाईफून या अर्थक्वेक होता है तो लोग सिनर्रजाइज़ होते है यानि साथ मिलकर काम करते वो मुसीबत में पड़े लोगो को मदद करने के लिए आगे आते है. तब लोग अपने डिफरेंसेस भूल जाते है. मुश्किल सिचवेशन लोगो के अंदर कोपरेट करने की फीलिंग्स ले आती है. और सब तुरंत मिल जुल कर सर्वाइव करने के लिए करते है.

सिनेर्जी के मतलब को ओपरेट या कोलाब्रेशन भी है. इसका मतलब साथ मिलकर चलना और कम्बाइनड एफरट भी है. चाहे कोई भी ग्रुप हो, अगर आपस में सिनर्जी होगी तो इसका बेनिफिट ज़रूर मिलेगा. लेकिन प्रॉब्लम तो ये है कि ये सिनर्जी हमारी लाइफ में हर रोज़ नहीं होती. लोग आपस में अपने डिफरेंसेस दूर करना ही नहीं चाहते. उन्हें ये बड़ा मुश्किल लगता है. क्योंकि हर किसी का एक डिफरेंट पॉइंट ऑफ़ व्यू होता है, डिफरेंट वे ऑफ़ चिंकिंग होती है. हम इस दुनिया को अलग नज़र से देखते है क्योंकि हम अपने खुद के हिसाब से ये दुनिया देखते है. हमें ये समझना ही होगा कि दुनिया को देखने का हमारा नजरिया लिमिटेड होता है इसीलिए हमारी सोच भी लिमिटेड हो जाती है.

हमें दुसरे लोगो को जानने और उनके एक्स्पीरिटेंश को समझने की ख़ास ज़रूरत है. ये किसी ओप्टीकल इल्यूजन की तरह है.. हो सकता है कि जो मुझे एक यंग लेडी नज़र आ रही है वही आपको एक बूढी औरत दिखाई दे हम दोनों ही उस इमेज को डिफरेंटली इंटरप्रेट कर रहे है हालाँकि हम दोनों ही अपनी जगह सही है. तो इस बात पर बहस करने का कोई फायदा नहीं है. सिनर्रजाइज़ करने के लिए हमें एक दुसरे के पॉइंट ऑफ़ व्यू को समझना ही पड़ेगा. और इस तरीके से हम एक बड़ी पिक्चर देख सकते है.

सिनर्जी का मतलब है कोओपरेशन. इसका मतलब है अपने डिफरेंसेस को एक्सेप्ट करना और एक दुसरे के विचारों की कद्र करना. ये कभी साबित करने की कोशिश ना करे कि बस आप सही है और दूसरा बाँदा गलत है. उस इंसान के नज़रिए से भी समझने की कोशिश करे. इससे आपकी नॉलेज ही बढ़ेगी और कोई नुक्सान नहीं होगा. बहसबाजी करने से बेहतर और भी कई आल्टरनेट है. जब आप दुसरो के व्यूज़ की रीस्पेक्ट करने लगते है तो आप उनके साथ मिलकर काम कर सकते है. आप कोपरेट करके मिलकर काम करने से कई सारी नई ओर अच्छी चीज़े क्रियेट कर सकते है.



हैबिट 7
शार्पन द सॉ


शार्पन द सॉ से हमारा मतलब है कि अपने सबसे बड़े एस्सेट को शार्पन करे. यानि हमेशा कुछ नया सीखते रहे और आपका सबसे बड़ा एस्सेट आप खुद है. आपको रेगुलरली खुद को रीन्यू करना पड़ेगा. अपनी लाइफ के हर एस्पेक्ट में आपको इमप्रूव करना पड़ेगा मतलब फिजिकली, स्प्रिच्यूली, मेंटली. सोशली और इमोशनली. आप रेगुलर एक्सरसाइज से खुद को रीन्यू रख सकते है. इसके लिए ज़रूरी नहीं कि आप जिम जाए या फिर महंगे इकुपमेंट ही खरीदे. आप घर पे ही सिम्पल एक्सरसाइज कर सकते है. आप रन कर सकते है, जोगिंग कर सकते है या फिर रेपिड वाक ले सकते है. अगर आप एक्सरसाइज नहीं करना चाहते तो स्लो तरीके की कोई भी एक्टिविटी कर सकते है और फिर आप देखेंगे कि डे बाई डे आपकी बॉडी इम्प्रूव हो रही है.

इसी तरह आप अपनी स्पिरिट को भी रीन्यू करने की ज़रूरत है. ऐसा कई बार होता है जब आप खुद को पूरी तरह थका हुआ पाते है. रोज़मर्रा के चेलेन्जेस से हम बेहद थक जाते है. तो हमें खुद को इंस्पायर रखने की बेहद ज़रूरत है. और आप प्रेयिंग, म्युज़िक, बुक रीडिंग करके या फिर नेचर के साथ जुड़कर खुद को इंस्पायर कर सकते है. ये आप पर डिपेंड है कि आपकी स्पिरिट किस तरीके से अच्छा फील करेगी. कभी कभी एक ब्रेक लेना भी ज़रूरी होता है ताकि आप खुद को टाइम दे सके और अपने बारे में सोच सके. हम जब यंग होते है तो हमारा दिमाग खुद ही अपनी एक्सरसाइज कर लेता है लेकिन एक बार स्कूल खत्म करने के बाद हम शायद ही कोई बुक पढने का टाइम निकाल पाते हो या कुछ नया सीखते hai? लेकिन लर्निंग सिर्फ स्कूल तक ही लिमिट नहीं होनी चाहिए.

हम इसके बाद भी खुद को एजुकेट करने के तरीके ढूंढ सकते है. अपने डेली रूटीन के कामो से हटकर कुछ अलग चीज़े ट्राई करे. खुद को चेलेंज करे कि आप कम से कम हर महीने एक बुक पूरी पढ़ सके. और जो लोग बहुत बिजी है और बुक नही पढ़ सकते उनके लिये हमने Hindi Book Reader बनायी है। हमारे सोशल और इमोशनल एस्पेक्ट एक दुसरे के साथ क्लोज़ली जुड़े होते है. ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे इमोशन लोगो के साथ इन्टरेकट करने से ही पैदा होते है. हर दिन हमें दुसरो के साथ अपने रिलेशन इम्प्रूव करने का मौका मिलता है. तभी तो कहा गया है कि "अर्न योर नेगवोयर लव" यानि अपने पड़ोसियों से प्यार करे. अगर आप एक काइंड नेचर पर्सन है तो यकीन मानिए आप एक लंबी खुशहाल लाइफ जियेंगे.

अब इमेजिन करे कि जैसे आप जंगल में वाक पर गए हो, आपको एक आदमी नज़र आता है जो एक छोटे से पेड़ को काट रहा है. आप देखते है कि वो आदमी काफी थक गया है तो आप उससे पूछते है कि वो कितनी देर से ऐसा कर रहा है. वो आदमी कहता है" पांच घंटे हो गए है और में अब थककर चूर हो गया हूँ! ये बड़ी मेहनत वाला काम है" तो आप उस आदमी को सलाह देंगे कि उसे कुछ मिनट का ब्रेक लेना चाहिए. हो सकता है कि उसे अपना सॉ यानि अपनी आरी को शार्पन करने की ज़रूरत है. और आप उसे ये भी कहते है कि " " मुझे यकीन है कि इससे आपका काम तेज़ी से होगा" मगर वो आदमी मना कर देता है. वो कहता है कि वो इतना बिजी है कि उसके पास सा शार्प करने का यानी अपनी आरी को तेज करने टाइम ही नहीं है.

अब किसी भी चीज़ को इफेक्टिवली कट करने के सॉ यानि आरी को तेज़ करने की ज़रुरत होती है ठीक इसी तरह खुद को और भी इफेक्टिव बनाने के लिए हमें भी अपने एस्सेट शार्पन करने होंगे. आपको टाइम निकाल कर खुद को रीन्यू करना ही पड़ेगा. क्योंकि जो टूल आपकी लाइफ में ज़रूरी है वो तो आपके पास है ही बस उनको शार्पन करने की ज़रुरत बीच बीच में पड़ती रहती है. और आपके एस्सेट्स है आपकी बॉडी, माइंड और सोल और उन्हें शार्पन करना कभी ना भूले.

कन्क्लुज़न् 


आपने हाइली इफेक्टिव लोगो को 7 हैबिट्स सीखी. 
हैबिट नंबर 1 है प्रोएक्टिव बने 
हैबिट नंबर 2 है एंड को ध्यान में रखकर किसी भी काम की शुरुवात करे. 
हैबिट नंबर 3 है कि सबसे पहले ज़रूरी चीजों को प्रायोरिटी दे. हैबिट नंबर 4 है विन विन सिचुएशन सोचे 
हैबिट नंबर 5 है कि अपनी बात समझाने के बजाये पहले दुसरो की बात समझने की कोशिश करे. 
हैबिट नंबर 6 है सिनेज़ईज़ और लास्ट में 
हैबिट नंबर 7 है अपने एस्सेस्ट्स शार्पन करे, 
हैबिट नंबर 1, 2 और 3 आपको अपना केरेक्टर इम्प्रूव करने में मदद करेंगे. 
हैबिट नंबर 5 और 6 दुसरो के साथ आपके रीलेशन इम्प्रूव करेंगे. और लास्ट में हैबिट नंबर 7 से आप अपनी ये अच्छी क्वालिटी लाइफ टाइम तक मेंटेन करके रख सकते है.

अब जो भी आपने सीखा है उसे डेली लाइफ में अप्लाई करना सीखे. जब कभी भी आप किसी बुरी सिचुएशन में होते है तो प्रोएक्टिव बनने की कोशिश करे. जब भी आपका किसी के साथ कौंफ्लिक्ट होता है तो विन विन सिचुएशन चुने. और जब आप कोई चीज़ बार-बार करेंगे तभी वो आपकी हैबिट बन पायेगा. जैसा कि एरिस्टो ने कहा है" हम वही बनते है जो हम बार-बार लगातार करते है. तो एक्सीलेंस कोई एक्ट नहीं है बल्कि हैबिट से आती है". तो दोस्तो इसी के साथ ये समरी यहाँ पर खतम होती है। आप रिव्यू सेक्शन में हमें लिख कर बता सकते है कि आपको ये समरी कैसी लगी और अगली समरी आप किस बुक पर चाहेंगे। अगर आपको हमारी मेहनत पसन्द आयी तो आप हमें अपना प्यार दिखा सकते है  "जय हिन्द "




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द पावर ऑफ़ हेबिट The Power of Habit Book Summary in Hindi


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द पावर ऑफ़ हेबिट The Power of Habit Book Summary in Hindi


The Power Of Habit 
By Charles duhigg 



About Book

शराब और सिगरेट पीना, ओवरईटिंग की हैबिट, बिंज watching, इंटरनेट की एडिक्शन, नींद पूरी ना होना - क्या आप भी इनमे से किसी बुरी आदत के शिकार है ? अगर है तो ये समरी एक बार जरूर पढ़िये. इस समरी में आपको अपनी बेड हैबिट छोड़कर उन्हें गुड हैबिट में बदलने का इफेक्टिव तरीका बताया जाएगा और आपको उन लोगों की रियल लाइफ कहानियाँ पढने को मिलेंगी जिन्होंने अपनी बेड हैबिट को गुड हैबिट में बदला है.

ये समरी किस-किसको पढनी चाहिए ?

वो लोग जो किसी बुरी आदत का शिकार है और उसे छोड़ना चाहता है. दोस्त या रिश्तेदारों को जो अपने करीबी लोगों की लाइफ सुधारना चाहते हैं और उनकी बुरी आदत छुड़वाना चाहते हैं.

ऑथर के बारे में 

चार्ल्स डुहिग एक बेस्ट सेलिंग ऑथर और एक अवार्ड विनिंग जर्नलिस्ट हैं. 2013 में उन्हें Explanatory रिपोर्टिंग के लिए पुलित्ज़र प्राइज भी मिल चुका है. उन्होंने न्यू यॉर्क टाइम्स, लॉस्ट एंजेल्स टाइम्स और न्यू यॉर्क मैगज़ीन के लिए काम किया है.


Introduction


अगर आप सोचते है कि आप अपनी बुरी आदते कभी नहीं बदल सकते, आप निराश होकर सारी उम्मीद खो चुके है तो एक बार एक समरी पढ़कर देखिए, ये आपकी आँखे खोल देगी. इस समरी से आप सीखोगे कि हैबिट कैसे काम करती है और कैसे हम अपनी लाइफ में हैबिट लूप को अप्लाई कर सकते है. इस समरी में आपको ऐसे लोगों की कहानियाँ पढने को मिलेंगी जिनकी कुछ बुरी आदते थी जो वो चाह कर भी नहीं छोड़ पा रहे थे, पर अपनी विलपॉवर से उन्होंने अपनी लाइफ ही बदल कर रख दी. ना सिर्फ उन्होंने बुरी आदते छोड़ी बल्कि अच्छी आदते अपना कर आज एक बेहतर जिंदगी जी रहे है. तो अभी बहुत देर नहीं हुई है, आप भी अपनी बुरी आदतों से छुटकारा पा सकते है. It तो आइये शुरुवात करते है एक नई जर्नी की जहाँ आप अपने ही नए अवतार से मिलेंगे..

The Habit Cure लिसा एलन 34 साल की है. उसे 16 साल की उम्र से ही शराब और सिगरेट की लत लग गई थी. इसके साथ ही लिसा को एक और प्रोब्लम भी थी, वो जिंदगी भर अपने मोटापे से परेशान रही. ऊपर से उस के सिर पर $10000 से भी ज्यादा का उधार था जो उसे चुकाना था. और मुसीबत ये है कि उसकी कोई नौकरी साल भर से ज्यादा नहीं टिकती थी. लेकिन आज जो औरत researchers के सामने बैठी है, एकदम अलग है. ये लिसा एकदम स्लिम-फिट और ख़ुशी से चहकती नजर आ रही है. उसकी टाँगे किसी रनर की तरह एकदम टोंड है. अगर उसकी पुरानी फोटो से तुलना करे तो वो अपनी उम्र से दस साल छोटी लगती है. आज लिसा के सिर पर कोई उधारी नहीं है, उसने शराब और सिगरेट पीना छोड़ दिया है और वो तीन सालो से एक ग्राफिक डिजाईन फ़र्म में जॉब कर रही है.

"आखिरी बार तुमने कब सिगरेट पी थी?' एक researcher ने लिसा से पूछा तो उसने जवाब दिया" कोई चार साल हो गए होंगे, मैंने 60 पाउंड वेट लूज़ किया है और उसके बाद एक मैराथन भी पूरी की है. इतना ही नहीं वो मास्टर की डिग्री के लिए पढाई भी कर रही है और उसने खुद का एक घर भी खरीदा है. कुल मिलाकर लिसा की जिंदगी में बहुत सारी पॉजिटिव चीज़े हुई है और हो रही है. पिछले तीन सालो से साईकोलोजिस्ट, न्यूरोलोजिस्ट और बाकि एक्सपर्ट्स ने लिसा के साथ 23 और लोगों को भी स्टडी किया. इन लोगों में कोई शराबी था तो कोई चेन स्मोकर तो कोई अपने मोटापे से परेशान था और किसी को शॉपिंग की लत लगी हुई थी. नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ हेल्थ ने इस रिसर्च को फंड किया था. लिसा और बाकि लोगों में एक चीज़ कॉमन थी, वो ये कि उन सबने बहुत कम वक्त में अपनी बुरी आदत से छुटकारा पाया था और एक्सपर्ट्स यही जानना चाहते थे कि आखिर इसके पीछे राज क्या है. researchers ने उन सबके डेली रूटीन को मोनिटर करने के लिए सबके घर में कैमरे लगवा दिए. सबको एमआरआई ब्रेन स्कैन से भी गुजरना पड़ा क्योंकि सबको सिगरेट, शराब और खाने की लत लगी थी. "मुझे पता है, तुम ये कहानी कई बार पहले भी सुना चुके हो पर प्लीज़ क्या फिर से बताओगे कि तुमने सिगरेट की लत कैसे छोड़ी? researcher ने पूछा और लिसा फिर से एक बार अपनी कहानी सुनाने लगी. लिसा छुट्टियों में घूमने कायरो, ईजिप्ट गई हुई थी. इसके कुछ महीने पहले की बात है, लिसा का हजबैंड एक दिन काम से घर लौटा और आते ही लिसा से बोला कि उसे डिवोर्स चाहिए, क्योंकि उसे किसी और लडकी से प्यार हो गया था. सुनकर लिसा के पैरो तले जमीन खिसक गई. उसे यकीन नहीं हुआ पर सच्चाई उसके सामने थी, उसका पति जो किसी दूसरी औरत को चाहता था अब लिसा के साथ एक पल भी नहीं रहना चाहता था. लिसा बुरी तरह से टूट गई, अपने गम को भुलाने के लिए उसने शराब और सिगरेट का सहारा लिया पर फिर भी उसके दिल को चैन नहीं पड़ा. लिसा ने अपने पति और उसकी गर्लफ्रेंड का पीछा नहीं छोड़ा, वो जहाँ-जहाँ जाते लिसा उन्हें फोलो करती. वो अपने पति की गर्लफंड को आधी रात को फोन करती और फोन रख देती. फिर एक रात लिसा नशे की हालत अपने पति की गर्लफ्रेंड के घर पहुँच गई, उसने वहां खूब तमाशा किया. वो उस लडकी को उल्टा सीधा बोल रही थी और जोर-जोर से दरवाजा पीट रही थी, लिसा ने गुस्से में उसका घर तक जलाने की धमकी दे डाली थी. ये उसकी ज़िंदगी का सबसे बुरा दिन था. उसने खुद को पहले कभी इतना मायूस और अकेला महसूस नहीं किया था. फिर अचानक उसे याद आया कि वो हमेशा से ही पिरामिड्स देखने ईजिप्ट जाना चाहती थी. अभी उसके क्रेडिट कार्ड की लिमिट बची थी तो लिसा ने ट्रिप पर जाने का फैसला कर लिया. कैरो पहुँचने के बाद पहली सुबह की बात है, पास ही में एक मस्जिद से आती अज़ान की आवाज़ से लिसा की नींद टूट गई थी. उसके होटल का कमरा अँधेरे में डूब था. जेट लेग की वजह से उसका सिर दुःख रहा था. लिसा को सिगरेट की तलब महूसस हुई, उसने अँधेरे में लेटे-लेटे ही एक सिगरेट जलाई पर ये क्या? उसे प्लास्टिक के जलने की बदबू आ रही थी.

असल में जिसे वो मार्लबरो का सिगरेट समझ कर जला रही थी वो एक पेन था. वो बुरी तरह चिढ़ गई थी. पिछले कुछ महीनों से वो बेहद परेशान, नाराज़ और गुस्से में थी. उसे कभी खुद पर शर्म आती तो कभी नाउम्मीदगी की फीलिंग होती. वो रातो को उठकर घंटो रोती और बेहिसाब उल्टा-सीधा खाती थी. एक तो उसके पास कोई नौकरी नहीं थी ऊपर से दिन ब दिन उसका वजन बढ़ रहा था. एक तरह से उसकी ज़िंदगी बर्बादी के कगार पर खड़ी थी. यहाँ तक कि उससे एक सिगरेट तक नहीं जल पाती थी. कुछ महीने यूं ही गुजर गये फिर एक दिन लिसा ने एक फैसला किया. वो बिस्तर से उठी, शावर लिया और होटल से बाहर निकली. उसने स्फिंक्स जाने के लिए एक टैक्सी ली जहाँ गिज़ा का पिरामिड है और दूर-दूर तक रेगिस्तान फैला हुआ है. लिसा ने सोच लिया था कि वो अपनी ज़िंदगी इस तरह बर्बाद नहीं होंगे देगी, उसे जीने का कोई मकसद ढूंढना ही होगा. कोई ऐसा मकसद जो उसकी लाइफ को
डायरेक्शन दे. उसने खुद से वादा किया कि अगले साल
वो फिर ईजिप्ट आएगी और डेजर्ट में ट्रेकिंग पर जायेगी.
चाहे कुछ भी हो जाए, वो अपना गोल पूरा करके रहेगी.
उसे अपना ये आईडिया काफी क्रेज़ी लगा. एक तो वो
ओवरवेट थी और ऊपर से उसके पास पैसे नहीं थे.
पर उसने खुद को चैलेंज कर लिया था और अब वो
इस चैलेंज को पूरा करने के लिए कुछ भी कर सकती
थी, लिसा ने सोचा सबसे पहले तो उसे सिगरेट छोडनी
होगी. ठीक इसके एक साल बाद ही, लिसा और छह लोगों
का एक कारवां ईजिप्ट के डेजर्ट में ट्रेकिंग पर रवाना
था. लिसा ने जो वादा खुद से किया था, उसे पूरा कर
दिखाया.


जिस पल लिसा ने स्मोकिंग छोड़ने का फैसला किया
था, उसी पल से उसकी ज़िंदगी बदल गई. फिर अगले
छह महीनों में लिसा ने सिगरेट की लत छोड़ने के लिए
जॉगिंग करनी शुरू की. उसने अपनी बिंज ईटिंग पर
काबू पाने के लिए हेल्दी डाइट का सहारा लिया. वो
टाइम से सोती और टाइम से उठती थी. नींद पूरी होने
की वजह से उसकी प्रोडक्टीविटी में भी ईज़ाफा हुआ.
वो एक भी पैसा फालतू खर्च करने के बजाए फ्यूचर के
लिए सेविंग कर रही थी. लिसा ने मैराथन ज्वाइन किया,
वापस स्कूल गई और एक नया घर भी खरीदा.
Researchers ने लिसा के ब्रेन में ओल्ड पैटर्न्स
देखे, ओल्ड हैबिट अभी तक थी पर पहले से कमजोर
थी. उसके ब्रेन में न्यू न्यूरल पैटर्न्स बन गए थे जो काफी
स्ट्रोंग थे और उसकी नई अच्छी आदतों से उसे कनेक्ट करते थे. लिसा रिसर्च एक्सपर्ट्स की फेवरेट सब्जेक्ट
थी क्योंकि उसके ब्रेन स्कैन्स बड़े क्लियर थे यानी एक
तरह से लिसा ने अपने ब्रेन को रीवायर ही कर लिया
था.


How Habits Work


1933 में यूजीन पौली नाम का एक आदमी सैन डिएगो
की एक लेबोरेट्री में आया. वो छह फुट से भी लंबा और
उम्रदराज़ आदमी था और एक ब्ल्यू बटन डाउन शर्ट
पहने हुए था. उसके बाल रुई जैसे सफेद थे और शायद
आर्थराईटिस की वजह से धीरे-धीरे चल रहा था.
मेडिकल लिटरेचर में ऐसे लोगों को ई. पी. बोला जाता
है.


एक साल पहले की बात है, एक दिन यूजीन की तबियत
अचानक खराब हो गई. उसे उल्टीयाँ आ रही थी और
पेट में भयंकर दर्द महूसस हो रहा था. बार-बार उल्टीयाँ
करने से उसे डीहाईड्रेशन हो गया था. उसकी वाइफ उसे
हॉस्पिटल लेकर आई. उस वक्त यूजीन को तेज़ बुखार
था. तेज़ बुखार की वजह से उसकी दिमागी हालत
भी ठीक नहीं थी. नर्स ने जब उसकी बाजू में आईवी
लगाने की कोशिश की तो वो एकदम एग्रेसिव होकर
लाते मारने लगा.


उसकी हालत देखते हुए डॉक्टर ने उसे बेहोश कर दिया
था. बेहोशी की हालत में डॉक्टर ने उसकी पीठ पर दो
vertebrae (रीढ़ का जोड़) के बीच में सूई चुभी कर कुछ फ्लूइड जैसा निकाला और देखते ही समझ गया कि यूजीन को क्या प्रोब्लम है. आमतौर पर इंसान के ब्रेन और स्पाइनल के बीच पाया जाने वाला फ्लूइड एकदम क्लियर होता है और तेज़ी से फ्लो करता है जैसे कोई सिल्क का धागा सुई से निकलता है पर यूजीन की बॉडी से जो फ्लूइड निकला था एकदम अलग था, जो देखने में गंदा और चिपचिपा सा था. जांच करने पर पाया गया कि यूजीन को viral encephalitis हुआ है. ये एक तरह का वायरस होता है जिससे बॉडी में कोल्ड सोर्स, माइल्ड इन्फेक्शन, फीवर और ब्लिस्टर्स हो जाते है. वैसे तो ये हार्मलेस माना जाता है पर अगर ब्रेन तक पहुँच जाए तो वायरस जानलेवा साबित होता है. वायरल एन्केफ्लाइटस ब्रेन में जाने के बाद ब्रेन के डेलिकेट टिश्यू को खाने लगता है, एक तरह से बोले तो ये हमारे विचार और सपनों को खाने लगता है. अब क्यूंकि यूजीन के ब्रेन का कुछ हिस्सा वायरस पहले से खा चुका था जिसे डॉक्टर्स दोबारा रीपेयर नहीं कर सकते थे पर उन्होंने वायरस को पूरे ब्रेन में फैलने से रोकने के लिए यूजीन को काफी बड़ी मात्रा में एंटीवायरल ड्रग दे दी थी. यूजीन दस दिनों तक कोमा में ज़िंदगी और मौत के बीच झूलता रहा, फिर धीरे-धीरे दवाईयों ने असर दिखाया और उसका फीवर उतर गया. वायरस भी बॉडी में जैसे गायब हो गया था. यूजीन जब कोमा से निकला तो उसकी दिमागी हालत काफी कमजोर लग रही थी पर वो जिंदा और सही-सलामत था यही सबसे बड़ी हैरानी की बात थी. डॉक्टर्स ने उस पर कुछ और टेस्ट भी किये, वैसे फिजिकल यूजीन एकदम फिट था, अपने हाथ-पैर हिला सकता था, लाईट और साउंड पर रीस्पोंड भी कर रहा था. पर उसके ब्रेन स्कैन से पता चला कि वायरस उसके ब्रेन सेंटर का एक ओवल टिश्यू खा चुका है और जहाँ पहले क्रेनियम और स्पाइनल कॉलम मिलते थे, अब वहां सिर्फ एक खाली जगह नज़र आ रही थी. डॉक्टर ने यूजीन को वाइफ को बोला कि उन्हें इस बात के लिए तैयार रहना होगा कि यूजीन अब पहले वाला इन्सान नहीं रहा. डॉक्टर ने यूजीन की वाइफ को बोला "मुझे नहीं लगता, मैंने किसी को भी इस तरह मौत के मुंह से वापस आते देखा हो. मै आपको झूठी उम्मीद नहीं देना चाहता, पर ये केस हमारे लिए भी एकदम अनोखा है" फिर कुछ हफ्तों बाद ही यूजीन को हॉस्पिटल से छुट्टी मिल गई और उसे रीहेबीलेशन ट्रीटमेंट दी जाने लगी. उसे हफ्ता दिन, महीना कुछ भी याद नहीं रहता था. डॉक्टर्स चाहे जितनी बार उसे अपना परिचय दे दे, यूजीन को उनके नाम याद नहीं रहते थे. घर वापस आकर यूजीन अपने ही दोस्तों को नहीं पहचान पाया. कई बार तो वो सुबह उठता, किचन में जाता और बेकन और अंडे पकाने लगता और फिर बेडरूम में आकर रेडियो चला देता. फिर चालीस मिनट बाद वो फिर से सेम रुटीन रिपीट करने लगता. उठता, बेकन पकाता, वापस कमरे में आकर रेडियो चला देता. यूजीन मेमोरी loss स्पेशलिस्ट का फेवरेट सब्जेक्ट बन गया था. इन एक्सपर्ट्स में से एक थे यूनीवरसिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया, सैन डिएगो के लैरी स्कवायर स्क्वॉयर 30 सालों से न्यूरो ऐनाटॉमी ऑफ़ मेमोरी की स्टडी कर रहे थे. स्क्वॉयर ने observe किया कि यूजीन को नई बाते याद नहीं रहती है. जब उसे उसके ग्रैंडचिल्ड्रन की फ़ोटोज़ दिखाई गई तो वो उन्हें पहचान नहीं पाया. यहाँ तक कि उसे ये भी याद नहीं था कि उसे कोई बिमारी हुई है जिसके चलते वो हॉस्पिटल में रहा था. स्क्वॉयर ने ये भी गौर किया कि यूजीन अपने घर में एक कमरे से दुसरे में आसानी से आ-जा रहा था पर जब उससे पूछा गया कि उसे घर की जानकारी कैसे याद रही तो वो कुछ भी जवाब नहीं दे पाया. जैसे कि उसे याद था कि किचेन कहाँ और और बाथरूम कहाँ पर पर लेकिन उसे याद कैसे रहा, ये एक पहेली थी. पर स्क्वॉयर ने यूजीन से जब अपने घर का नक्शा बनाने को बोला तो वो बना नहीं पाया. यूजीन अपनी याददाश्त भूल चुका था पर उसकी


हैबिट्स नहीं भूली थी, वो अपनी आदतों की वजह से ही किचेन और बाथरूम तक चला जाता था. उसे ये भी पता था कि पड़ोस में कहाँ घूमना है और जब वो बाहर घूमने जाता तो वापस भी खुद आ जाता था. उससे जब पुछा गया कि उसे ये कैसे किया तो यूजीन एक्सप्लेन नहीं कर पाया कि वो ये कैसे कर लेता है. यूजीन का डेली रूटीन कुछ इस तरह था वो सुबह उठता, फ्रंट गेट से बाहर जाता, पास-पड़ोस में घूमने जाता और घर लौटते हुए रास्ते से कोई पत्थर का टुकड़ा लेकर आता. घर आकर वो टीवी के सामने सोफे पर बैठ जाता और हिस्ट्री चैनल देखता. ये यूजीन की डेली रूटीन लाइफ थी.

उसकी याददाश्त चली गई पर उसकी आदते नहीं गई थी. अपनी इसी आदत के चलते यूजीन पास-पड़ोस में धूम-धामकर बड़े आराम से घर लौट आता था. ह्यूमन ब्रेन किसी प्याज़ की तरह है, कई परतों से बना हुआ. इसकी आउटसाइड लेयर में कॉम्प्लेक्स थिंकिंग प्रोसेस होता है. लेकिन ब्रेन के अंदर गहराई में ब्रेन स्टेम के पास जो जगह होती है, वहां हमारे प्रिमिटिव स्ट्रक्चर स्टोर होते है जो हमारे ऑटोमेटिक बिहेवियर जैसे सांस लेना या भोजन निगलना जैसे एक्शन को कण्ट्रोल करते है. हम चाहे याद रखे ना रखे पर ये हैबिट्स कभी नहीं छूटती चाहे हमारी याददाश्त क्यों ना चली जाये. ह्यूमन स्कल यानी खोपड़ी के बीचो-बीच करीब गोल्फ बाल के साइज का एक टिश्यू होता है जो मैमल्स, फिश या रेपटाइल के दिमाग में भी पाया जाता है, इसे basal ganglia बोलते है, यही वो जगह है जहाँ हमारी हैबिट स्टोर होती है. साइंटिस्ट्स ने ये पाया कि हमारे अंदर हैबिट इसलिए डेवलप होती है क्योंकि ब्रेन हमेशा एनर्जी बचाने के तरीके ढूंढता है. ये किसी भी रूटीन को हैबिट में बदल देता है ताकि हमारा ब्रेन बाकि कॉम्प्लेक्स टास्क पर फोकस कर सके.

अब जैसे एक्जाम्पल के लिए चलना, जूतों के फीते
बाँधना, कपड़े पहनना या दांत ब्रश करना जैसे कामो
में हमे ज्यादा सोचना नहीं पड़ता. ऐसे कामो को
करते वक्त हमारे हाथ-पैर ऑटोमेटिकली काम करते
है. क्योंकि ये काम हमारी हैबिट में शामिल है. हम इन्हें
ऑटो पायलट मोड में करते है, एक तरह से कहे तो
हमारा ब्रेन सारी हैबिट्स की chunking करता है
यानी उसे जरूरी और गैर जरूरी कामो में बाँट लेता है,
ताकि जो काम हमारी हैबिट में शामिल है, उसमे ब्रेन को
ज्यादा मेहनत करने की जरूरत ना पड़े और ब्रेन अपनी
एनर्जी मुश्किल काम जैसे सॉफ्टवेयर प्रोग्रामिंग या मैथ
प्रोब्लम्स सोल्व करने के लिए बचा कर रखता है.
हमारा बेसल गैन्ग्लिया (basal ganglia) तब फुल
एक्टिव होता है जब हम अपने दांत ब्रश कर रहे होते
है या शू लेस बाँध रहे होते है. अपनी इन ऑटोमेटिक
हैबिट्स की वजह से ही हम डिसीजन मेकिंग या हायर
लेवल थिंकिंग कर पाते हैं.


The Habit Loop


तो आप कोई हैबिट क्रिएट कैसे करोगे? हैबिट लूप कुछ इस तरह काम करता है. Cue, routine, reward. Cue, routine, reward. जब आप इस हैबिट लूप को रिपीट करते हो तो बिहेवियर नैचुरल बन जाता है. क्यू, रुटीन, रिवॉर्ड, क्यू, रुटीन, रिवॉर्ड. लेकिन क्यू (cue) क्या है ? ये बिहेवियर को एक्शन में लाने का ट्रिगर है. और रुटीन यानी खुद बिहेवियर और फाईनली रिवॉर्ड वो पॉजिटिव अफिर्मेशन है जो ये इंश्योर करता है कि बिहेवियर रिपीट किया जाए. 1990 में एमआईटी के कुछ साइंटिस्ट्स ने चूहों पर एक मेमोरी टेस्ट किया. साइंटिस्ट्स ने देखा कि जिन चूहों का basal ganglia इंजर्ड था, उन्हें घुमावदार रास्तो से होकर दौड़ने और फ़ूड कंटेनर खोलने जैसे टास्क करने में प्रोब्लम आ रही थी. ऐसा लग रहा था कि जैसे कि चूहों की याददाश्त चली गई है.


साइंटिस्ट्स ने एक एक्सपेरिमेंट किया, उन्होंने तय किया कि वो चूहों को बेसिक रूटीन करते हुए observe करेंगे. उन लोगों ने चूहों के ब्रेन में छोटी-छोटी वायर इन्सर्ट कर दी थी ताकि उनके ब्रेन में हो रही एक्टिविटी को मोनिटर किया जा सके. उन्होंने जो वायर चूहों की खोपड़ी में इन्सर्ट किये थे, एक तरह के सेंसर थे जिनकी सारी इन्फोर्मेशन उनके कंप्यूटर में फीड हो रही थी. चूहों को एक टी शेप वाले ट्रेक में छोड़ दिया गया जिसके एंड में चॉकलेट रखी थी. टास्क ये था कि हर चूहे को चॉकलेट ढूंढनी थी. पहले एक पार्टीशन रखी गई जो चूहों को बाकि ट्रैक से अलग रखती थी फिर एक जोर की क्लिक साउंड के साथ पार्टीशन हटा दी जाती थी, जो चूहों के लिए चॉकलेट ढूँढने के लिए एक ट्रिगर था. खैर एक्सपेरिमेंट शुरू हुआ. पहले तो चूहे ट्रेक के अंदर ही कोने सूंघते हुए, दीवारों पर नाखून मारते हुए घूमने लगे. उन्हें चॉकलेट की स्मेल तो आ रही थी पर कहाँ रखी है ये उन्हें पता नहीं चल पा रहा था. चूहे कभी दायें घुमते तो कभी बाएं लेकिन लास्ट में उन्होंने चॉकलेट ढूंढ ही ली. उनके ब्रेन में जो सेंसर लगा था वो कंप्यूटर से जुड़ा हुआ था तो उनके ब्रेन में हो रही एक्टिविटी नज़र आ रही थी, कंप्यूटर पर जो इमेज दिख रही थी उससे साफ़ पता चल रहा था कि चॉकलेट ढूंढते वक्त चूहों का basal ganglia फुल पॉवर से काम कर रहा है. जितनी बार भी चूहे दीवार पर स्क्रेच मार रहे थे या हवा में नाक उठाकर सूंघने की कोशिश कर रहे थे, उनका basal ganglia एक्टिविटी से भरा हुआ था । साइंटिस्ट की टीम ने इस एक्सपेरिमेंट को कई बार रिपीट किया. वो चूहों को सेम ट्रेक पर सेम रुटीन से भेज रहे थे. फिर आखिरकार कुछ चेंज हुआ. चूहों ने बेकार में इधर-उधर घूमना बंद कर दिया. अब ना तो वो हवा में सूंघ रहे थे और ना ही दीवारों पर स्क्रैच मार रहे थे. बल्कि इस बार वो सीधा चॉकलेट तक पहुँच गए. उन्हें पता चल गया था कि चॉकलेट कहाँ रखी है.


मोनिटर में सेंसर शो कर रहा था कि basal ganglia में एक्टिविटी कम होती जा रही है. यानी अब वो पहले से कम एक्टिव था. चॉकलेट तक पहुंचना चूहों के लिए ऑटोमेटिक रुटीन बन गया था जिसके लिए उन्हें अब ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं पड़ रही थी. उनका क्यू था क्लिक का साउंड और रुटीन था वो ट्रेक और रिवॉर्ड थी चॉकलेट और जैसे-जैसे चूहे इस हैबिट लूप से गुजरते गए, उनके basal ganglia में ये हैबिट स्टोर होती चली गई. शुरू में ये एक फुल एक्टिविटी थी पर जैसे-जैसे हैबिट रिपीट हुई basal ganglia का एफर्ट कम होता गया. तो इस एक्सपेरीमेंट से ये प्रूव हो गया था कि हमारा ब्रेन हैबिट्स स्टोर करता है ताकि वो ज्यादा इम्पोटेंट कामो को करने के लिए एनर्जी सेव कर सके.


The Habit of Success


हमारी बेड हैबिट फिर भी रहती है, क्योंकि ये राईट क्यू का वेट कर रही होती है. ये रिपीट होंगी तो इन्सान फिर से वही रूटीन अपना लेगा इसलिए इसका एक ही ईलाज है कि इसे किसी गुड हैबिट से रीप्लेस कर दिया जाये और ऐसा करने के लिए क्यू और रिवॉर्ड भी सेम होने चाहिए लेकिन रुटीन डिफरेंट हो. जैसे कि मान लो आपको नेट ब्राउजिंग की बड़ी हैबिट है, आप सारा दिन इंटरनेट और सोशल मिडिया पर रहते हो तो होता क्या है कि आपकी इस बेड हैबिट से आपकी प्रोडक्टिविटी कम होने लगती है और आपको गुड हैबिट जैसे जॉगिंग और एक्सरसाईज का टाइम नहीं मिल पाता. आप देर रात तक फोन ब्राउज़ करते रहोगे तो ज़ाहिर है सुबह देर से उठोगे. पर आप इस रुटीन को चेंज कर सकते हो. सबसे पहले, क्यू है घर आना. फिर अपने सोफे पर लेटकर फोन देखने के बजाए अपने रनिंग शूज़ पहनो और बाहर जॉगिंग के लिए जाओ. ये आपका न्यू रुटीन है. फिर एक घंटे बाद वापस आकर अपने लिए एक स्ट्रॉबेरी स्मूदी बनाओ, ये रहा आपका रिवॉर्ड. जब आप इस क्यू, रूटीन और रिवॉर्ड को रिपीट करते हो तो आपकी एक नई हैबिट बनती है. दोबारा आपका क्यू है ऑफिस से घर आना, लेकिन नया रुटीन है जॉगिंग करना, और रिवॉर्ड है स्ट्रॉबेरी स्मूदी. आप इस हैबिट लूप को किसी भी बुरी आदत से छुटकारा पाने के लिए अप्लाई कर सकते हो जो आप छोड़ना चाहते हो. क्यू, रुटीन और रिवॉर्ड याद रखो. बेड हैबिट छोड़ने के लिए सेम क्यू और रिवॉर्ड यूज़ करो पर रुटीन बदल दो. तो चलो अगली स्टोरी पढ़के उससे कुछ सिखने की कोशिश करते है. ट्रेविस लीच के दोनों पेरेंट्स ड्रग एडिक्ट थे. हर रोज़ ट्रेविस जब घर लौटता, अपने माँ-बाप को टीवी के सामने बैठा पाता, दोनों ड्रग के नशे में एकदम हाई रहते, उनकी आँखे ऊपर चढ़ी होती थी. ट्रेविस जब 9 साल का था तो एक दिन उसकी माँ को ड्रग लेने और देहव्यापार करने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया, और 9 साल की उम्र में ही उसने अपने पिता को हेरोइन की ओवरडोज़ का शिकार होते भी देखा. ट्रेविस ने देखा उसके पिता फर्श पर पड़े है और उनका चेहरा नीला पड़ गया है. ट्रेविस के भाई-बहन जानते थे कि ऐसी हालत में क्या करना चाहिए. उसके भाई ने उसके पिता की बॉडी को सीधा किया और उसकी बहन उनका मुंह खुला रखने की कोशिश कर रही थी ताकि उसके पिता की जीभ गले में फंस कर गला चोक ना कर दे, तब तक ट्रेविस ने अपने पड़ोसी के यहाँ जाकर मदद के लिए 911 में कॉल कर दिया था. 16 की उम्र में ट्रेविस एक हाई स्कूल ड्राप आउट था, उसने कहा कि वो स्कूल में और बुली नहीं होना चाहता था. उसके क्लासमेट उसे चिढ़ाते थे, उसका पीछा करते थे और उस पर चीज़े मार कर फेंका करते थे. ट्रेविस ने बताया कि उसे स्कूल और होमटाउन छोड़ना इस सबसे ज्यादा आसान लगा.

ट्रेविस फ्रेंसो चला गया जहाँ उसने McDonald's और Hollywood वीडियो में काम किया. कई बार उसे कस्टमर्स की बदतमीज़ी भी झेलनी पड़ती थी. एक बार जब एक कस्टमर उस पर चिल्लाते हुए बोला" आई वांट रेंच ड्रेसिंग यू मोरोन!" ट्रेविस को गुस्सा आ गया, उसने सभी चिल्लाते हुए उस औरत को जवाब दिया "गेट आउट ऑफ़ माई ड्राइव थ्रू!". इतना ही नहीं उसने कस्टमर की कार पर चिकेन नगेट फेंक दिए. कई बार तो ट्रेविस को इतना गुस्सा आता था कि वो शिफ्ट में काम के बीच ही रो पड़ता था. काम पर अक्सर वो लेट आता या कई बार एक्सेंट रहता. घर आकर वो शीशे के आगे खड़े होकर खुद से बाते करता. वो खुद को ही आर्डर देता कि उसे अच्छा बनना होगा, औरो की तरह नॉर्मल रहना होगा. लेकिन सच तो ये था कि ट्रेविस को सोशल होने में दिक्कत आ रही थी. अक्सर ही उसके केश रजिस्टर की लाइन लंबी होती चली जाती और तब मैनेजर आकर उसे डांटने लगता. ऐसे मौको पर ट्रेविस के हाथ कांपने लगते और साँस फूलने लग जाती. फिर एक दिन होलीवुड वीडियो में एक रेगुलर कस्टमर ने ट्रेविस से बात की. उसने ट्रेविस को सलाह दी कि उसे स्टारबक्स में जॉब ट्राई करना चाहिए. वो कस्टमर फोर्ट वाशिंगटन की नई ब्रांच का असिस्टेंट मैनेजर था. उसने ट्रेविस को वहां अप्लाई करने का ऑफर दिया और एक महीने बाद ही ट्रेविस बरिस्ता में मोर्निंग शिफ्ट कर रहा था. तब से छह साल हो गए है, ट्रेविस आज 25 साल का है और दो स्टारबक्स ब्रांच का मैनेजर है. उसके अंडर में 40 लोग काम करते है और वो अपनी कंपनी के लिए सालाना $2 मिलियन का रेवेन्यू जेनरेट करता है. और उसकी सेलरी है $44,000. ट्रेविस ना तो अब कभी काम पर लेट होता है और ना ही बेवजह छुट्टी लेता है. उसका अपने इमोशंस पर पूरा कण्ट्रोल है इसलिए उसे कभी काम के दौरान गुस्सा नहीं आता. एक बार एक कस्टमर उसके एक एम्प्लोई पर चिल्ला रहा था तो ट्रेविस उस एम्प्लोई को साइड में लेकर गया और समझाया" तुम्हारा एप्रन तुम्हारे लिए एक शील्ड की तरह है, इसलिए जब तक तुम इसके पीछे हो, स्ट्रोंग हो" पर ट्रेविस की लाइफ में इतना बड़ा बदलाव आया कैसे? उसने स्टारबक्स ट्रेनिंग कोर्स अटेंड किया. बरिस्ता में अपने पहले ही दिन उसने लेक्चर ज्वाइन किया था. ये प्रोग्राम ख़ास एम्प्लोईज़ के लिए रखा गया था और इसे कुछ इस तरह से स्ट्रक्चर किया गया था कि एम्प्लोईज़ जब मोड्यूल कम्प्लीट करे तो उन्हें कॉलेज क्रेडिट कमाने का मौका मिल सके. स्टारबक्स के इस ट्रेनिंग प्रोग्राम ने ट्रेविस की पूरी ज़िंदगी ही बदल कर रख दी थी. स्टारबक्स ने ट्रेविस को सिखाया कि अपनी जॉब पर फोकस कैसे करना है, कैसे अपनी लाइफ जीनी है और कैसे अपने ईमोशन्स को कण्ट्रोल में करना चाहिए. ट्रेविस कहता है" स्टारबक्स मेरी ज़िंदगी का टर्निंग पॉइंट था, मै जिदंगी भर इस कंपनी का एहसानमंद रहूँगा" स्टारबक्स ने देखा कि अच्छी सर्विस प्रोवाइड करने के लिए हर एम्प्लोई को विल पॉवर और सेल्फ डिसप्लीन की जरूरत है. यही वजह थी कि कंपनी मिलियन डॉलर खर्च करके अपने एम्प्लोईज़ को ट्रेनिंग देती है और उन्हें नई अच्छी आदतें अपनाने में हेल्प करती है. 

स्टारबक्स के अपने मैनुअल और वर्कबुक है जिनमे इंस्ट्रक्शन दिए गए है कि एम्प्लोईज़ को मुश्किल सिचुएशन कैसे निपटना है या रूड कस्टमर्स के साथ कैसे डील करनी चाहिए. जैसे एक्जाम्पल के लिए, अगर कोई कस्टमर इस बात पर गुस्सा है कि उसे गलत ड्रिंक सर्व कर दी गई है तो ऐसे में LATTE method अपनाना चाहिए जहाँ Listen to the customer, Acknowledge the complaint, Take Action by giving the right drink, Thank the customer, and Explain why the problem occurred यानी कस्टमर की बात सुनें, शिकायत को स्वीकार करें, सही ड्रिंक देकर एक्शन लें, कस्टमर को थैंक यू कहें और बताएं कि प्रॉब्लम क्यों हुई थी. अपने एम्प्लोईज़ को ट्रेनिंग देना और उन्हें विलपॉवर, सेल्फ डिसप्लीन और गुड हैबिट्स के बारे में सिखाना स्टारबक्स की सक्सेस का सबसे बड़ा सीक्रेट है. उनके एम्प्लोईज़ की गुड हैबिट्स की वजह से उनके कस्टमर्स को अच्छी सर्विस मिलती है और यही एक वजह है कि स्टारबक्स सिर्फ एक कॉफ़ी नहीं बल्कि उससे कहीं बढ़कर एक गुड एक्सपिरिएंस है.

Conclusion 


आपने लिसा एलन की रियल लाइफ स्टोरी पढ़ी कि कैसे उसने शराब और सिगरेट जैसी बुरी लत छोड़कर ज़िंदगी को एक और मौका दिया. आपने इस समरी में यूजीन पॉल के बारे में भी पढ़ा, वो आदमी जिसे viral encephalitis नाम की बीमारी हो गई थी जिसमे कि उसकी याददाश्त भी चली गई थी और उसे अपनी लाइफ जीने के लिए अपनी हैबिट्स पर डिपेंड रहना पड़ा. क्योंकि उसकी हैबिट्स बनी हुई थी इसीलिए वो अपने डेली रूटीन के काम करने में प्रोब्लम नहीं हुई. ये स्टोरी एक तरह से हमे हैबिट्स की पॉवर के बारे में बताती है. साथ ही आपने इस समरी में ब्रेन के बीसल गैंगलीआ के बारे में भी पढ़ा. आपने हैबिट लूप भी पढ़ा. जो क्यू रूटीन और रिवॉर्ड है. आप किसी भी बुरी आदत से छुटकारा पाकर नई और अच्छी आदत डाल सकते हो. बस आपको क्यू, रूटीन और रिवॉर्ड याद रखने है. आपने इस समरी में ट्रेविस लीच के बारे में पढ़ा और ये भी पढ़ा कि किस तरह स्टारबक्स ने उसकी ज़िंदगी बदल दी. जो ऑर्गेनाईजेशन अपने एम्प्लोईज़ में गुड हैबिट्स डालने की कोशिश करती है, उसके लॉन्ग टर्म सक्सेस मिलने के ज्यादा चांसेस होते है. तो अगर आपकी भी कुछ बुरी आदते है जो आपसे छूट नहीं रही तो टेंशन की कोई बात नहीं ये समरी आपको ऐसी टेक्नीक्स और ट्रिक्स बताएगी कि आप अपनी हर बुरी आदत से छुटकारा पा लोगे और साथ ही नई और अच्छी आदते भी डाल लोगे, इस समरी में कई ऐसी रियल लाइफ कहानियाँ है जो रीडर्स को इंस्पायर और मोटिवेट करती है. लिसा और ट्रेविस के जैसे ही आप भी अपनी लाइफ चेंज कर सकते है. बेशक शुरुआत में छोटे स्टेप्स ले. एक टाइम में एक हैबिट चेंज करने की कोशिश करे. हैबिट लूप याद रखना और कभी हार मत मानना, हमारी ज़िंदगी का हर दिन एक नया मौका लेकर आता है ताकि हम अपनी जिंदगी बेहतर बना सके.