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Rich Dad Poor Dad Book Summary In Hindi Chapter 2


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Rich Dad Poor Dad 
By Robert kiyshoki

रिच डैड पूअर डैड
अध्याय दो
अमीर लोग पैसे के लिए काम नहीं करते।

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"डैडी, क्या आप मुझे बता सकते हैं कि अमीर कैसे बना जाए?"

यह सुनते ही मेरे डैडी ने अपना शाम का अखबार नीचे रख दिया "बेटे, तुम अमीर क्यों बनना चाहते हो?"


"क्योंकि आज जिमी की मम्मी अपनी नई कैंडितक कार में आई और वे लोग पिकनिक पर अपने समुद्र तट वाले घर पर जा रहे थे। जिमी अपने साथ अपने तीन दोस्तों को ले गया, परंतु माइक और मुझे नहीं ले गया। उसने हमसे यह कहा कि वह हमें इसलिए नहीं ले जाएगा क्योंकि हम लोग 'ग़रीब बच्चे थे।"


"उसने ऐसा कहा ? " डॅडी ले अविश्वास से पूछा।

"हाँ, बिलकुल ऐसा " मैंने दर्द भरी आवाज़ में कहा।

डैडी ने अपना सिर हिलाया, नाक तक चश्मे को चढ़ाया और फिर अखबार पढ़ने लगे। मैं उनके जवाब का इंतजार करता रहा।


यह 1956 की बात है। तब में नौ साल का था। किस्मत की बात थी कि में उसी पब्लिक स्कूल में जाता था जिसमें अमीर लोगों के बच्चे पढ़ते थे। हम शुगर प्लांटेशन के कस्बे में रहते थे। प्लांटेशन के मैनेजर और कस्बे के बाकी अमीर लोग जैसे डॉक्टर, बिजनेसमैन और बँकर अपने बच्चों को पहली क्लास से छठी क्लास तक इसी स्कूल में भेजते थे। छठी क्लास के बाद बच्चों को प्रायवेट स्कूलों में भेजा जाता था। अगर मेरा परिवार सड़क के दूसरे छोर पर रह रहा होता तो मुझे अलग तरह के स्कूल में भेजा जाता जहाँ मेरे जैसे परिवारों के बच्चे पढ़ते थे। छठी क्लास के बाद इन बच्चों की तरह मैंने भी पब्लिक इंटरमीडिएट और हाई स्कूल किया होता क्योंकि उनकी ही तरह मेरे लिए भी प्रायवेट स्कूल में जाना संभव नहीं था।


मेरे डैडी ने आखिर अखबार को रख दिया। मुझे पता था कि वे क्या सोच रहे थे।

उन्होंने धीमे से शुरुआत की, "अगर तुम अमीर बनना चाहते हो, तो तुम्हें पैसे बनाना सीखना चाहिए"

मैंने पूछा, "मैं पैसे बनाना किस तरह सीख सकता हूँ?" "अपने दिमाग के इस्तेमाल से," उन्होंने मुस्कराते हुए कहा| जिसका असली मतलब यह था, 'बस, मैं तुम्हें इतना ही बता सकता हूँ' या 'में इसका जवाब नहीं जानता, इसलिए मुझे तंग मत करो।'

एक साझेदारी हुई

अगली सुबह मैंने अपने सबसे अच्छे दोस्त माइक को अपने डैडी की बातें बताई। जहाँ तक मुझे याद है, उस स्कूल में मैं और माइक ही दो गरीब बच्चे थे। माइक भी मेरी ही तरह था क्योंकि वह भी किस्मत की वजह से ही उस स्कूल में था। ऐसा लगता था जैसे किसी ने कस्बे में स्कूलों की सरहदें तय कर दी थीं और इसी कारण हम लोग अमीर बच्चों के स्कूल में पढ़ रहे थे। सच कहा जाए तो हम लोग गरीब नहीं थे, परंतु हमें ऐसा लगता था क्योंकि बाकी सभी बच्चों के पास नए बेसबॉल ग्लव्ज़, नई साइकलें और हर चीज़ नई होती थी।


मम्मी और डैडी ने हमें ज़रूरत की सभी चीजें दी थीं, जैसे खाना, घर, कपड़े। लेकिन इससे ज़्यादा कुछ नहीं। मेरे डंडी कहा करते थे, 'अगर तुम्हे कोई चीज़ चाहिए, तो उसके लिए काम कयो' हमें बहुत सी चीजें चाहिए थीं, लेकिन नौ साल के बच्चों के करने के लिए ज़्यादा काम मौजूद नहीं थे।

माइक ने पूछा, "तो पैसा कमाने के लिए हमें क्या करना चाहिए?"

"मैं नहीं जानता," मैंने कहा "लेकिन क्या तुम इस काम में मेरे पार्टनर बनना चाहते हो?"

वह राज़ी हो गया और उस शनिवार की सुबह माइक मेरा पहला बिज़नेस पार्टनर बन गया। हम दोनों पूरी सुबह यही सोचते रहे कि पैसा किस तरह कमाया जाए। कभी-कभार हम उन "बेफ़िक्र बच्चों" के बारे में बातें करते रहे जो जिमी के समुद्रतट वाले घर पर मज़े कर रहे होंगे। इससे थोड़ी चोट पहुँचती थी, परंतु यह चोट अच्छी थी क्योंकि इसने हमें यह सोचने के लिए प्रेरित किया कि पैसा कैसे कमाया जाए। आखिरकार उस दोपहर को हमारे दिमाग़ में बिजली काँध गई। यह एक ऐसा विचार था जो माइक ने किसी विज्ञान की किताब में पढ़ा था रोमांचित होकर, हमने अपने हाथ मिलाए और पार्टनरशिप के पास अब एक बिज़नेस था।


अगले कुछ हफ़्तो तक मैं और माइक आस-पास के इलाके में दौड़-भाग करते रहे। हम दरवाजों पर दस्तक देते थे और पड़ोसियों से कहते थे कि वे अपने इस्तेमाल किए हुए टूथपेस्ट ट्यूब हमारे लिए रख तो हैरत से हमें देखते हुए ज़्यादातर लोगों ने मुस्कराकर हमारी बात मान ली। कुछ ने हमसे पूछा कि हमें टूथपेस्ट ट्यूब क्यों चाहिए? इसके जवाब में हमने कहा, "हम आपको यह नहीं बता सकते। यह एक बिज़नेस सीक्रेट हैं।"


• सप्ताह गुजरते गए और मेरी माँ बहुत दुखी हो गई। अपने कच्चे माल को इकट्ठा करने के लिए हमने जो जगह चुनी थी वह उनकी वॉशिंग मशीन के ठीक पास थी। एक भूरे कार्डबोर्ड के डिब्बे में जिसमें कभी केचप की बोतलें रखी रहती थीं, हमारे इस्तेमाल किए हुए टूथपेस्ट के ट्यूब्स की संख्या बढ़ने लगी।


आखिर एक दिन माँ के सब्र का बाँध टूट गया। पड़ोसियों के मुडे-तुड़े और इस्तेमाल किए हुए टूथपेस्ट ट्यून्स को देखते-देखते वे ऊब गई थीं। उन्होंने पूछा " तुम लोग कर क्या रहे हो? और मैं यह नहीं सुनना चाहती कि यह एक बिजनेस सीक्रेट है। इस कचरे को साफ़ कर दो या मैं इसे उठाकर बाहर फेंक देती हूँ।


माइक और मैंने उनके हाथ-पैर जोड़े और उन्हें यह बताया कि जल्दी ही हमारा कच्चा माल पर्याप्त जमा हो जाएगा और फिर हम उत्पादन शुरू कर देंगे। हमने उन्हें बताया कि हम कुछ पड़ोसियों का इंतज़ार कर रहे थे ताकि वे अपने टूथपेस्ट के ट्यूब्श खत्म कर लें। माँ ने हमें एक हफ्ते की मोहलत और दे दी।


उत्पादन शुरू होने की तारीख क़रीब आ गई थी। दबाव बढ़ चुका था। हमारे वेअरहाउस के मालिक यानी मेरी माँ ने हमारी पहली पार्टनरशिप कंपनी को जगह खाली करने का नोटिस थमा दिया था। अब माइक का काम यह था कि वह पड़ोसियों को अपने टूथपेस्ट जल्दी खत्म करने के लिए कहे और साथ में यह भी जोड़ दे, दाँत के डॉक्टरों का कहना है कि दिन में कई बार ब्रश करना चाहिए में उत्पादन की प्रक्रिया को ठीक-ठाक करने में जुट गया।


एक दिन मेरे डैडी अपने एक दोस्त के साथ कार में बैठकर पोर्च में आए और उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने वहाँ नौ साल के दो बच्चों को उत्पादन की प्रक्रिया में पूरी गति से जुटे देखा। हर जगह बारीक सफेद पाउडर बिसारा हुआ था। एक लंबी मेज़ पर स्कूल से लाए गए दूध के छोटे कार्टन थे और हमारे परिवार की हिबाची बिल ताल दहकते कोयलों के साथ अधिकतम गर्मी पर जल रही थी।


डैडी सावधानी से चलकर हमारे करीब आए। चूँकि हमारे उत्पादन की प्रक्रिया ने पोर्ट पर करना कर लिया था इसलिए उन्हें कार बाहर ही खड़ी करनी पड़ी। जब वे और उनके दोस्त पास आए, तो उन्होंने कोयतो के ऊपर रखा एक स्टील का बर्तन देखा जिसमें टूथपेस्ट के ट्यूब पिछल रहे थे। उन दिनों टूथपेस्ट प्लास्टिक के ट्यूब्स में नहीं आते थे। ट्यूब सीसे के बने होते थे। एक •बार पेट जल जाने पर हम ट्यूब्स को स्टील के बर्तन में डाल देते थे ताकि वह पिघलकर द्रव रूप में आ सकें। इस पिघले हुए सीसे को हम छोटे छेद वाले दूध के कार्टनों में डाल रहे थे। 


दूध के इन कार्टलों में प्लास्टर ऑफ पेरिस भरा था। हर तरफ फैला सफ़ेद पाउडर प्लास्टर ही था, जिसमें हमने पानी मिलाया था। जल्दबाज़ी में, मैंने उसके बैग को गिरा दिया था और पूरी ज़मीन ऐसी लग रही थी जैसे वहाँ अभी-अभी बर्फ़ का तूफान आया हो। दूध के कार्टन बाहरी बवसे थे जिसके भीतर प्लास्टर ऑफ पेरिस के साँचे थे।


मेरे डैडी और उनके दोस्त हमें देखते रहे और हम पिघले हुए सीरो को प्लास्टर ऑफ पेरिस के क्यूब के ऊपर से छोटे से छेद में डालते रहे।


"सँभलकर," मेरे डैडी ने कहा

मैंने बिना सिर उठाए हामी भर दी।

आखिरकार जब सीसे को डालने का काम खत्म हो गया तो मैंने स्टील के बर्तन को नीचे रख दिया और फिर अपने डैडी की तरफ देखकर मुस्कराया।


उन्होंने हल्की मुस्कान के साथ पूरा, "तुम लोग क्या कर रहे हो?'

 "हम वही कर रहे हैं, जो आपने बताया था। हम अमीर बनने जा रहे हैं, "मैंने कहा

"हाँ," माइक ने सिर को हिलाते हुए और मुस्कराते हुए कहा "हम दोनों पार्टनर हैं।"

डैडी ने पूछा, "और इन प्लास्टर के साँचों में क्या है?"


"देखिए, "मैने कहा "इसमें एक बहुत अच्छी वीज़ है।"


छोटे हथौड़े से मैंने सील को ठोका जिससे बाहरी खोल टूट गया। सावधानी से मैंने ऊपर के आये प्लास्टर को हटाया और जस्ने का एक सिक्का बाहर गिर गया।


"है, भगवान !" मेरे डैडी ने कहा "तो तुम लोग जस्ते के सिक्के ढाल रहे थे।"

"बिलकुल सही, "माइक ने कहा "हम वही कर रहे थे जैसा आपने हमसे कहा था। हम पैसा बना रहे थे।

मेरे डैडी के दोस्त जोर से हँसने लगे। मेरे डैडी भी मुस्कराए और उन्होंने अपना सिर बना रहे थे। "दिलाया। उनके सामने आग और टूथपेस्ट की ट्यूब्स के बक्से के साथ सफ़ेद धूल में लिपटे हुए दो बच्चे खड़े थे, जो इस कान से उस कान तक खुलकर मुस्करा रहे थे।


उन्होंने हमसे कहा कि हम सब कुछ छोड़कर उनके साथ चलें और घर के सामने वाली सीढ़ी पर बैठें। मुस्कराते हुए उन्होंने हमें "जालसाजी" शब्द का मतलब समझाया।


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Rich Dad Poor Dad Book Summary In Hindi Chapter 1


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    Rich Dad Poor Dad 

      By Robert Kiyosaki 

  रिच डैड पूअर डैड

अध्याय एक

रिच डैड, पुअर डैंड

रॉबर्ट कियोसाकी के अनुसार

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मेरे दो डैडी थे, एक अमीर और दूसरे गरीबा एक बहुत पढ़े-लिखे थे और समझदार थे। वे पीएच.डी. थे और उन्होंने अपने चार साल के अंडरमैजुएट कार्य को दो साल से भी कम समय में कर लिया था। इसके बाद वे आगे पढ़ने के लिए स्टैनफोर्ड युनिवर्सिटी, युनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो तथा नॉर्थवेस्टर्न युनिवर्सिटी गए और यह सब उन्होंने पूरी तरह से स्कॉलरशिप के सहारे ही किया। मेरे दूसरे डैडी आठवीं से आगे नहीं पड़े थे।


दोनों ही अपने करियर में सफल थे। दोनों ने जिंदगी भर कड़ी मेहनत की थी। दोनों ने ही काफ़ी पैसा कमाया था। परंतु उनमें से एक पूरी जिंदगी पैसे के लिए परेशान होता रहा। दूसरा हवाई के सबसे अमीर व्यक्तियों में से एक बन गया। एक के मरने पर उसके परिवार, चर्च और जरूरतमंदों को करोड़ों डॉलर की दौलत मिली। दूसरा अपने पीछे कर्ज छोड़कर मारा ।


मेरे दोनों डैडी इरादे के पक्के, चमत्कारी और प्रभावशाली थे। दोनों ने मुझे सलाह दी, परंतु उनकी सलाह एक सी नहीं थी। दोनों ही शिक्षा पर बहुत जोर देते थे, परंतु उनके द्वारा सुझाए गए पढ़ाई के विषय अलग-अलग थे।


अगर मेरे पास केवल एक ही डैडी होते, तो मैं या तो उनकी सलाह मान लेता या फिर उसेक ठुकरा देता चूँकि सलाह देने वाले दो थे, इसलिए मेरे पास दो विरोधाभासी विचार होते थे। (एक) अमीर आदमी का और दूसरा गरीब आदमी का ) | 


किसी भी एक विचार को सीधे-सीधे मान लेने या न मानने के बजाय में उनकी सलाहों पर काफ़ी सोचा करता था, उनकी तुलना करता था और फिर खुद के लिए फ़ैसला किया करता था। 


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समस्या यह थी कि अमीर डैडी अभी अमीर नहीं थे और गरीब डैडी अभी गरीब नहीं थे। दोनों ही अपने करियर शुरू कर रहे थे और दोनों ही दौलत तथा परिवार के लिए मेहनत कर रहे थे। परंतु पैसे के बारे में दोनों के विचार और नजरिए एकदम अलग थे। 


उदाहरण के तौर पर एक डैडी कहते थे, "पैसे का मोह ही सभी बुराइयों की जड़ हैं।" जबकि दूसरे डैडी कहा करते थे, “पैसे की कमी ही सभी बुराइयों की जड़ हैं।"


जब मैं छोटा था, तो मुझे दोनों डैंडियों की अलग-अलग सलाहों से दिक्कत होती थी। एक अच्छा बच्चा होने के नाते मैं दोनों की बातें सुनना चाहता था। परेशानी यह थी कि दोनों एक-सी बातें नहीं कहते थे। उनके विचारों में ज़मीन-आसमान का फर्क था, खासकर पैसे के मामले में। मैं काफी लंबे समय तक यह सोचा करता कि उनमें से किसने क्या कहा, क्यों कहा और उसका परिणाम क्या होगा। 


मेरा बहुत-सा समय सोच-विचार में ही गुज़र जाता था। मैं खुद से बार-बार इस तरह के सवाल पूछा करता, "उन्होंने ऐसा क्यों कहा?" और फिर दूसरे डैडी की कही हुई बातों के बारे में भी इसी तरह के सवाल पूछता। काश मैं यह बोल सकता, “हों, वे बिलकुल सही हैं। मैं उनकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ।" या यह कहकर मैं सीधे उनकी बात ठुकरा सकता, "बुड्ढे को यह नहीं पता कि वह क्या कह रहा है।" चूँकि दोनों ही मुझे प्यारे थे, इसलिए मुझे खुद के लिए सोचने पर मजबूर होना पड़ा। इस तरह सोचना मेरी आदत बन गई जो आगे चलकर मेरे लिए बहुत फायदेमंद साबित हुई। अगर मैं एक तरह से ही सोच पाता तो यह मेरे लिए इतना फायदेमंद नहीं होता।


धन-दौलत का विषय स्कूल में नहीं, बल्कि घर पर पढ़ाया जाता है। शायद इसीलिए अमीर लोग और ज्यादा अमीर होते जाते हैं, जबकि गरीब और ज्यादा गरीब होते जाते हैं और मध्य वर्ग कर्ज में डूबा रहता है। हममें से ज्यादातर लोग पैसे के बारे में अपने माता-पिता से सीखते हैं। कोई गरीब पिता अपने बच्चे को पैसे के बारे में क्या सिखा सकता है? वह सिर्फ इतना ही कह सकता हैं, "स्कूल जाओ और मेहनत से पढ़ो।" हो सकता है वह बच्चा अच्छे नंबरों से कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर ते। फिर भी पैसे के मामले में उसकी मानसिकता और उसका सोचने का ढंग एक गरीब आदमी जैसा ही बना रहेगा। यह सब उसने तब सीखा था जब वह छोटा बच्चा था।


धन का विषय स्कूलों में नहीं पढ़ाया जाता। स्कूलों में शैक्षणिक और व्यावसायिक निपुणताओं पर जोर दिया जाता है, न कि धन संबंधी निपुणता परा इससे यह साफ़ हो जाता है कि जिन स्मार्ट बैंकर्स, डॉक्टर्स और अकाउंटेंट्स के स्कूल में अच्छे नंबर आते हैं वे जिंदगी भर पैसे के लिए संघर्ष क्यों करते हैं। हमारे देश पर जो भारी कर्ज लदा हुआ हैं वह काफ़ी हद तक उन उच्च शिक्षित राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों के कारण है जो आर्थिक नीतियाँ बनाते हैं और मजे की बात यह है कि वे धन के बारे में बहुत कम जानते हैं।


मैं अक्सर नई सदी में आने वाली समस्याओं के बारे में सोचता हूँ तब क्या होगा जब हमारे पास ऐसे करोड़ों लोग होंगे जिन्हें आर्थिक और चिकित्सकीय मदद की ज़रूरत होगी। धन संबंधी मदद के लिए या तो वे अपने परिवारों पर या फिर सरकार पर निर्भर होंगे। क्या होगा जब मेडिकेयर और सोशल सिक्यूरिटी के पास का पैसा खत्म हो जाएगा? किस तरह कोई देश तरक्की कर पाएगा अगर पैसे के बारे में पढ़ाई की जिम्मेदारी माता-पिता के ऊपर छोड़ दी जाएगी जिनमें से ज्यादातर गरीब हैं या गरीब होंगे?


चूँकि मेरे पास दो प्रभावशाली डैडी थे, इसलिए गंजे दोनों से ही सीखा। मुझे दोनों की सलाह पर सोचना पड़ता था। इस तरह से सोचते-सोचते मैंने यह भी जान लिया कि किसी व्यक्ति के विचार उसकी जिंदगी पर कितना जबर्दस्त प्रभाव डाल सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, एक डेडी को यह कहने की आदत थी, "मैं इसे नहीं खरीद सकता।" दूसरे डैंडी इन शब्दों के इस्तेमाल से चिढ़ते थे। वे ज़ोर देकर कहा करते थे कि मुझे इसके बजाय यह कहना चाहिए, "मैं इसे कैसे खरीद सकता हूँ?" पहला वाक्य नकारात्मक हैं और दूसरा प्रश्नवाचका एक में बात खत्म हो जाती है और दूसरे में आप सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं। मेरे जल्द ही अमीर बनने वाले डैडी जे मुझे समझाया कि जब हम कहते हैं, "मैं इसे नहीं खरीद सकता" तो हमारा दिमाग काम करना बंद कर देता है। इसके बजाय जब हम यह सवाल पूछते हैं, "मैं इसे कैसे खरीद सकता हूँ" तो हमारा दिमाग काम करने लगता है। उनका यह मतलब नहीं था कि आपका जिस चीज़ पर दिल आ जाए उसे खरीद ही लें। वे लगभग दीवानगी की हद तक अपने दिमाग़ को कसरत करवाना चाहते थे क्योंकि उनके ख्याल से दिमाग़ दुनिया का सबसे ताकतवर कंप्यूटर है। "मेरा दिमाग़ हर रोज़ तेज़ होता जाता है, क्योंकि मैं इसकी कसरत करता रहता हूँ। यह जितना तेज़ होता जाता है, मैं इसकी मदद से उतना ही ज्यादा पैसा कमा सकता हूँ।" उनका मानना था कि 'मैं इसे नहीं खरीद सकता' कहना दिमागी आलस की पहचान हैं।


हालाँकि दोनों ही डैडी अपने काम में कड़ी मेहनत करते थे, परंतु मैंने देखा कि पैसे के मामले में एक डैडी की आदत यह थी कि वे अपने दिमाग़ को सुला देते थे और दूसरे डैडी अपने दिमाग़ को लगातार कसरत करवाते रहते थे। इसका दीर्घकालीन परिणाम यह हुआ कि एक डैडी आर्थिक रूप से बहुत अमीर होते चले गए जबकि दूसरे डैडी लगातार कमज़ोर होते गए इसे इस तरह से समझें कि एक व्यक्ति हर रोज़ कसरत करने के लिए जिम जाता है, जबकि दूसरा व्यक्ति अपने सोफे पर बैठकर टीवी देखता रहता है। शरीर की सही करारत से आप ज़्यादा तंदुरुस्त हो सकते हैं और दिमाग की सही कसरत से आप ज़्यादा अमीर हो सकते हैं। आलस्य से स्वास्थ्य और धन दोनों का नुकसान होता है।


मेरे दोनों डैंडियों की विचारधारा में जमीन-आसमान का अंतर था। एक डैडी की सोच थी कि अमीरों को ज्यादा टैक्स देना चाहिए ताकि बेचारे गरीबों को ज्यादा फायदा मिल सके। जबकि दूसरे डैडी कहते थे, “टॅक्स उन लोगों को सजा देता हैं जो उत्पादन करते हैं और उन लोगों को इनाम देता है जो उत्पादन नहीं करते!"


एक डैडी शिखाते थे, "मेहनत से पढ़ो ताकि तुम्हें किसी अच्छी कंपनी में नौकरी मिल जाए" जबकि दूसरे डैडी की सीख यह थी, "मेहनत से पढ़ो ताकि तुम्हें किसी अच्छी कंपनी को खरिदने का मौका मिल जाए। "


एक डैडी कहते थे, “मैं इसलिए अमीर नहीं हूँ क्योंकि मुझे बाल-बच्चों को पालना पड़ता दी" दूसरे डैडी कढ़ते थे, “मुझे इसलिए अमीर बनना है क्योंकि मुझे बात-बच्चों को पालना है।"


एक डैडी डिनर की टेबल पर पैसे और बिज़नेस के बारे में बात करने के लिए हमेशा प्रोत्साहित करते थे। दूसरे डैडी भोजन करते समय पैसे की बातें करने के लिए मना करते थे। 


एक का कहना था, "जहाँ पैसे का सवाल हो, सुरक्षित कदम उठाओ, ख़तरा मत उठाओ।"


दूसरे का कहना था, "खतरों का सामना करना सीखो।" एक का मानना था, "हमारा घर ही हमारा सबसे बड़ा निवेश और हमारी सबसे बड़ी संपत्ति है" दूसरे का मानना था, "मेरा घर मेरा दायित्व है, और अगर आपका घर आपकी नज़र में अपका सबसे बड़ा निवेश हैं, तो आप गलत हैं।"


दोनो ही डैडी अपने बिल समय पर चुकाते थे, परंतु उनमें से एक सबसे पहले अपने बिल चुकाता था, जबकि दूसरा सबसे आखिर में।


एक डैडी का यह मानना था कि कंपनी या सरकार को आपका ध्यान रखना चाहिए और आपकी ज़रूरतों को पूरा करना चाहिए वे हमेशा तनख्वाह में बढ़ोतरी, रिटायरमेंट योजनाओं, मेडिकल लाभ, बीगारी की छुट्टी, छुट्टियों के दिन और बाक़ी सुविधाओं के बारे में चिंतित रहते थे। वे अपने दो चाचाओं से बहुत प्रभावित थे जो सेना में चले गए थे और बीस साल के सक्रिय जीवन के बाद उन्होंने अपने रिटायरमेंट और जीवन भर के आराम का इंतजाम कर लिया था। वे मेडिकल लाभ के विचार को पसंद करते थे और सेना द्वारा अपने रिटायर्ड कर्मचारियों को दी जा रही सुविधाओं की भी तारीफ करते थे। उन्हें विश्वविद्यालय का टेन्योर सिस्टम भी काफ़ी पसंद था। कई बार नौकरी से आजीवन मिल रही सुरक्षा और नौकरी के लाभ नौकरी से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं। वे अक्सर यह कहते थे, "मैंने सरकार के लिए बहुत मेहनत से काम किया है और इसलिए बदले में मुझे ये लाभ मिलने चाहिए"


दूसरे डैडी पूरी तरह से आर्थिक स्वावलंबन में विश्वास करते थे। वे 'सुविधाभोगी' मानसिकता के विरोधी थे। वे यह मानते थे कि इस तरह की मानसिकता लोगों को कमज़ोर और आर्थिक रूप से ज़रूरतमंद बनाती है। उनका यह विश्वास था कि आदमी को आर्थिक रूप से सक्षम होना चाहिए।

एक डैडी कुछ डॉलर बचाने के लिए परेशान रहे। दूसरे डैडी एक के बाद एक निवेश करते रहे।


एक डैडी ने मुझे बताया कि अच्छी नौकरी तलाशने के लिए अच्छा सा बायोडाटा कैसे लिखा जाए। दूसरे ने मुझे यह सिखाया कि कैसे मजबूत व्यावसायिक और वित्तीय योजनाएँ लिखी जाएँ जिससे मैं नौकरियाँ दे सकूँ।


दो प्रभावशाली डैंडियों के साथ रहने के कारण मुझे यह विश्लेषण करने का मौका मिला कि उनके विचारों का उनके जीवन पर कितना प्रभाव हो रहा है। मैंने पाया कि दरअसल लोग अपने विचारों से ही अपने जीवन को दिशा देते हैं।


उदाहरण के तौर पर, मेरे ग़रीब डैंडी हमेशा कहा करते थे, "मैं कभी अमीर नहीं बन पाऊंगा।” और उनकी यह भविष्यवाणी सही साबित हुई। दूसरी तरफ, मेरे अमीर डैडी हमेशा खुद को अमीर समझाते थे। वे इस तरह की बातें करते थे, “मैं अमीर हूँ और अमीर लोग ऐसा नहीं करते।" एक बड़े आर्थिक झटके के बाद जब वे दीवालिएपन की कगार पर थे, तब भी वे ख़ुद को अमीर आदमी ही कहते रहे। वे अपने समर्थन में यह कहते थे, “ग़रीब होने और पैसा न होने में फर्क होता है। पैसा पास में न होना अस्थायी होता हैं, जबकि ग़रीबी स्थायी हैं।"


मेरे ग़रीब डैडी यह भी कहते थे, “मेरी पैसे में कोई रुचि नहीं है” या “पैसा महत्वपूर्ण नहीं हैं।" मेरे अमीर डैडी हमेशा कहते थे, “पैसे में बहुत ताकत हैं। "


हो सकता है हमारे विचारों की ताकत को कभी भी मापा न जा सके, या फिर उन्हें पूरी तरह से समझा न जा सके। फिर भी बचपन में ही में यह समझ गया था कि हमें अपने विचारों पर ध्यान देना चाहिए और अपनी अभिव्यक्ति पर भी। मैंने देखा कि मेरे ग़रीब डैडी इसलिए ग़रीब नहीं थे क्योंकि वे कम कमाते थे, बल्कि इसलिए गरीब थे क्योंकि उनके विचार और काम ग़रीबों की तरह थे। दो डैंडी होने के कारण बचपन से ही मैं इस बारे में बहुत सावधान हो चला था कि मैं किस तरह की विचारधारा अपनाऊँ। मैं किसकी बात मानूँ- अपने अमीर डैडी की या अपने ग़रीब डैडी की?


हालाँकि दोनों ही शिक्षा और ज्ञान को बहुत महत्वपूर्ण मानते थे, परंतु क्या सीखा जाए इस बारे में दोनों की राय अलग-अलग थी। एक चाहते थे कि मैं पढ़ाई में कड़ी मेहनत करूँ, डिग्री लूँ और पैसे कमाने के लिए अच्छी सी नौकरी ढूँढ़ लूँ। वे चाहते थे कि मैं एक पेशेवर अधिकारी, वकील या अकाउंटेंट बन जाऊँ या एम.बी.ए कर लूँ। दूसरे डैंडी मुझे प्रोत्साहित करते थे कि मैं •अमीर बनने का रहस्य सीख लूँ यह समझ लूँ कि पैसा किस तरह काम करता है और यह जान तूं कि इससे अपने लिए कैसे काम लिया जाता है। "मैं पैसे के लिए काम नहीं करता!" इन शब्दों को वे बार-बार दोहराया करते थे, “पैसा मेरे लिए काम करता है!”


9 वर्ष की उम्र में मैंने यह फ़ैसला किया कि पैसे के बारे में मैं अपने अमीर डैडी की बात सुनूँगा और उनसे सीखूँगा। यह फ़ैसला करने का मतलब था अपने ग़रीब डैंडी की बातों पर ध्यान न देना, हालाँकि उनके पास कॉलेज की बहुत सी डिग्रियाँ थीं जो मेरे अमीर डैडी के पास नहीं थीं।


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Rich Dad Poor Dad Book In Hindi Introduction


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     Rich Dad Poor Dad 

      By Robert Kiyosaki 

  रिच डैड पूअर डैड

             
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  1. ''अमीरी की चोटी पर के लिए पहुंचने के लिए आपको रिच डडै, पअुर डडै पढ़नी ही चाहिए। इससे आपको बाजार की और  पैसों की व्यावहारिक समझ मिलेगी, जिससे आपका आिथक भविष्य सुधर सकता है।"
  2. ''जो भी व्यक्ति भविष्य मे अमीर बनना चाहता है, उसे अपनी शुरूआत रिच डडै, पअुर डडै से करना चाहिए"।

About This Book

क्या किसी के दो डैड हो सकते है ? लेकिन इस बुक के राइटर के थे. उनके रिच डैड उन्हें पैसे की इम्पोर्टेंस सिखाते है और पूअर डैड वैल्यूज़ की. तो राइटर को अपने दोनों डैड के एक्सपिरियेंश से काफी कुछ सीखने को मिला जो वो अपने रीडर्स के साथ शेयर करते है,


1. इस बुक से हम क्या सीखेंगे?

अमीर लोग पैसे के लिए काम नहीं करते, बल्कि पैसा उनके लिए काम करता है।
आप कितना कमाते है इससे ज्यादा मायने रखता है कि आपके पास कितना है. अपने काम से काम रखना सीखिए।
टैक्स किस तरह काम करते है।
अमीर लोग पैसा इन्वेंट करते है।
सीखने के लिए काम करिए, पैसे के लिए नहीं. सीखिए किस तरह लाइफ की हर्डल्स को दूर किया जाए। 
शुरुवात कीजिए।


2.    ये बुक किस किसको पढनी चाहिए? 

बेशक ये बुक हर किसी के काम आ सकती है, हर वो इंसान जो अमीर बनना चाहता है वो इस बुक से सीख सकता है कि पैसे से पैसा कैसे कमाया जाता है. अमीर बनना भी एक आर्ट है और इस आर्ट को सीखने के लिए इस बुक के की- आईडियाज आपकी काफी हेल्प करेंगे.


3. इस बुक के ऑथर कौन है ? 

रोबर्ट टोरू कियोसाकी एक अमेरिकन बिजनेसमेन और ऑथर है, उनका जन्म 8 अप्रेल, 1947 को हुआ था. कियोसाकी रिच ग्लोबल एलएल सी और रिच डैड कंपनी के फाउंडर है जो बुक्स और वीडियोज के थ्रू लोगो को पर्सनल फाइनेंस और बिजनेस एजुकेशन प्रोवाइड कराती है. कंपनी का मेन रेवेन्यू सोर्स रिच डैड की फ्रेंचाइजी सेमिनार्स है जोकि इंडीपेंडेंट लोग कियोसाकी का ब्रांड नेम यूज़ करके कंपनी को फ़ीस के तौर पर देते हैं. कियोसाकी ने अब तक 26 से भी ज्यादा मोटीवेशनल सेल्फ हेल्प बुक्स लिखी है जिनमे सेरिच डैड पूअर डैड मोस्ट पोपुलर मानी जाती है। 

विषय वस्तु  
सबक 

इसकी बहुत ज़रूरत है
अध्याय एक : रिच डडै पुअर डडै
अध्याय दो : अमीर लोग पसै के लिए काम नहीं करते
अध्याय तीन : पैसों की समझ क्यों सिखाई जानी चािहए?
अध्याय चार : अपने काम से काम रखो 
अध्याय पाँच : टैक्स का इतिहास और कॉररेशन की ताक़त
अध्याय छह : अमीर लोग पैसा का अविष्कार करते है 
अध्याय सात :  सीखने के लिए काम करें - पैसा के लिए काम न करे 
अध्याय आठ :बाधाओं को पार करना सीखें 
अध्याय नौ : शुरू करना
अध्याय दस : और ज्यादा चाहिए 


प्रस्तावना 
इसकी बहुत जरूर है

                                 
क्या स्कूल बच्चो को असली जिंदगी के लिए तयैार करता है ? मेरे mummy-daddy कहते थे, ''मेहनत से पढ़ो और अच्छे नंबर लाओ क्योंकि ऐसा करोगे तो एक अच्छी तनखबा वाली नौकरी मिल जाएगी।'' उनके जीवन का लक्ष्य यही था कि मेरी बड़ी बहन की और मेरी कॉलेज की शिक्षा पूरी हो जाए। उनका मानना था कि अगर कॉलेज की शिक्षा पूरी हो गई तो हम जिंदगी ज्यादा कामयाब हो सकेगें। जब मैंने 1976 में अपना डिप्लोमा हािसल किया - मैं फोलोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी में अकाउंटिंग में ओनर्स के साथ ग्रैजुएट हुई और अपनी कक्षा में काफी उच्च स्थान पर रही - तो मेरी mummy-daddy  का लक्ष्य पूरा हो गया था। यह उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। "मास्टर प्लान" के हिसाब से, मुझे एक "बिग 8" अकाउंटिंग फर्म में नौकरी भी मिल गई। अब मुझे उम्मीद थी एक लंबे करियर और कम उम्र में रिटायरमेंट की।

मेरे पति माइकल भी इसी रास्ते पर चले थे। हम दोनों ही बहुत मेहनती परिवारों से आए थे बहुत अमीर नहीं थे। माइकल ने ऑनर्स के साथ अँजुएशन किया था, एक बार नहीं बल्कि दो जो बार पहली बार इंजीनियर के रूप में और फिर लॉ स्कूल से उन्हें जल्दी ही पेटेंट लॉ में विशेषज्ञता रखने वाली वॉशिंगटन, डी.सी. की एक मानी हुई तो फर्म में नौकरी मिल गई। और इस तरह उनका भविष्य भी सुनहरा लग रहा था। उनके करियर का नक्शा साफ़ था और यह बात तय थी कि वह भी जल्दी रिटायर हो सकते थे।

हालाँकि हम दोनों ही अपने करियर में सफल रहे, परंतु हम जो सोचते थे, हमारे साथ ठीक वैसा ही नहीं हुआ। हमने कई बार नौकरियाँ बदलीं- हालांकि हर बार नौकरी बदलने के कारण सही थे परंतु हमारे लिए किसी ने भी पेंशन योजना में निवेश नहीं किया। हमारे रिटायरमेंट फंड हमारे खुद के लगाए पैसों से ही बढ़ रहे हैं।

हमारी शादी बहुत सफल रही है और हमारे तीन बच्चे हैं। उनमें से दो कॉलेज में हैं और तीसरा अभी हाई स्कूल में गया ही है। हमने अपने बच्चों को सबसे अच्छी शिक्षा दिलाने में बहुत सा पैसा लगाया।

1996 में एक दिन मेरा बेटा स्कूल से घर लौटा स्कूल से उसका मोहभंग हो गया था| वह पढ़ाई से ऊब चुका था। "मैं उन विषयों को पढ़ने में इतना ज्यादा समय क्यों बर्बाद करूँ जो असल जिंदगी में मेरे कभी काम नहीं आएँगे?" उसने विरोध किया।

बिना सोचे- विचारे ही मैंने जवाब दिया, "क्योंकि अगर तुम्हारे अच्छे नंबर नहीं आए तो तुम कभी कॉलेज नहीं जा पाओगे "

" चाहे मैं कॉलेज जाऊँ या न जाऊँ, " उसले जवाब दिया, "मैं अमीर बनकर दिखाऊँगा।"
"अगर तुम कॉलेज से मैजुएट नहीं हुए तो तुम्हें कोई अच्छी नौकरी नहीं मिलेगी, "मैंने एक माँ की तरह चिंतित और आतंकित होकर कहा "बिना अच्छी नौकरी के तुम किस तरह अमीर बनने के सपने देख सकते हो?"

मेरे बेटे ने मुस्कराकर अपने सिर को बोरियत भरे अंदाज़ में हिलाया। हम यह वर्चा पहले भी • कई बार कर चुके थे। उसने अपने सिर को झुकाया और अपनी आँखें घुमाने लगा। मेरी समझदारी भरी सलाह एक बार फिर उसके कानों से भीतर नहीं गई थी। हालांकि वह स्मार्ट और प्रबल इच्छाशक्ति वाला युवक था परंतु वह नम्र और शालीन भी था।

"मम्मी," उसने बोलना शुरू किया और भाषण सुनने की बारी अब मेरी थी। "समय के साथ चलिए! अपने चारों तरफ देखिए; सबसे अमीर लोग अपनी शिक्षा के कारण इतने अमीर नहीं बजे है। माइकल जॉर्डन और मैडोना को देखिए यहाँ तक कि बीच में ही हार्वर्ड छोड़ देने वाले बिल मेट्स ने माइक्रोसॉफ्ट कायम किया। आज वे अमेरिका के सबसे अमीर व्यक्ति हैं और अभी उनकी उम्र भी तीस से चालीस के बीच ही है। और उस बेसबॉल पिचर के बारे में तो आपने सुना ही होगा जो हर साल चालीस लाख डॉलर से ज्यादा कमाता है जबकि उस पर 'विमानी तौर पर कमज़ोर होने का लेबल लगा हुआ है।

हम दोनों काफ़ी समय तक चुप रहो अब मुझे यह समझ में आने लगा था कि मैं अपने बच्चे को वही सलाह दे रही थी जो मेरे माता-पिता ने मुझे दी थी। हमारे चारों तरफ की दुनिया बदल रही थी, परंतु हमारी सलाह नहीं बदली थीं। अच्छी शिक्षा और अच्छे ब्रेड हासिल करना अब सफलता की गारंटी नहीं रह गए थे और हमारे बच्चों के अलावा यह बात किसी की समझ में नहीं आई थी।

"मम्मी," उसने आगे कहा "मैं डैडी और आपकी तरह कड़ी मेहनत नहीं करना चाहता आपको काफ़ी पैसा मिलता है और हम एक शानदार मकान में रहते हैं जिसमें बहुत से क्रीमती सामान हो अगर में आपकी सलाह मानूँगा तो मेरा हाल भी आपकी ही तरह होगा। मुझे भी ज़्यादा मेहनत करनी पड़ेगी ताकि मैं ज्यादा टैक्स भर सकूँ और कर्ज में डूब जाऊँ। वैसे भी आज की दुनिया में नौकरी की सुरक्षा बची नहीं है। में यह जानता हूँ कि छोटे और सही आकार की फर्म कैसी होती है। मैं यह भी जानता हूँ कि आज के दौर में कॉलेज के स्नातकों को कम तनख्वाह मिलती है जबकि आपके जमाने में उन्हें ज़्यादा तनख्वाह मिला करती थी। डॉक्टरों को देखिए। वे अब उतना पैसा नहीं कमाते जितना पहले कभी कमाया करते थे। मैं जानता हूँ कि मैं रिटायरमेंट के लिए सामाजिक सुरक्षा या कंपनी पेंशन पर भरोसा नहीं कर सकता। अपने सवालों के मुझे नए जवाब चाहिय "

वह सही था। उसे नए जवाब चाहिए थे और मुझे भी मेरे माता-पिता की सलाह उन लोगों के लिए सही हो सकती थी जो 1945 के पहले पैदा हुए थे पर यह उन लोगों के लिए विनाशकारी • साबित हो सकती थी जिन्होंने तेज़ी से बदल रही दुनिया में जन्म लिया था। अब मैं अपने बच्चों से यह सीधी सी बात नहीं कह सकती थी, "स्कूल जाओ, अच्छे ब्रेड हासिल करो और किसी सुरक्षित नौकरी की तलाश करो। "मैं जानती थी कि मुझे अपने बच्चों की शिक्षा को सही दिशा देने के लिए नए तरीको की खोज करनी होगी।

एक माँ और एक अकाउंटेंट होने के जाते में इस बात से परेशान थी कि स्कूल में बच्चों को धन संबंधी शिक्षा या वित्तीय शिक्षा नहीं दी जाती। हाई स्कूल खत्म होने से पहले ही आज के युवाओं के पास अपना क्रेडिट कार्ड होता है। यह बात अलग है कि उन्होंने कभी धन संबंधी पाठ्यक्रम में भाग नहीं लिया होता है और उन्हें यह भी नहीं पता होता है कि इसे किस तरह निवेश किया जाता है। इस बात का ज्ञान तो दूर की बात है कि क्रेडिट कार्ड पर चक्रवृद्धि ब्याज की गणना किस तरह की जाती हैं। इसे आसान भाषा में कहें तो उन्हें धन संबंधी शिक्षा नहीं मिलती और यह ज्ञान भी नहीं होता कि पैसा किस तरह काम करता है। इस तरह वे उस दुनिया का सामना करने के लिए कभी तैयार नहीं हो पाते जो उनका इंतजार कर रही हैं। एक ऐसी दुनिया जिसमें बचत से ज्यादा खर्च को महत्व दिया जाता है।

जब मेरा सबसे बड़ा बेटा कॉलेज के शुरूआती दिनों में अपने क्रेडिट कार्ड को लेकर कर्ज में डूब गया तो मैंने उसके क्रेडिट कार्ड को नष्ट करने में उसकी मदद की। साथ ही में ऐसी तरकीब भी खोजने लगी जिससे मेरे बच्चों में पैसे की समझ आ सके।

पिछले साल एक दिन मेरे पति ने मुझे अपने ऑफिस से फोन किया। "मेरे सामने एक सज्जन बैठे हैं और मुझे लगता है कि तुम उससे मिलना चाहोगी।" उन्होंने कहा, "उनका नाम रॉबर्ट कियोसाकी है। वे एक व्यवसायी और निवेशक हैं तथा वे एक शैक्षणिक उत्पाद का पेटेंट करवाना चाहते हैं। मुझे लगता है कि तुम इसी चीज़ की तलाश कर रही थीं।"

जिसकी मुझे तलाश थी

मेरे पति माइक रॉबर्ट कियोसाकी द्वारा बनाए जा रहे नए शैक्षणिक उत्पाद कैशपलो से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने इसके परीक्षण में हमें बुलवा लिया। यह एक शैक्षणिक खेल था, इसलिए मैंने स्थानीय विश्वविद्यालय में पढ़ रही अपनी 19 वर्षीय बेटी से भी पूछा कि क्या वह मेरे साथ चलेगी और वह तैयार हो गई।

• इस खेल में हम लगभग पंद्रह लोग थे जो तीन समूहों में विभाजित थे।

माइक सही थे। मैं इसी तरह के शैक्षणिक उत्पाद की खोज कर रही थी। यह किसी रंगीन मोनोपॉली बोर्ड की तरह लग रहा था जिसके बीच में एक बड़ा सा चूढ़ा था। परंतु मोनोपॉली से यह इस तरह अलग था कि इसमें दो रास्ते थे एक अंदर और दूसरा बाहरा खेल का लक्ष्य था अंदर वाले रास्ते से बाहर निकलना जिसे रॉबर्ट 'चूहा दौड़' कहते थे और बाहरी रास्ते पर पहुँचना, या 'तेज़ रास्ते पर जाना। रॉबर्ट के मुताबिक तेज़ रास्ता हमें यह बताता है कि असल जिंदगी में अमीर लोग किस तरह पैसे का खेल खेलते हैं।

रॉबर्ट ने हमें 'चूहा दौड़' के बारे में बताया :

"अगर आप किसी भी औसत रूप से शिक्षित, कड़ी मेहनत करने वाले आदमी की जिंदगी को देखें, तो उसमें आपको एक-सा ही सफर दिखेगा। बच्चा पैदा होता है। स्कूल जाता है। माता पिता खुश हो जाते हैं, क्योंकि बच्चे को स्कूल में अच्छे नंबर मिलते हैं और उसका दाखिला कॉलेज में हो जाता है। बच्चा स्नातक हो जाता हैं और फिर योजना के अनुसार काम करता है। वह किसी आसान, सुरक्षित नौकरी या करियर की तलाश करता है। बच्चे को ऐसा ही काम मिल जाता है। शायद वह डॉक्टर या वकील बन जाता है या वह सेना में भर्ती हो जाता है या फिर वह सरकारी नौकरी करने लगता है। बच्चा पैसा कमाने लगता है, उसके पास थोक में क्रेडिट कार्ड •आने लगते हैं और अगर अब तक उसने खरीदारी करना शुरू नहीं किया है तो अब जमकर खरीदारी शुरू हो जाती हैं।

"खर्च करने के लिए पैसे पास में होते हैं तो वह उन जगहों पर जाता है जहाँ उसकी उम्र के ज्यादातर नौजवान जाते हैं- लोगों से मिलते हैं, डेटिंग करते हैं और कभी-कभार शादी भी कर लेते हैं। अब जिंदगी में मज़ा आ जाता है, क्योंकि आजकल पुरुष और महिलाएँ दोनों नौकरी करते हैं। दो तनख्वाहें बहुत सुखद लगती हैं। पति-पत्नी दोनों को लगता है कि उनकी ज़िंदगी सफल हो गई है। उन्हें अपना भविष्य सुनहरा नज़र आता है। अब वे घर, कार, टेलीविज़न खरीदने का फ़ैसला करते हैं, छुट्टियाँ मनाने कहीं चले जाते हैं और फिर उनके बच्चे हो जाते हैं। बच्चों के •साथ उनके खर्चे भी बढ़ जाते हैं। खुशहाल पति-पत्नी सोचते हैं कि ज़्यादा पैसा कमाने के लिए अब उन्हें ज़्यादा मेहनत करनी चाहिए उनका करियर अब उनके लिए पहले से ज्यादा मायने रखता है। वे अपने काम में ज्यादा मेहनत करने लगते हैं ताकि उन्हें प्रमोशन मिल जाए या उनकी तनख्वाह बढ़ जाए तनख्वाह बढ़ती हैं पर उसके साथ ही दूसरा बच्चा पैदा हो जाता है। अब उन्हें एक बड़े घर की जरूरत महसूस होती है। वे नौकरी में और भी ज़्यादा मेहनत करते हैं बेहतर कर्मचारी बन जाते हैं और ज्यादा मन लगाकर काम करने लगते हैं। ज्यादा विशेषज्ञता हासिल करने के लिए वे एक बार फिर किसी स्कूल में जाते हैं ताकि वे ज़्यादा पैसे कमा सके। हो सकता है कि वे दूसरा काम भी खोज लें। उनकी आमदनी बढ़ जाती हैं, परंतु उस आमदनी पर उन्हें इक्रा टैक्स भी चुकाना पड़ता है। यही नहीं, उन्होंने जो बड़ा घर खरीदा है उस पर भी टैक्स देना होता है। इसके अलावा उन्हें सामाजिक सुरक्षा का टैक्स तो चुकाना ही है। इसी तरह, बहुत से टैक्स चुकाने चुकाते उनकी तनख्वाह चुक जाती है। वे अपनी बड़ी हुई तजख्वाद लेकर घर आते हैं और हैरान होते हैं कि इतना सारा पैसा आखिर कहाँ बता जाता है। भविष्य के लिए बचत के हिसाब से वे कुछ म्यूचुअल फंड भी खरीद लेते हैं और अपने क्रेडिट कार्ड से घर का किराना खरीदते हैं। उनके बच्चों की उम्र अब 5 या 6 साल हो जाती हैं। यह चिंता भी उन्हें सताने लगती है कि बच्चों के कॉलेज की शिक्षा के लिए भी बचत ज़रूरी है। इसके साथ ही उन्हें अपने रिटायरमेंट के लिए पैसा बचाने की चिंता भी सताने लगती है।"

"35 साल पहले पैदा हुए यह खुशहाल दंपति अब अपनी नौकरी के बाकी दिन चूहा दौड़ में फँसकर बिताते हैं वे अपनी कंपनी के मालिकों के लिए काम करते हैं, सरकार को टैक्स चुकाने के लिए काम करते हैं, और बैंक में अपनी मिश्खी संपत्ति तथा क्रेडिट कार्ड के कर्ज को चुकाने के लिए काम करते हैं।

" फिर वे अपने बच्चों को यह सलाह देते हैं कि उन्हें मन लगाकर पढ़ना चाहिए अच्छे नंबर लाने चाहिए और किसी सुरक्षित नौकरी की तलाश करनी चाहिए वे पैसे के बारे में कुछ भी नहीं सीखते और इसीलिए वे जिंदगी भर कड़ी मेहनत करते रहते हैं। यह प्रक्रिया पीढ़ी दर पीढ़ी चलली रहती है। इसे 'चूहा दौड़' कहते हैं।"

"चूहा दौड" से निकलने का एक ही तरीका है और वह यह कि आप अकाउंट्स और इन्वेस्टमेंट दोनों क्षेत्रों में निपुण हो जाएँ। दिक्कत यह है कि इन दोनों ही विषयों को बोरिंग और कठिन माना जाता है। मैं खुद एक सी. पी. ए. हूँ और मैंने बिग 8 अकाउंटिंग फर्म के लिए काम किया है। मुझे यह देखकर ताज्जुब हुआ कि रॉबर्ट ने इन दोनों बोरिंग और कठिन विषयों को सीखना कितना रोचक, सरत और रोमांचक बना दिया था। सीखने की प्रक्रिया इतनी अच्छी तरह छुपा ली गई थी कि जब हम "चूहा दौड़" से बाहर निकलने के लिए जी जान लगा रहे थे तो हमें यह ध्यान ही नहीं रहा कि हम कुछ सीख रहे थे।

शुरू में तो हम एक नए शैक्षणिक खेल का परीक्षण कर रहे थे, परंतु जल्दी ही इस खेल में मुझे और मेरी बेटी को मज़ा आने लगा। खेल के दौरान हम दोनों ऐसे विषयों पर बात कर रहे थे जिनके बारे में हमने पहले कभी बातें नहीं की थीं। एक लेखापाल होने के कारण इन्क्रम स्टेटमेंट और बैलेंस शीट से जुड़ा खेत खेलने में मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। मैंने खेल के नियम और इसकी बारीकियाँ समझाने में अपनी बेटी और दूसरे लोगों की मदद भी की। उस रोज़ में 'चूहा दौड़' से सबसे पहले बाहर निकली और केवल मैं ही बाहर निकल पाई। बाहर निकलने में मुझे 50 मिनट का समय लगा हालाँकि खेल लगभग तीन घंटे तक चला।

मेरी टेबल पर एक बैंकर बैठा था। इसके अलावा एक व्यवसायी था, और एक कंप्यूटर प्रोग्रामर भी था। मुझे यह देखकर बहुत हैरत हुई कि इन लोगों को अकाउंटिंग या इन्वेस्टमेंट के बारे में कितनी कम जानकारी हैं, जबकि ये विषय उनकी जिंदगी में कितनी ज्यादा एहमियत रखते हैं। मेरे मन में यह सवाल भी उठ रहा था कि वे असल जिंदगी में अपने पैरो-थेो के कारोबार को कैसे सँभालते होंगे। मैं यह समझ सकती थी कि मेरी 19 साल की बेटी क्यों नहीं समझ सकती, पर ये लोग तो उससे दुगनी उम्र के थे और उन्हें ये बातें समझ में आनी चाहिए थीं।

'चूहा दौड़' से बाहर निकलने के बाद में दो घंटे तक अपनी बेटी और इन शिक्षित अमीर वयस्कों को पाँसा फेंकने और अपना बाज़ार फैलाते देखती रही। हालाँकि मैं खुश थी कि वे लोग कुछ नया सीख रहे थे, लेकिन मैं इस बात से बहुत परेशान और विचलित भी थी कि वयस्क लोग सामान्य अकाउंटिंग और इन्वेस्टमेंट के मूलभूत बिंदुओं के बारे में कितना कम जानते थे उन्हें अपने इन्कम स्टेटमेंट और अपनी बैलेंस शीट के आपसी संबंध को समझने में ही बहुत समय लगा। अपनी संपत्ति खरीदने और बेचते समय उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि हर सौदे से उनकी महीने की आमदनी पर असर पड़ रहा हो मैंने सोचा, असल जिंदगी में ऐसे करोड़ों लोग होंगे जो पैसे के लिए सिर्फ इसलिए परेशान हो रहे हैं, क्योंकि उन्होंने ये दोनों विषय कभी नहीं पड़े।

गंजे मन में सोया, भगवान का शुक्र हैं कि हमें मजा आ रहा है और हमारा लक्ष्य खेत में जीवना है। जब खेल खत्म हो गया तो रॉबर्ट ने हमें पंद्रह मिनट तक कैशपलो पर चर्चा करने और इसकी समीक्षा करने के लिए कहा।

मेरी टेबल पर बैठा व्यवसायी खुश नहीं था। उसे खेत पसंद नहीं आया था। "मुझे यह सब जानने की कोई ज़रूरत नहीं हैं, "उसने ज़ोर से कहा । "मेरे पास इन सबके लिए अकाउंटेंट, बैंकर और वकील हैं, जिन्हें यह सब मालुम है।"

रॉबर्ट का जवाब था, "क्या आपने गौर किया है कि ऐसे बहुत से अकाउंटेंट हैं जो अमीर नहीं हैं? और यही हाल बैंकर्स, वकीलों, स्टॉक ब्रोकर्स और रियल एस्टेट ब्रोकर्स का भी है। वे बहुत कुछ जानते हैं और प्राय: वे लोग स्मार्ट होते हैं परंतु उनमें से ज्यादातर अमीर नहीं होते। चूँकि हमारे स्कूल हमें वह सब नहीं सिखाते जो अमीर लोग जानते हैं, इसलिए हम इन लोगों से सलाह लेते हैं। परंतु एक दिन जब आप किसी हाईवे पर कार से जाते हैं, आप ट्रैफिक जाम में फँस जाते हैं। आप बाहर निकलने के लिए छटपटाते हैं। जब आप अपनी दाई तरफ देखते हैं तो वहाँ आप देखते हैं कि आपका अकाउंटेंट भी उसी ट्रैफिक जाम में फँसा हुआ है। फिर आप अपनी बाई तरफ देखते हैं और आपको वहाँ अपना बैंकर भी उसी हाल में नज़र आता है। इससे आपको हालात का अंदाज़ा हो जाएगा।"

कंप्यूटर प्रोग्रामर भी इस खेल से प्रभावित नहीं हुआ था। "यह सीखने के लिए में सॉफ्टवेयर खरीद सकता है।"

बैंकर ज़रूर प्रभावित हुआ था। "मैंने स्कूल में अकाउंटिंग सीखी थी, परंतु मैं अब तक यह नहीं समझ पाया था कि इसे असल जिंदगी में किस तरह काम में लाया जाए अब मैं समझ गया ही मुझे 'चूहा दौड़' से बाहर निकलने के लिए खुद को तैयार करने की ज़रूरत हैं।"

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